मल्हार अध्याय 2 संवाद और अभिनय

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
नीचे दी गई स्थितियों के लिए अपने समूह में मिलकर अपनी कल्पना से संवाद लिखिए और बातचीत को अभिनय द्वारा प्रस्तुत कीजिए— (क) “वे अभी भी झाँके जा रही थीं और चीं-चीं करके मानो अपना परिचय दे रही थीं, हम आ गई हैं। हमारे माँ-बाप कहाँ हैं?” नन्हीं-नन्हीं दो गौरैया क्या-क्या बोल रही होंगी?
उत्तर

संवाद लिखने के नियम: बच्चों की भाषा छोटी और सीधी रखिए; उन्हें दुनिया का कुछ पता नहीं है, इसलिए उनके वाक्य ज़्यादातर प्रश्न होंगे। एक बच्चा थोड़ा साहसी और दूसरा थोड़ा डरा हुआ दिखाइए — इससे संवाद में जान आ जाएगी।

नमूना संवाद:
पहली नन्हीं: चीं… चीं… यह क्या है? इतना बड़ा उजाला!
दूसरी नन्हीं: मुझे डर लग रहा है। नीचे कोई खड़ा है, बहुत बड़ा-सा।
पहली: उसके हाथ में जो लंबी चीज है, वह हमारे घर को हिला रही है।
दूसरी: हमारा बिछावन कहाँ गया? यहाँ तो घास ही नहीं बची!
पहली: चीं-चीं! सुनो, हम आ गई हैं! हम यहाँ हैं!
दूसरी: माँ… माँ! तुम कहाँ हो? भूख लगी है।
पहली: ज़ोर से बोलो, वे सुन लेंगी। वे जरूर आएँगी।
दूसरी: देखो, देखो! नीचे वाले ने अपनी लंबी चीज रख दी! वह चुपचाप बैठ गया।
पहली: और वह दूसरी… उसने तो सारे दरवाजे खोल दिए!
दोनों साथ: चीं-चीं-चीं! माँ आ गई! बाबा भी आ गए!
अभिनय के लिए सुझाव: दोनों बच्चे कुर्सी के पीछे बैठकर केवल सिर निकालकर बोलें — क्योंकि कहानी में भी वे “सिर निकाले नीचे की ओर देख रही थीं”। स्वर पतला और तेज रखें, और वाक्यों के बीच में ‘चीं-चीं’ जोड़ते चलें। मंच पर पिताजी बिना बोले लाठी नीचे रख दें — यह चुप्पी ही सबसे बड़ा संवाद है।
प्र2.
(ख) “चिड़ियाँ एक-दूसरे से पूछ रही हैं कि यह आदमी कौन है और नाच क्यों रहा है?” घोंसले से झाँकती गौरैयाँ क्या-क्या बातें कर रही होंगी?
उत्तर

यहाँ संवाद का रस हास्य है। गौरैयाँ डरी हुई नहीं हैं — वे पिताजी की उछल-कूद को समझ ही नहीं पा रहीं, और इसी नासमझी से हँसी पैदा होती है।

नमूना संवाद:
पहली गौरैया: जरा नीचे देखो! यह आदमी अचानक क्या करने लगा?
दूसरी: ताली बजा रहा है। शायद हमारा गाना पसंद आया है!
पहली: और यह ‘श… शू…’ क्या है? कोई नया राग है क्या?
दूसरी: बाँहें भी हिला रहा है। लगता है उड़ने की कोशिश कर रहा है।
पहली: बेचारा! पंख तो हैं नहीं, फिर भी कूद-कूदकर देख रहा है।
दूसरी: और वह जो सोफे पर बैठी हैं, वे तो हँसे जा रही हैं। उन्हें भी मजा आ रहा है।
पहली: चलो, जरा नीचे वाले पंखे पर चलकर बैठें — वहाँ से नाच अच्छा दिखेगा।
दूसरी: हाँ चलो! ऐसा तमाशा तो हमने पहाड़ों-घाटियों में कभी नहीं देखा!
कहानी से जोड़: यह संवाद कल्पना ज़रूर है, पर निराधार नहीं। पाठ स्वयं कहता है — “गौरैयाँ घोंसले में से निकलकर दूसरे पंखे के डैने पर जा बैठीं। उन्हें पिताजी का नाचना जैसे बहुत पसंद आ रहा था।” यानी लेखक ने भी उनके मन का यही अनुमान लगाया है। अच्छा संवाद-लेखन वही है जो पाठ के संकेतों को आगे बढ़ाए।
प्र3.
(ग) “एक दिन दो गौरैया सीधी अंदर घुस आईं और बिना पूछे उड़-उड़कर मकान देखने लगीं।” जब उन्होंने पहली बार घर में प्रवेश किया तो उन्होंने आपस में क्या बातें की होंगी?
उत्तर

