प्र1.
क्या हम इसे और अधिक संक्षिप्त रूप से निरूपित कर सकते हैं?
उत्तर
हाँ — और जिस ढंग से हम ऐसा करते हैं, वही स्थानीय मान का जन्म है।
पृष्ठ 71 वाली संख्या 640 थी, जिसका समूहन इस प्रकार हुआ:
640 = (10) × 60 + 40
मिस्र की अवधारणा से चलें तो 60 वाला प्रतीक दस बार और फिर चार 10-कीलें — कुल चौदह प्रतीक बनाने पड़ेंगे। इसके स्थान पर 60 वाले स्थान में दस का संख्यांक और इकाई वाले स्थान में चालीस का संख्यांक लिख दीजिए:
< | <<<<
जिसे “दस बार 60 और एक बार 40” पढ़ा जाता है — ठीक वही जो समीकरण कहता है
जिसे “दस बार 60 और एक बार 40” पढ़ा जाता है — ठीक वही जो समीकरण कहता है
7530 के लिए भी वही:
7530 = (2) × 3600 + (5) × 60 + 30
जाँच: 7200 + 300 + 30 = 7530 ✓
संख्यांक: YY | YYYYY | <<<
जाँच: 7200 + 300 + 30 = 7530 ✓
संख्यांक: YY | YYYYY | <<<
जब प्रत्येक स्थान अपना अर्थ स्वयं रखने लगे तो 60 की घात बताने वाले प्रतीकों की आवश्यकता ही नहीं रहती — स्थान ही बता देता है। उन्हें हटा दीजिए और संख्यांक जितना संक्षिप्त हो सकता है, उतना हो जाता है।
ऐसा क्यों होता है: यह संक्षेपण इसलिए संभव है कि 60 की कोई घात कभी 60 या उससे अधिक बार नहीं आ सकती। यदि आ जाए तो उनमें से 60 को अगली घात में समूहीकृत कर दिया जाएगा — पुस्तक यह (1) × 3600 + (70) × 60 + 2 = (2) × 602 + (10) × 60 + 2 से दिखाती है। अत: प्रत्येक स्थान में संख्या 0 से 59 के बीच रहती है, जिसे थोड़ी-सी कीलें सदैव लिख देती हैं। सीमित स्थान ही स्थानीय मान को संभव बनाता है।