क्या ऐसे चतुर्भुज की रचना करना संभव है जिसके तीन कोण 90° के समान हों एवं चौथा कोण 90° के समान न हो?
उत्तर
नहीं, यह असंभव है। जितनी बार चाहें रचना कीजिए — चौथा कोण सदैव ठीक 90° पर ही बंद होगा।
चतुर्भुज के कोणों का योग = 360°
तीन समकोण लेते हैं 90 × 3 = 270°
चौथा कोण = 360 – 270 = 90°
किसी अन्य मान के लिए स्थान ही नहीं बचता, अत: ऐसा चतुर्भुज हो ही नहीं सकता। (यही पृष्ठ 109 के सत्य/असत्य प्रश्न के कथन (ii) को भी सिद्ध कर देता है।)
संकेत: इसीलिए पुस्तक की संक्षिप्त परिभाषा 'चार कोण 90°' के स्थान पर 'तीन कोण 90°' भी कह सकती थी। दोनों कसौटियाँ ठीक एक ही आकृतियों को स्वीकार करती हैं।
प्र2.
परंतु क्यों नहीं?
उत्तर
क्योंकि प्रत्येक चतुर्भुज पर एक गुण लागू होता है — उसके सभी कोणों का योग 360° होता है।
एक विकर्ण खींचिए। वह चतुर्भुज को दो त्रिभुजों में बाँट देता है, और प्रत्येक त्रिभुज 180° देता है।
180° + 180° = 360°
यह योग निश्चित हो जाने पर 90° के तीन कोण चौथे के लिए ठीक 90° ही छोड़ते हैं। रचना में कुछ भी करने से यह नहीं बदल सकता।
यही असली कारण क्यों है: दस प्रयासों में असफल होना केवल यह बताता है कि कार्य कठिन है। कोण-योग का गुण बताता है कि कार्य असंभव है — कोई भी प्रयास, कितना भी सावधानीपूर्वक, कभी सफल नहीं हो सकता। प्रयोग से बने अनुमान और प्रमाण में यही अंतर है।
प्र3.
एक चतुर्भुज SOME पर विचार कीजिए। एक विकर्ण SM खींचिए। हमें दो त्रिभुज ∆SEM और ∆SOM प्राप्त होते हैं। सभी छ: कोणों का योग करने पर हमें क्या प्राप्त होता है?
उत्तर
हमें 360° प्राप्त होता है, और वे छह कोण ठीक चतुर्भुज के चार कोणों में पुनर्व्यवस्थित हो जाते हैं।
यहाँ ∠1 + ∠4 चतुर्भुज का S पर पूरा कोण है, ∠3 + ∠6 M पर पूरा कोण है, तथा ∠2 व ∠5 क्रमश: E व O के पूरे कोण हैं। अत: —
किसी भी चतुर्भुज के सभी कोणों का योगफल 360° होता है।
एक विकर्ण किसी भी चतुर्भुज को दो त्रिभुजों में बदल देता है, अत: उसके कोणों का योग 180° + 180° = 360° होता है।
विकर्ण का भीतर होना क्यों आवश्यक है: इस पुनर्व्यवस्था के लिए विकर्ण आकृति के भीतर होना चाहिए, तभी ∠1 तथा ∠4 वास्तव में S के कोण के दो भाग होंगे। अवतल चतुर्भुज में दो में से एक विकर्ण बाहर पड़ जाता है — परंतु दूसरा भीतर ही रहता है, अत: परिणाम बना रहता है (अंतिम 'आइए, पता लगाएँ' का प्रश्न 10 देखिए)।
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