प्र1.
संख्या निरूपण के विचारों के विकास में हिंदू तथा भारतीय संख्या पद्धति का क्या स्थान है? इस पद्धति की सांकेतिक संख्याएँ कौन-सी हैं? क्या इस पद्धति में स्थानीय मान प्रणाली का उपयोग किया जाता है?
उत्तर
इसका स्थान: कहानी के ठीक अंत में — यही एकमात्र पद्धति है जो अध्याय की प्रत्येक अवधारणा को एक साथ समेटती है और अपनी ओर से अंतिम अवधारणा भी जोड़ती है।
| अवधारणा | पहली बार कहाँ | हिंदू पद्धति में? |
|---|---|---|
| निश्चित समूह आकार में गणन | गुमुलगल (2 में) | हाँ — 10 के समूहों में |
| सांकेतिक संख्याओं का अनुक्रम | रोमन | हाँ |
| सांकेतिक संख्याएँ किसी एक संख्या की घातें — आधार | मिस्र (आधार 10) | हाँ — आधार 10, दशमलव |
| प्रतीक के स्थान पर स्थिति | मेसोपोटामिया, माया, चीन | हाँ — स्थानीय मान |
| 0 स्थानधारक और संख्या दोनों | भारतीय गणित | हाँ — और केवल यहीं |
इसकी सांकेतिक संख्याएँ 10 की घातें हैं:
1, 10, 102 = 100, 103 = 1000, 104, 105, … — अंतहीन
हाँ, यह एक स्थानीय मान पद्धति है। पुस्तक का अपना उदाहरण:
375 = (3) × 102 + (7) × 10 + (5) × 1
= 300 + 70 + 5 = 375 ✓
= 300 + 70 + 5 = 375 ✓
ऐसा क्यों होता है: जहाँ मेसोपोटामिया की पद्धति अस्पष्ट थी, वहाँ यह पद्धति स्पष्ट है — दो नियम मिलकर यह करते हैं: प्रत्येक स्थान पर एक ही अंक, और रिक्त स्थान के लिए अंक 0। दोनों मिलकर यह सुनिश्चित करते हैं कि कोई संख्यांक केवल एक ही ढंग से पढ़ा जा सके — 305, 35 और 350 तीन भिन्न संख्याओं की तीन भिन्न श्रृंखलाएँ हैं, और इसमें अंतराल की कोई भूमिका नहीं। और चूँकि सांकेतिक संख्याएँ 10 की घातें हैं, सांकेतिक × सांकेतिक पुन: सांकेतिक होता है, अत: गुणा और भाग के सरल सामान्य नियम बन जाते हैं।
क्या आप जानते हैं? भारतीय गणित में शून्य केवल स्थानधारक नहीं था। आर्यभट्ट ने 499 सामान्य संवत् में इसके अंकगणितीय गुणों का प्रयोग किया, और ब्रह्मगुप्त ने 628 सामान्य संवत् में 0 तथा ऋणात्मक संख्याओं को पूर्ण संख्या का पद दिया — इससे वह बना जिसे आज हम बलय कहते हैं, अर्थात ऐसा समूह जो योग, व्यवकलन और गुणन के अंतर्गत संवृत हो। आधुनिक बीजगणित और विश्लेषण की नींव यही विचार हैं।