गणित प्रकाश अध्याय 4 आइए, पता लगाएँ

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
निम्नलिखित चतुर्भुजों के शेष कोणों का माप ज्ञात कीजिए।
उत्तर

(i) समांतर चतुर्भुज PERA — शीर्ष P (नीचे-बाएँ), E (नीचे-दाएँ), A (ऊपर-दाएँ), R (ऊपर-बाएँ); PE ∥ RA तथा PR ∥ EA; ∠P = 40°।

∠A = ∠P = 40°  (समांतर चतुर्भुज के सम्मुख कोण)
∠E = 180 – 40 = 140°  (आसन्न कोण संपूरक होते हैं)
∠R = ∠E = 140°
जाँच: 40 + 140 + 40 + 140 = 360°

(ii) समांतर चतुर्भुज PQRS — P (नीचे-बाएँ), Q (नीचे-दाएँ), R (ऊपर-दाएँ), S (ऊपर-बाएँ); SR ∥ PQ तथा SP ∥ RQ; ∠P = 110°।

∠R = ∠P = 110°  (सम्मुख कोण)
∠Q = 180 – 110 = 70°  तथा  ∠S = 70°
जाँच: 110 + 70 + 110 + 70 = 360°

(iii) समचतुर्भुज XWVU — चारों भुजाओं पर एक-एक चिह्न है, विकर्ण XV खिंचा है तथा ∠XVW = 30° है।

समचतुर्भुज का विकर्ण उसके कोणों को समद्विभाजित करता है, अत:
∠XVU = ∠XVW = 30°  ⇒ ∠UVW = 30 + 30 = 60°
∠X = ∠UVW = 60°  (सम्मुख कोण), जिसे XV 30° + 30° में बाँटता है
∠U = 180 – 60 = 120°  तथा  ∠W = ∠U = 120°
जाँच: 60 + 120 + 60 + 120 = 360°

(iv) समचतुर्भुज OIEA — चारों भुजाओं पर चिह्न, विकर्ण OE खिंचा है तथा ∠OEI = 20° है।

∠OEA = ∠OEI = 20°  (विकर्ण ∠E को समद्विभाजित करता है)
∠AOE = ∠EOI = 20°  (वह ∠O को भी समद्विभाजित करता है, और ∠O = ∠E)
∠E = ∠AEI = 20 + 20 = 40°  तथा  ∠O = 40°
∠A = ∠I = 180 – 40 = 140°
जाँच: 40 + 140 + 40 + 140 = 360°
हर बार एक ही कोण पर्याप्त क्यों है: समांतर चतुर्भुज में सम्मुख कोण समान होते हैं और आसन्न कोणों का योग 180°, अत: एक कोण चारों को निर्धारित कर देता है। समचतुर्भुज में इससे भी अधिक मिलता है — विकर्ण जिन दो कोणों से मिलता है उन्हें आधा-आधा बाँटता है, अत: (iii) के 30° जैसा अर्ध-कोण भी पूरी आकृति निर्धारित कर देता है।
प्र2.
विकर्ण के गुणों को आधार बनाते हुए एक समांतर चतुर्भुज की रचना कीजिए जिसके विकर्ण की लंबाई 7 सेंटीमीटर तथा 5 सेंटीमीटर हो। इसके साथ ही ये विकर्ण 140° के कोण पर प्रतिच्छेद भी करते हों।
उत्तर

समांतर चतुर्भुज को परिभाषित करने वाला विकर्ण-गुण एक ही है — विकर्ण एक-दूसरे को समद्विभाजित करते हैं। अत: दोनों लंबाइयों को आधा कीजिए और प्रतिच्छेद बिंदु से बाहर की ओर रचना कीजिए।

  1. AB = 7 सेंटीमीटर खींचिए और उसका मध्यबिंदु O अंकित कीजिए, अत: OA = OB = 3.5 सेंटीमीटर
  2. O पर OB के साथ 140° का कोण बनाती किरण खींचिए।
  3. उस किरण पर C इस प्रकार लीजिए कि OC = 2.5 सेंटीमीटर; विपरीत किरण पर D लीजिए, OD = 2.5 सेंटीमीटर। तब CD = 5 सेंटीमीटर और O उसका मध्यबिंदु है।
  4. AC, CB, BD तथा DA मिलाइए।

ACBD अपेक्षित समांतर चतुर्भुज है।

विकर्ण AB = 7 सेमी तथा CD = 5 सेमी, असमान ⇒ आयत नहीं
O पर कोण = 140° ≠ 90° ⇒ समचतुर्भुज नहीं
विकर्ण एक-दूसरे को समद्विभाजित करते हैं ⇒ यथार्थ समांतर चतुर्भुज
केवल समद्विभाजन ही क्यों पर्याप्त है: यदि OA = OB तथा OC = OD हो, तो O पर शीर्षाभिमुख कोणों के कारण SAS से ∆AOC ≅ ∆BOD। अत: AC = BD, और समान एकांतर कोणों से AC ∥ BD। दूसरे युग्म पर यही तर्क AD ∥ CB देता है — सम्मुख भुजाओं के दोनों युग्म समांतर, जो परिभाषा ही है।
प्र3.
विकर्ण के गुणों का प्रयोग करके एक समचतुर्भुज की रचना कीजिए जिसके विकर्णों की लंबाई 4 सेंटीमीटर और 5 सेंटीमीटर हो।
उत्तर

समचतुर्भुज के विकर्णों को एक-दूसरे को समकोण पर समद्विभाजित करना चाहिए — और इसके लिए चाँदे की आवश्यकता नहीं, क्योंकि लंब समद्विभाजक परकार से बनाया जा सकता है।

  1. AB = 5 सेंटीमीटर खींचिए।
  2. परकार से AB का लंब समद्विभाजक बनाइए; वह AB को O पर काटता है, अत: OA = OB = 2.5 सेंटीमीटर।
  3. उस लंब पर C तथा D इस प्रकार अंकित कीजिए कि OC = OD = 2 सेंटीमीटर (अत: CD = 4 सेंटीमीटर)।
  4. AD, DB, BC तथा CA मिलाइए।

ADBC अपेक्षित समचतुर्भुज है।

प्रत्येक भुजा = √(2.5² + 2²) = √(6.25 + 4) = √10.25 ≈ 3.2 सेंटीमीटर
चारों भुजाएँ समान हैं क्योंकि O पर बने चारों त्रिभुज 2.5 सेमी व 2 सेमी भुजाओं वाले सर्वांगसम समकोण त्रिभुज हैं।
लंबवत समद्विभाजन भुजाओं को समान क्यों बना देता है: AOC, COB, BOD तथा DOA — चारों त्रिभुजों की भुजाएँ 2.5 सेमी व 2 सेमी हैं और उनके बीच समकोण है, अत: वे SAS से सर्वांगसम हैं। अत: उनके कर्ण — जो चतुर्भुज की चारों भुजाएँ हैं — समान होने ही चाहिए।
स्वयं जाँचिए: चारों भुजाएँ मापिए; प्रत्येक 3.2 सेंटीमीटर से कुछ अधिक मिलेगी। O पर कोण मापिए; वह ठीक 90° दिखाएगा।
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