यहाँ गौरैयाँ मकान देखने आए किराएदारों की तरह बात करेंगी — यही मज़ा है। पिताजी ने भी यही कहा था कि “मकान का निरीक्षण कर रही हैं कि उनके रहने योग्य है या नहीं।”

नमूना संवाद:
पहली गौरैया: अंदर तो आ गईं… पर कोई कुछ बोला ही नहीं। लगता है यहाँ मना नहीं है।
दूसरी: पहले ऊपर चलो। नीचे बहुत आवाजाही रहती है।
पहली: (रोशनदान पर बैठकर) यहाँ से पूरा कमरा दिखता है, और एक शीशा टूटा भी है — आने-जाने का रास्ता बन गया!
दूसरी: खिड़की भी ठीक है, पर यहाँ धूप सीधी आती है। बच्चों के लिए ठीक नहीं।
पहली: वह ऊपर गोल-सा क्या लटका है?
दूसरी: चारों तरफ से घिरा है, ऊपर छत है, नीचे से हवा भी आती है। बिल्ली वहाँ तक नहीं चढ़ सकती।
पहली: पानी? बाहर आँगन में आम का पेड़ है और नीचे बरतन भी दिखे।
दूसरी: तो तय रहा। आज चलते हैं, कल तिनके लेकर आएँगे।
पहली: किराया?
दूसरी: (हँसकर) रोज सुबह एक गाना — इससे ज्यादा हम दे भी क्या सकती हैं!
अभिनय में क्या दिखाएँ: संवाद बोलते हुए दोनों पात्र जगह बदलते रहें — एक बार ऊँची कुर्सी पर (रोशनदान), फिर खिड़की के पास, फिर छत की ओर देखते हुए। कहानी में भी वे स्थिर नहीं थीं: “कभी वे किसी रोशनदान पर जा बैठतीं, तो कभी खिड़की पर।”
प्र4.
(घ) “उनके माँ-बाप झट से उड़कर अंदर आ गए और चीं-चीं करते उनसे जा मिले और उनकी नन्हीं-नन्हीं चोंचों में चुगा डालने लगे।” गौरैयों और उनके बच्चों ने क्या-क्या बातें की होंगी?
उत्तर

यह कहानी का सबसे कोमल क्षण है, इसलिए संवाद में राहत, चिंता और स्नेह — तीनों होने चाहिए, हास्य नहीं।

नमूना संवाद:
माँ गौरैया: चीं-चीं! हम आ गईं, डरो मत। मुँह खोलो, पहले चुगा लो।
पहली नन्हीं: तुम इतनी देर कहाँ थीं? हम अकेले थे और नीचे बहुत शोर हो रहा था।
पिता गौरैया: हम बाहर दीवार पर बैठे थे, बेटा। हमें अंदर आने ही नहीं दिया जा रहा था।
दूसरी नन्हीं: हमारा घर हिल रहा था। कुछ तिनके नीचे गिर गए।
माँ गौरैया: गिरे तो गिरे। तिनके फिर ले आएँगे — तुम दोनों सही-सलामत हो, यही बहुत है।
पहली नन्हीं: अब वे हमें भगा तो नहीं देंगे?
पिता गौरैया: देखो नीचे — उन्होंने लाठी रख दी है और सारे दरवाजे खोल दिए हैं।
माँ गौरैया: और वह देखो, वे मुसकरा रहे हैं। अब डरने की जरूरत नहीं। चुपचाप खाओ और सो जाओ।
ध्यान दीजिए: कहानी अंत में शोर को बुरा नहीं कहती — “कमरे में फिर से शोर होने लगा था, पर अबकी बार पिताजी उनकी ओर देख-देखकर केवल मुसकराते रहे।” यानी शोर वही है, सुनने वाले का मन बदल गया है। आपके संवाद का अंत भी इसी भाव पर होना चाहिए।
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