गणित प्रकाश अध्याय 4 पाठ्य प्रश्न

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
क्या ऐसे चतुर्भुज हैं जिनमें सम्मुख भुजाएँ समांतर हैं परंतु वह आयत नहीं हैं?
उत्तर

हाँ, अनेक हैं। समांतर रेखाओं के ऐसे दो युग्म खींचिए जो समकोण पर मिलें — उनसे कटने वाले चतुर्भुज की सम्मुख भुजाओं के दोनों युग्म समांतर होंगे, पर कोई भी कोण 90° का नहीं होगा।

ऐसे चतुर्भुजों को समांतर चतुर्भुज कहा जाता है।

समांतर चतुर्भुज: वह चतुर्भुज जिसकी सम्मुख भुजाएँ समांतर हों।
आयत ही सब कुछ क्यों नहीं: समांतर होना केवल दिशा की बात है। समांतर रेखाओं के दो परिवार किसी भी कोण पर मिल सकते हैं; 90° तो अनंत संभावनाओं में से एक ही चुनाव है। शेष प्रत्येक चुनाव ऐसा समांतर चतुर्भुज देता है जो आयत नहीं है।
संकेत: अत: समांतर चतुर्भुजों का समूह आयतों के समूह से बड़ा है। वेन आरेख में आयत का अंडाकार पूरी तरह समांतर चतुर्भुज के अंडाकार के भीतर बैठता है।
प्र2.
मापक और सेट-स्क्वेयर अथवा परकार (कम्पास) तथा मापक का उपयोग करके समांतर रेखाओं की रचना कैसे की जाती है? पूर्व तथ्यों को स्मरण करते हुए ऐसी एक आकृति की रचना कीजिए।
उत्तर

मापक तथा सेट-स्क्वेयर से।

  1. एक रेखा l खींचिए। सेट-स्क्वेयर को मापक के सहारे सरकाकर l के समांतर दूसरी रेखा m खींचिए।
  2. दोनों को काटती हुई तीसरी रेखा p खींचिए, कोण 90° के अतिरिक्त कोई भी हो।
  3. सेट-स्क्वेयर को p की दिशा में सरकाकर p के समांतर चौथी रेखा q खींचिए।
  4. चारों प्रतिच्छेद बिंदु समांतर चतुर्भुज के शीर्ष हैं।

परकार तथा मापक से — कोण की प्रतिलिपि बनाइए। रेखा l तथा उस पर स्थित बिंदु P से होकर एक तिर्यक रेखा खींचिए। l तथा तिर्यक रेखा के बीच बने कोण की प्रतिलिपि तिर्यक रेखा पर आगे किसी बिंदु Q पर बनाइए। नई भुजा l के समांतर होगी, क्योंकि संगत कोण समान होने पर रेखाएँ समांतर होती हैं

कोण की प्रतिलिपि वाली विधि क्यों काम करती है: यह संगत कोणों वाले गुण का विलोम है। यदि कोई तिर्यक रेखा दो रेखाओं के साथ समान संगत कोण बनाती है तो वे रेखाएँ कभी मिल ही नहीं सकतीं — अत: वे समांतर हैं। सेट-स्क्वेयर वाली विधि भी यही बात एक ही गति में करती है: सरकाने से मापक के साथ बना कोण अपरिवर्तित रहता है।
प्र3.
क्या एक आयत एक समांतर चतुर्भुज है?
उत्तर

हाँ। आयत की सम्मुख भुजाओं के दोनों युग्म समांतर होते हैं (पृष्ठ 90 पर सिद्ध), और यही समांतर चतुर्भुज की परिभाषा है।

अधिक स्पष्ट रूप से, आयत एक विशिष्ट प्रकार का समांतर चतुर्भुज है जिसके प्रत्येक कोण का माप 90° होता है।

कथनसत्य?
प्रत्येक आयत एक समांतर चतुर्भुज हैहाँ
प्रत्येक समांतर चतुर्भुज एक आयत हैनहीं
प्रत्येक वर्ग एक समांतर चतुर्भुज हैहाँ
संकेत: वेन आरेख में यह तीन परस्पर समाहित क्षेत्रों के रूप में दिखता है — वर्ग, आयत के भीतर; आयत, समांतर चतुर्भुज के भीतर। 'भीतर' को 'प्रत्येक ... एक ... है' पढ़ने से पूरा परिवार स्पष्ट रहता है।
प्र4.
एक समांतर चतुर्भुज की रचना कीजिए जिसकी आसन्न भुजाएँ 4 सेंटीमीटर और 5 सेंटीमीटर हों तथा इनके मध्य का कोण 30° हो। समांतर चतुर्भुज के शेष कोणों के माप क्या हैं? बताइए कि शेष अन्य भुजाओं की लंबाई क्या है?
उत्तर

