(i) असत्य। समान विकर्ण जो एक-दूसरे को समद्विभाजित करें, आयत देते हैं (निगमन 3), आवश्यक रूप से वर्ग नहीं। वर्ग के लिए एक शर्त और चाहिए — विकर्ण 90° पर भी मिलें (निगमन 5)। 6 सेमी × 3 सेमी का आयत इसका प्रत्युदाहरण है।
(ii) सत्य। चतुर्भुज के कोणों का योग 360° होता है, अत: चौथा कोण = 360 – 90 × 3 = 90°। तब चारों कोण समकोण हो जाते हैं, जो आयत की परिभाषा है।
(iii) सत्य। माना ABCD के विकर्ण O पर मिलते हैं और OA = OC तथा OB = OD है।
SAS से ∆AOB ≅ ∆COD (∠AOB = ∠COD, शीर्षाभिमुख)
⇒ AB = CD तथा ∠BAO = ∠DCO ⇒ AB ∥ CD
इसी प्रकार ∆AOD ≅ ∆COB ⇒ AD = CB तथा AD ∥ CB
⇒ समांतर चतुर्भुज
(iv) असत्य। पतंग के भी विकर्ण लंबवत होते हैं, और 6, 6, 9, 9 भुजाओं वाली पतंग समचतुर्भुज नहीं है। केवल लंबवत होना पर्याप्त नहीं — विकर्णों को एक-दूसरे को समद्विभाजित भी करना चाहिए।
(v) सत्य। माना ∠A = ∠C = x तथा ∠B = ∠D = y।
x + y + x + y = 360 ⇒ 2(x + y) = 360 ⇒ x + y = 180°
अत: आसन्न कोणों का प्रत्येक युग्म संपूरक है
⇒ AB ∥ DC तथा AD ∥ BC (एक ही ओर के अंत:कोण) ⇒ समांतर चतुर्भुज
(vi) सत्य। चार समान कोणों का योग 360° होने का अर्थ है प्रत्येक कोण 360 ∕ 4 = 90° का, जो पुस्तक की आयत की परिभाषा ही है।
(vii) असत्य। समद्विबाहु समलंब चतुर्भुज में समांतर भुजाओं का केवल एक युग्म निश्चित होता है। उसकी दोनों समान भुजाएँ एक-दूसरे की ओर झुकी होती हैं, समांतर नहीं, अत: वह समांतर चतुर्भुज नहीं है। वास्तव में उसमें आधार कोण समान होते हैं (∠U = ∠V), जबकि समांतर चतुर्भुज में आसन्न कोणों का योग 180° होना चाहिए — दोनों शर्तें केवल तभी साथ चल सकती हैं जब सभी कोण 90° के हों।
इन सात कथनों का प्रतिरूप: जो असत्य हैं — (i), (iv) तथा (vii) — उनमें से प्रत्येक किसी सही लक्षण-निरूपण से एक शर्त गिरा देता है: लंबवतता के बिना समान विकर्ण, समद्विभाजन के बिना लंबवतता, समांतर भुजाओं के दो युग्मों के स्थान पर एक। कोई गुण आवश्यक होते हुए भी पर्याप्त नहीं हो सकता, और इन दोनों में अंतर करना ही इस अभ्यास का पूरा कौशल है।