मल्हार अध्याय 2 अनुमान और कल्पना से

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
(क) कल्पना कीजिए कि आप उस घर में रहते हैं जहाँ चिड़ियाँ अपना घर बना रही हैं। अपने घर में उन्हें देखकर आप क्या करते?
उत्तर

यह कल्पना का प्रश्न है, इसलिए उत्तर आपका अपना होगा — पर वह व्यावहारिक होना चाहिए, केवल भावुक नहीं। ध्यान रखने योग्य बातें:

  • घोंसले को हाथ बिल्कुल न लगाएँ — छूने से अंडे टूट सकते हैं और पक्षी घोंसला छोड़ सकते हैं।
  • घोंसले के नीचे वाला पंखा न चलाएँ; ज़रूरत हो तो उस कमरे का उपयोग कम कर दें।
  • नीचे अख़बार बिछा दें ताकि तिनके और गंदगी आसानी से हटाई जा सके — सफ़ाई का हल घोंसला हटाना नहीं, नीचे कागज़ बिछाना है।
  • पास में पानी का एक उथला कटोरा और थोड़ा दाना रख दें, विशेषकर गरमियों में।
  • बिल्ली को उस कमरे से दूर रखें और रात में एक रास्ता खुला छोड़ दें।
नमूना उत्तर: पहले तो मैं घर में सबको बता देता कि छत के पंखे में घोंसला बन गया है, ताकि कोई भूल से पंखा न चला दे। फिर मैं नीचे एक पुराना अख़बार बिछा देता, क्योंकि माँ को गंदगी से चिढ़ है और मैं नहीं चाहता कि सफ़ाई के नाम पर घोंसला हटा दिया जाए। मैं बालकनी में मिट्टी के कटोरे में पानी रख देता। और सबसे बड़ी बात — मैं दिन में कई बार चुपचाप, दूर से उन्हें देखा करता, क्योंकि पास जाने पर वे डर जातीं। तीन-चार हफ़्ते की ही तो बात होती है; बच्चे उड़ना सीख जाते तो घोंसला अपने आप खाली हो जाता।
कहानी से जोड़िए: पिताजी ने भी अंत में यही किया — कुछ नहीं किया, केवल देखते रहे और मुसकराते रहे। कई बार न करना ही सबसे अच्छा काम होता है।
प्र2.
(ख) मान लीजिए कि कहानी में चिड़िया नहीं, बल्कि नीचे दिए गए प्राणियों में से कोई एक प्राणी घर में घुस गया है। ऐसे में घर के लोगों का व्यवहार कैसा होगा? क्यों? (प्राणियों के नाम— चूहा, कुत्ता, मच्छर, बिल्ली, कबूतर, कॉकरोच, तितली, मक्खी)
उत्तर

घर के लोगों का व्यवहार इस बात पर निर्भर करता है कि वह प्राणी कितना नुकसान करता है, कितना डराता है और देखने में कितना भला लगता है। इसी तर्क से आठों प्राणियों को देखिए —

प्राणीघर वालों का संभावित व्यवहारकारण
चूहातुरंत भगाने या पिंजरा-दवा लगाने की कोशिशकपड़े, अनाज और तार कुतरता है। कहानी में भी बीसियों चूहे थे और पिताजी उन्हें कभी निकाल नहीं पाए।
कुत्तापहले डर, फिर बच्चों का उससे दोस्ती करने का आग्रहबड़ा जीव है इसलिए डर लगता है, पर वह मनुष्य से जुड़ जाता है — कई घरों में वह पालतू बन जाता है।
मच्छरबिना सोचे मारना, अगरबत्ती/जाली लगानाकाटता है और बीमारी फैलाता है। यहाँ किसी को दया नहीं आती।
बिल्लीदूध पिला देना, पर रसोई से दूर रखनाकहानी में यही होता है — “मन आया तो अंदर आकर दूध पी गई”। वह अच्छी भी लगती है और दूध-दही चुराने का डर भी रहता है।
कबूतरपहले सहन, फिर जाली लगवानागुटर-गूँ अच्छा लगता है, पर पंख और बीट बहुत फैलाते हैं।
कॉकरोचतुरंत सफ़ाई और दवाघिन आती है और वह रसोई में बीमारी फैलाता है।
तितलीबच्चे खुश होकर देखेंगे, कोई नहीं भगाएगावह सुंदर है, नुकसान नहीं करती, और थोड़ी देर में स्वयं उड़ जाती है।
मक्खीहाथ हिलाकर उड़ाना, खाना ढक देनावह खाने पर बैठती है — नुकसान कम, चिढ़ ज़्यादा।
इस तुलना से एक बात साफ़ होती है: हम प्राणियों के साथ न्याय नहीं करते, पक्षपात करते हैं। तितली और मक्खी दोनों उड़ती हैं और दोनों निरीह हैं, पर एक को हम निहारते हैं और दूसरी को उड़ा देते हैं। कहानी में भी पिताजी को गौरैयों से इतनी चिढ़ इसलिए नहीं थी कि वे नुकसानदेह थीं, बल्कि इसलिए कि वे बिना पूछे आई थीं।
प्र3.
(ग) “मैं अवाक् उनकी ओर देखता रहा।” लेखक को विस्मय या हैरानी किसे देखकर हुई? उसे विस्मय क्यों हुआ होगा?
उत्तर