कोण: 30°, 150°, 30°, 150°। भुजाएँ: 4 सेमी, 5 सेमी, 4 सेमी, 5 सेमी।

रचना। AB = 4 सेंटीमीटर तथा AD = 5 सेंटीमीटर इस प्रकार खींचिए कि ∠A = 30° हो। D से होकर AB के समांतर तथा B से होकर AD के समांतर रेखाएँ खींचिए; उनका प्रतिच्छेद बिंदु C है।

कोण (निगमन 6)। AB ∥ CD है और AD तिर्यक रेखा है, अत: ∠A तथा ∠D एक ही ओर के अंत:कोण हैं —

∠A + ∠D = 180°  ⇒ ∠D = 180 – 30 = 150°
∠A + ∠B = 180°  ⇒ ∠B = 150°
∠C + ∠D = 180°  ⇒ ∠C = 30°
जाँच: 30 + 150 + 30 + 150 = 360°

भुजाएँ (निगमन 7)। ∆ABD तथा ∆CDB की तुलना कीजिए — एक चाप से चिह्नित कोण समान हैं (समांतर चतुर्भुज के सम्मुख कोण), दो चापों से चिह्नित कोण समान हैं (एकांतर कोण, क्योंकि AD ∥ BC तथा BD तिर्यक रेखा है), और BD उभयनिष्ठ है।

∆ABD ≅ ∆CDB  (AAS)
⇒ AD = CB = 5 सेंटीमीटर  तथा  AB = CD = 4 सेंटीमीटर
आसन्न कोणों का योग 180° क्यों होता है: जिन दो भुजाओं से आपने आरंभ किया, वे एक ऐसी तिर्यक रेखा से कटती हैं जो दो समांतर भुजाओं को जोड़ती है। तिर्यक रेखा के एक ही ओर के अंत:कोणों का योग सदैव सरल कोण होता है — अत: समांतर चतुर्भुज का एक कोण जान लेने पर चारों ज्ञात हो जाते हैं।
प्र5.
सम्मुख कोणों के विषय में आपका क्या विचार है? क्या वह सभी समांतर चतुर्भुज में एक समान होंगे? यदि हाँ, तब हम कैसे आश्वस्त हो सकते हैं? आइए, हम इनमें से एक कोण को x मान लेते हैं। बताइए कि शेष कोण का माप कितना होगा?
उत्तर

हाँ — समांतर चतुर्भुज के सम्मुख कोण सदैव समान होते हैं। संख्या के स्थान पर अक्षर लेने से यह एक ही बार में सभी समांतर चतुर्भुजों के लिए सिद्ध हो जाता है।

समांतर चतुर्भुज PERA (शीर्ष क्रम P, E, A, R) में ∠P = x लीजिए।

∠P + ∠R = 180°  ⇒ ∠R = 180 – x
∠A + ∠R = 180°  ⇒ ∠A = 180 – (180 – x) = 180 – 180 + x = x
अत: ∠P = ∠A = x
इसी प्रकार ∠R = ∠E = 180 – x

जाँच: x + (180 – x) + x + (180 – x) = 360°

दो बार संपूरक लेने पर वही कोण क्यों लौट आता है: ∠A, ∠R का संपूरक है और ∠R, ∠P का। संपूरक दो बार लेने पर आप वहीं पहुँच जाते हैं जहाँ से चले थे, अत: ∠A को ∠P के बराबर होना ही है। बीजगणित में x का कट जाना इसी कारण होता है।
संकेत: इससे गुण 3 मिलता है — समांतर चतुर्भुज में आसन्न कोणों का योग 180° होता है और सम्मुख कोण समान होते हैं। अत: एक कोण माप लेना ही चारों कोण भरने के लिए पर्याप्त है।
प्र6.
निगमन 7 — हम एक समांतर चतुर्भुज की भुजाओं के विषय में क्या कह सकते हैं? क्या हम इसे दर्शाने के लिए पुन: सर्वांगसमता का उपयोग कर सकते हैं? इसके लिए कौन-से दो त्रिभुजों पर विचार कर सकते हैं?
उत्तर

