मल्हार अध्याय 2 बदली कहानी

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
मान लीजिए कि घोंसले में अंडों से बच्चे न निकले होते। ऐसे में कहानी आगे कैसे बढ़ती? यह बदली हुई कहानी लिखिए।
उत्तर

पहले यह समझ लीजिए कि कहानी का मोड़ किस बात पर टिका है। पूरी कहानी में पिताजी का मन एक ही चीज़ ने बदला — बच्चों की “चीं-चीं”। यदि वह आवाज न आती, तो घोंसला टूट जाता और कहानी का अंत बिल्कुल दूसरा होता। इसलिए बदली हुई कहानी में आपको यह दिखाना है कि जीत के बाद भी सब कुछ ठीक नहीं लगता

अच्छी ‘बदली कहानी’ में क्या हो:

  • पात्र वही रहें — माँ, पिताजी, ‘मैं’, दो गौरैयाँ। स्वभाव भी वही: पिताजी ज़िद्दी, माँ व्यंग्य करती हुईं।
  • घटनाएँ उसी क्रम में उस बिंदु तक चलें जहाँ पिताजी स्टूल पर चढ़ते हैं।
  • वहाँ से आपकी अपनी कहानी शुरू हो।
  • अंत में कोई भाव ज़रूर बचे — पछतावा, सूनापन, या समझ।
नमूना उत्तर (बदली हुई कहानी):
…पिताजी ने लाठी का सिरा तिनकों पर जमाया और घुमाने लगे। सूखी घास, रुई के फाहे, धागे और थिगलियाँ लाठी के सिरे पर लिपटती चली गईं। इस बार कोई आवाज नहीं आई। थोड़ी ही देर में पंखे का गोला बिल्कुल साफ़ था, जैसे वहाँ कभी कुछ रहा ही न हो।

पिताजी स्टूल से उतरे और लाठी दीवार से टिकाकर छाती फैलाए कुर्सी पर आ बैठे। “कहा था न, मैं हार मानने वाला आदमी नहीं हूँ।”

माँ ने कुछ नहीं कहा। न वे हँसीं, न उन्होंने कोई व्यंग्य किया। वे उठकर रसोई में चली गईं। मुझे लगा, घर में पहली बार इतनी चुप्पी है।

मैंने आँगन में झाँका। दोनों गौरैयाँ दीवार पर बैठी थीं — दुबली और काली पड़ी हुई। थोड़ी देर बाद एक उड़कर रोशनदान तक आई, भीतर झाँका, और लौट गई। फिर दूसरी आई। फिर दोनों साथ आईं। तीन दिन तक यही होता रहा।

चौथे दिन वे नहीं आईं। कमरा एकदम शांत था। न ‘चीं-चीं’, न धमा-चौकड़ी। शाम को पिताजी अखबार लेकर बैठे, पर पढ़ा नहीं। बार-बार ऊपर पंखे की ओर देखते रहे। फिर उन्होंने धीरे से कहा, “कमरा कुछ सूना-सूना नहीं लग रहा?”

माँ ने इस बार भी व्यंग्य नहीं किया। बस इतना कहा, “जो चला जाता है, उसकी जगह खाली ही रहती है जी।”

अगली सुबह मैंने देखा, पिताजी स्टूल पर चढ़े हुए हैं — पर लाठी उनके हाथ में नहीं थी। वे रोशनदान का टूटा शीशा साफ़ कर रहे थे। मैंने पूछा तो बोले, “ऐसे ही। खुला रहने दो।”
यह अंत क्यों अच्छा है: इसमें कोई उपदेश नहीं दिया गया, फिर भी बात पहुँच जाती है। असली कहानी में पिताजी बच्चों को देखकर बदलते हैं; बदली हुई कहानी में उन्हें खालीपन बदलता है। दोनों में बदलाव एक ही है — यह समझ कि घर केवल दीवारों का नहीं होता।
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