हैरानी उसे घोंसले में से झाँकती दो नन्हीं गौरैयों को देखकर हुई — “पंखे के गोले के ऊपर से नन्हीं-नन्हीं गौरैयाँ सिर निकाले नीचे की ओर देख रही थीं और चीं-चीं किए जा रही थीं।”

विस्मय के तीन कारण:

  • वह आवाज पूरी तरह अनपेक्षित थी। उसने पहले सोचा कि बाहर वाली गौरैयाँ लौट आई हैं, और झट से बाहर देखा — पर “दोनों गौरैयाँ बाहर दीवार पर गुमसुम बैठी थीं।” यानी यह तीसरी और चौथी आवाज थी, जिसका किसी को पता ही नहीं था।
  • जिस घोंसले को तोड़ा जा रहा था, वह खाली नहीं था। लाठी पर घोंसले का बहुत-सा हिस्सा लिपट चुका था — और तभी पता चला कि उसके अंदर जान थी। यह हैरानी के साथ-साथ डर भी था।
  • पूरी लड़ाई का अर्थ एक क्षण में बदल गया। अब तक यह ‘घर बनाम चिड़िया’ की लड़ाई थी; अब यह ‘माँ-बाप बनाम उनके बच्चे’ का मामला बन गया।
‘अवाक्’ शब्द ही क्यों: अवाक् का अर्थ है — इतना चकित कि मुँह से बोल न निकले। लेखक यहाँ ‘मुझे बहुत दुख हुआ’ या ‘मुझे बुरा लगा’ नहीं कहता। वह केवल बताता है कि वह देखता रह गया। और अगली पंक्तियों में वह जो देखता है — पिताजी का स्टूल से उतरना, लाठी एक ओर रखना, चुपचाप कुर्सी पर बैठ जाना — उसे भी बिना किसी टिप्पणी के रख देता है। मौन ही यहाँ सबसे प्रभावशाली भाषा है।
प्र4.
(घ) “माँ मदद तो करती नहीं थीं, बैठी हँसे जा रही थीं।” माँ ने गौरैयों को निकालने में पिताजी की सहायता क्यों नहीं की होगी?
उत्तर

क्योंकि माँ इस काम से सहमत ही नहीं थीं। सहायता वही करता है जो काम को उचित माने।

  • वे गौरैयों को हटाना ही नहीं चाहती थीं: “देखो जी, चिड़ियों को मत निकालो… अब तो इन्होंने अंडे भी दे दिए होंगे।” यह उनकी सबसे स्पष्ट बात है।
  • उन्हें यह प्रयास व्यर्थ लगता था: जो घर से चूहे तक न निकाल सके, वह चिड़ियों को क्या निकालेगा! इसलिए उन्होंने हाथ बँटाने की जगह टिप्पणी करना चुना।
  • उनका विरोध का तरीका ही अलग था: वे झगड़ती नहीं थीं, हँसती थीं। हँसी उनका हथियार भी था और सुरक्षा भी — “माँ को ऐसे मौकों पर हमेशा मजाक सूझता है।”
  • वे जानती थीं कि अंत क्या होगा: जब परिणाम पहले से दिखाई दे रहा हो, तो व्यक्ति दर्शक बन जाता है। और सचमुच, हर बार उनकी बात ही सही निकली।
पर ध्यान दीजिए — माँ निष्क्रिय नहीं थीं। उन्होंने ही उपाय बताया (“एक दरवाजा खुला छोड़ो”), उन्होंने ही चेताया (“पंखा चला देते, तो ये उड़ जातीं”) और अंत में उन्होंने ही उठकर सभी दरवाजे खोल दिए ताकि माँ-बाप गौरैयाँ भीतर आ सकें। यानी वे पूरे समय काम कर रही थीं — पर पिताजी के पक्ष में नहीं, गौरैयों के पक्ष में।
प्र5.
(ङ) “एक चूहा अँगीठी के पीछे बैठना पसंद करता है, शायद बूढ़ा है उसे सर्दी बहुत लगती है।” लेखक ने चूहे के विशेष व्यवहार से अनुमान लगाया कि उसे सर्दी लगती होगी। आप भी किसी एक अपरिचित व्यक्ति या प्राणी के व्यवहार को ध्यान से देखकर अनुमान लगाइए कि वह क्या सोच रहा होगा, क्या करता होगा या वह कैसा व्यक्ति होगा आदि। (संकेत— आपको उसके व्यवहार पर ध्यान देना है, उसके रंग-रूप या वेशभूषा पर नहीं)
उत्तर