∆ABD तथा ∆CDB लीजिए — विकर्ण BD से बने दोनों भाग।

∠A = ∠C  (समांतर चतुर्भुज के सम्मुख कोण, निगमन 6 से)
∠ADB = ∠CBD  (एकांतर कोण, क्योंकि AD ∥ BC तथा BD तिर्यक रेखा है)
BD = DB  (उभयनिष्ठ भुजा)
AAS नियम से ∆ABD ≅ ∆CDB
AD = CB तथा AB = CD

अत: समांतर चतुर्भुज की सम्मुख भुजाएँ समान होती हैं — गुण 1।

विकर्ण ही स्वाभाविक उपकरण क्यों है: जिन भुजाओं की तुलना करनी है वे किसी एक त्रिभुज में हैं ही नहीं, जब तक आप विकर्ण न खींचें। विकर्ण ऐसे दो त्रिभुज बना देता है जिनमें मिलकर चारों भुजाएँ आ जाती हैं, और समांतर रेखाएँ तुरंत एकांतर कोणों का समान युग्म दे देती हैं।
संकेत: तर्क का क्रम देखिए — निगमन 6 (कोण) का प्रयोग निगमन 7 (भुजाएँ) के भीतर होता है। एक बार कोई गुण सिद्ध हो जाए तो वह अगले प्रमाण का उपकरण बन जाता है।
प्र7.
क्या ∆ABD ≅ ∆CBD लिखना त्रुटिपूर्ण है? यदि हाँ, तो ऐसा क्यों?
उत्तर

हाँ, यह त्रुटिपूर्ण है। शीर्ष संगत क्रम में नहीं हैं।

सही कथन ∆ABD ≅ ∆CDB है, जो A↔C, B↔D, D↔B दर्शाता है। इसके स्थान पर ∆ABD ≅ ∆CBD लिखने का अर्थ होगा A↔C, B↔B, D↔D, अर्थात —

AB = CB  तथा  ∠ABD = ∠CBD

सामान्य समांतर चतुर्भुज में इनमें से कोई भी सत्य नहीं है — AB तथा CB भिन्न लंबाई की आसन्न भुजाएँ हैं, और BD, B पर बने कोण को समद्विभाजित नहीं करता।

क्रम केवल औपचारिकता क्यों नहीं है: सर्वांगसमता का पूरा लाभ उन समान भागों की सूची है जो उससे पढ़ी जाती है (CPCT)। यदि अक्षर गलत क्रम में हों तो वह सूची असत्य कथनों की सूची बन जाती है, और उस पर टिका हर आगामी चरण ढह जाता है।
प्र8.
क्या एक समांतर चतुर्भुज के विकर्ण सदैव समान होते हैं? अपने द्वारा बनाए गए समांतर चतुर्भुज के साथ इसकी जाँच कीजिए।
उत्तर

नहीं। सामान्य समांतर चतुर्भुज में दोनों विकर्ण भिन्न लंबाई के होते हैं।

4 सेंटीमीटर व 5 सेंटीमीटर भुजाओं तथा ∠A = 30° वाले समांतर चतुर्भुज में दोनों विकर्ण बहुत भिन्न निकलते हैं — 150° वाले कोनों को जोड़ने वाला विकर्ण 30° वाले कोनों को जोड़ने वाले विकर्ण से कहीं अधिक लंबा है। अपनी आकृति में दोनों मापिए; जब तक कोण 90° के न हों, वे कभी समान नहीं मिलेंगे।

चतुर्भुजविकर्ण समान?
सामान्य समांतर चतुर्भुजनहीं
समचतुर्भुजनहीं (वर्ग होने पर ही हाँ)
आयतहाँ
वर्गहाँ
समान विकर्ण का अर्थ आयत क्यों है: निगमन 3 दिखा चुका है कि समान विकर्ण जो एक-दूसरे को समद्विभाजित करें, चारों कोणों को 90° बना देते हैं। चूँकि प्रत्येक समांतर चतुर्भुज के विकर्ण एक-दूसरे को समद्विभाजित करते ही हैं, केवल 'समान' शर्त जोड़ने से समांतर चतुर्भुज आयत बन जाता है। अत: समांतर चतुर्भुज के विकर्ण ठीक तभी समान होते हैं जब वह आयत हो।
प्र9.
क्या विकर्ण एक-दूसरे को समद्विभाजित करते हैं? क्या वे उनके मध्य बिंदु पर प्रतिच्छेद करते हैं? इसे ज्ञात करने के लिए तर्क दीजिए अथवा प्रयोग कीजिए।
उत्तर