इस गतिविधि में तीन चरण हैं — देखिए → व्यवहार का ब्योरा लिखिए → उससे अनुमान निकालिए। ध्यान रहे: अनुमान व्यवहार से निकलना चाहिए, चेहरे, कपड़े या रंग-रूप से नहीं।

चरणक्या कीजिएउदाहरण (कहानी से)
1. निरीक्षणएक ही आदत को कई बार देखिए, एक बार देखकर निर्णय मत कीजिएचूहा हर बार अँगीठी के पीछे ही बैठता है
2. ब्योराजो दिखा, वही लिखिए — बिना राय मिलाए“एक चूहा अँगीठी के पीछे बैठना पसंद करता है”
3. अनुमान‘शायद’, ‘लगता है’ जैसे शब्दों के साथ कारण जोड़िएशायद बूढ़ा है, उसे सर्दी बहुत लगती है”
नमूना उत्तर: हमारी गली के मोड़ पर एक व्यक्ति रोज सुबह सब्जी की दुकान लगाता है। मैंने उसके तीन व्यवहार देखे — (1) वह हर ग्राहक के जाने के बाद तराजू को कपड़े से पोंछता है; (2) जब कोई बूढ़ी महिला आती है, वह थैली उठाकर सड़क तक साथ जाता है; (3) दोपहर में जब भीड़ नहीं होती, वह एक छोटी डायरी में कुछ लिखता रहता है। इससे मेरा अनुमान है कि वह बहुत व्यवस्थित स्वभाव का है और शायद अपना हिसाब स्वयं रखता है। डायरी में लिखने की आदत से लगता है कि उसने पढ़ाई की होगी और यह काम मजबूरी में शुरू किया होगा। बूढ़ी महिला की थैली उठाना बताता है कि उसे केवल बिक्री की चिंता नहीं है। — ध्यान दीजिए, मैंने यह नहीं लिखा कि वह कैसा दिखता है या क्या पहनता है; मैंने केवल यह लिखा कि वह करता क्या है
यह कौशल क्यों ज़रूरी है: यही कौशल कहानी लिखने के काम आता है। भीष्म साहनी हमें कहीं नहीं बताते कि पिताजी ज़िद्दी हैं — वे केवल दिखाते हैं कि पिताजी लाठी उठाते हैं, कूदते हैं, कपड़े ठूँसते हैं। चरित्र व्यवहार से बनता है, विशेषणों से नहीं।
प्र6.
(च) “पिताजी कहते हैं कि यह घर सराय बना हुआ है।” सराय और घर में कौन-कौन से अंतर होते होंगे?
उत्तर
आधारघरसराय
रहने वालेगिने-चुने, अपने लोग — एक परिवारकोई भी, कभी भी; अजनबियों का आना-जाना
ठहरने की अवधिस्थायीकुछ घंटों या दिनों की
लगावअपनापन, जिम्मेदारी, यादेंकेवल काम-भर का संबंध; कोई लगाव नहीं
अनुमतिबिना पूछे कोई नहीं आतापूछने की आवश्यकता ही नहीं
देखभालरहने वाले स्वयं सँवारते हैंटूट-फूट की चिंता किसी को नहीं
मन का भाव“यह मेरा है”“कल चले जाना है”
पिताजी ने यह शब्द क्यों चुना: ‘सराय’ में सबसे चुभने वाली बात है — बिना पूछे आना-जाना। यही उनकी शिकायत है। पर कहानी अंत में इस शब्द को उलट देती है: गौरैयाँ सराय में ठहरने वाली यात्री नहीं निकलीं, उन्होंने वहाँ घोंसला बनाया, अंडे दिए और बच्चे पाले। यानी उन्होंने उस जगह को घर की तरह बरता — और यही देखकर पिताजी का मन बदल जाता है।
Tip: उत्तर लिखते समय अंतर को तालिका में रखना सबसे स्पष्ट रहता है, क्योंकि प्रश्न में ‘कौन-कौन से’ पूछा गया है — यानी एक से अधिक अंतर अपेक्षित हैं।
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