हाँ — समांतर चतुर्भुज के विकर्ण सदैव एक-दूसरे को समद्विभाजित करते हैं, भले ही वे समान न हों।

निगमन 8. समांतर चतुर्भुज EASY के विकर्ण O पर मिलते हैं। ∆AOE तथा ∆YOS की तुलना कीजिए —

AE = YS  (समांतर चतुर्भुज की सम्मुख भुजाएँ)
∠AEO = ∠YSO  (एकांतर कोण, AE ∥ YS)
∠EAO = ∠SYO  (एकांतर कोण)
ASA नियम से ∆AOE ≅ ∆YOS
OA = OY तथा OE = OS

अत: O दोनों विकर्णों का मध्यबिंदु है — गुण 4

विकर्ण समान हुए बिना यह क्यों काम करता है: इस सर्वांगसमता में केवल भुजाओं का एक समान युग्म तथा समांतरता से मिलने वाले एकांतर कोण प्रयुक्त हुए हैं। यह कहती है कि O के आर-पार आकृति के दोनों आधे भाग एक-दूसरे की प्रतिकृति हैं, अत: प्रत्येक विकर्ण दो समान भागों में कट जाता है — परंतु एक विकर्ण की दूसरे से तुलना यह करती ही नहीं।
प्र10.
क्या ∆AOE ≅ ∆SOY लिखना त्रुटिपूर्ण होगा? यदि हाँ, तो क्यों?
उत्तर

हाँ। सही कथन ∆AOE ≅ ∆YOS है।

सही: ∆AOE ≅ ∆YOSगलत: ∆AOE ≅ ∆SOY
A ↔ Y, O ↔ O, E ↔ SA ↔ S, O ↔ O, E ↔ Y
देता है OA = OY, OE = OS ✓देगा OA = OS, OE = OY ✗

OA तथा OS भिन्न विकर्णों के आधे भाग हैं, और उनके समान होने का कोई कारण नहीं — सामान्य समांतर चतुर्भुज में वे समान होते भी नहीं।

संकेत: सही क्रम पाने के लिए देखिए कि एक त्रिभुज का कौन-सा शीर्ष दूसरे त्रिभुज के किस शीर्ष की भूमिका निभा रहा है। A, भुजा EO के सम्मुख है; भुजा SO के सम्मुख शीर्ष Y है, अत: A का युग्म Y ही होगा।
प्र11.
क्या एक समांतर चतुर्भुज के विकर्ण एक विशेष कोण पर प्रतिच्छेद करते हैं?
उत्तर

नहीं — उनके बीच का कोण कुछ भी हो सकता है, और समांतर चतुर्भुज का आकार बदलने पर वह भी बदलता है।

चतुर्भुजविकर्णों के बीच का कोण
सामान्य समांतर चतुर्भुजकोई भी मान; निश्चित नहीं
आयतकोई भी मान (यहाँ भी निश्चित नहीं)
समचतुर्भुजसदैव 90°
वर्गसदैव 90°

लंबवत होना समान भुजाओं से मिलता है, समांतरता से नहीं। खंड 4.4 इसी प्रश्न का उत्तर देता है, और निगमन 10 इसका निपटारा करता है — समचतुर्भुज के विकर्ण 90° पर प्रतिच्छेद करते हैं

भुजाएँ इस कोण को क्यों नियंत्रित करती हैं: यदि चारों भुजाएँ समान हों तो प्रत्येक शीर्ष अपने दोनों पड़ोसी शीर्षों से समान दूरी पर होता है, अत: प्रत्येक शीर्ष किसी विकर्ण के लंब समद्विभाजक पर पड़ता है। इससे विकर्ण लंबवत होने को बाध्य हो जाते हैं। भुजाएँ असमान होते ही शीर्ष उन लंब समद्विभाजकों से हट जाते हैं और कोण फिर स्वतंत्र हो जाता है।
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