मल्हार अध्याय 2 सोच-विचार के लिए

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
(क) आपको कहानी का कौन-सा पात्र सबसे अच्छा लगा— घर पर रहने आई गौरैयाँ, माँ, पिताजी, लेखक या कोई अन्य प्राणी? आपको उसकी कौन-कौन सी बातें अच्छी लगीं और क्यों?
उत्तर

यह आपकी अपनी पसंद का प्रश्न है, इसलिए उत्तर में पात्र + कारण + कहानी से प्रमाण — तीनों होने चाहिए। नीचे तीनों प्रमुख पात्रों के पक्ष में सामग्री दी गई है; आप जिसे चुनें, उसका प्रमाण साथ लिखिए।

पात्रअच्छी बातेंकहानी से प्रमाण
माँसूझबूझ, हास-परिहास, और चुपचाप जीव-दया“एक दरवाजा खुला छोड़ो, बाकी दरवाजे बंद कर दो” — उपाय भी वही बताती हैं; और अंत में सभी दरवाजे भी वही खोलती हैं।
गौरैयाँअपने घोंसले के लिए अटूट लगन, नए-नए रास्ते खोजने की चतुराईदरवाजे के नीचे से, फिर टूटे शीशे वाले रोशनदान से लौट आना; और बच्चों के लिए दुबली-काली पड़ जाना।
पिताजीअंत में अपनी ज़िद छोड़ देने की ईमानदारी“पिताजी के हाथ ठिठक गए” — फिर लाठी एक ओर रखकर चुपचाप बैठ जाना और अंत में मुसकराना।
नमूना उत्तर: मुझे माँ सबसे अच्छी लगीं। उनकी दो बातें विशेष हैं। पहली — वे बिना झगड़ा किए अपनी बात मनवा लेती हैं; लाठी उठाने की जगह वे केवल हँसती हैं और कहती हैं, “चिड़ियाँ पूछ रही हैं कि यह आदमी कौन है और नाच क्यों रहा है?” दूसरी — जहाँ बात सचमुच गंभीर हो जाती है, वहाँ उनका मज़ाक तुरंत रुक जाता है और वे कहती हैं, “देखो जी, चिड़ियों को मत निकालो… अब तो इन्होंने अंडे भी दे दिए होंगे।” यानी वे जानती हैं कि कब हँसना है और कब गंभीर होना है। यही समझदारी मुझे सबसे अच्छी लगी।
प्र2.
(ख) लेखक के घर में चिड़िया ने अपना घोंसला कहाँ बनाया? उसने घोंसला वहीं क्यों बनाया होगा?
उत्तर

गौरैयों ने घोंसला बैठक की छत में लगे पंखे के गोले में बनाया। पाठ की पंक्ति है — “बैठक की छत में लगे पंखे के गोले में उन्होंने अपना बिछावन बिछा लिया है और सामान भी ले आई हैं।”

वहीं क्यों बनाया होगा — चार कारण:

  • ऊँचाई और सुरक्षा: पंखे का गोला छत से लगा है। वहाँ बिल्ली नहीं पहुँच सकती, चूहे नहीं चढ़ सकते — घर में दोनों मौजूद थे।
  • बना-बनाया कटोरा: गोला चारों ओर से घिरा और नीचे से खुला होता है। तिनके उसमें टिक जाते हैं और अंडे लुढ़कते नहीं। घोंसले के लिए इससे सुविधाजनक ढाँचा और क्या होगा!
  • छिपाव और मौसम से बचाव: वहाँ न धूप पड़ती है, न बारिश, न सीधी हवा लगती है।
  • आने-जाने के रास्ते पास: रोशनदान और दरवाजे पास ही थे — यही रास्ते बाद में उन्हें बार-बार लौटने में काम आए।
ध्यान दीजिए: गौरैयों ने यह जगह अचानक नहीं चुनी। पहले दिन वे “बिना पूछे उड़-उड़कर मकान देखने” आई थीं — रोशनदान पर बैठीं, खिड़की पर बैठीं, और उड़ गईं। पिताजी ने इसे ठीक ही पहचाना था: “मकान का निरीक्षण कर रही हैं कि उनके रहने योग्य है या नहीं।” दो दिन बाद वे उसी जगह लौटीं जो उन्हें सबसे सुरक्षित लगी।
प्र3.
(ग) क्या आपको लगता है कि पशु-पक्षी भी मनुष्यों के समान परिवार और घर का महत्व समझते हैं? अपने उत्तर के समर्थन में कहानी से उदाहरण दीजिए।
उत्तर

हाँ। यह कहानी इसी बात को सिद्ध करने के लिए लिखी गई लगती है — और वह भी उपदेश देकर नहीं, घटनाएँ दिखाकर।

कहानी की घटनायह क्या सिद्ध करती है
घर में घुसकर रोशनदान और खिड़की पर बैठकर “मकान देखना”, फिर लौटकर वहीं बसनाघर चुना जाता है, यूँ ही नहीं बन जाता — पक्षी भी परखकर जगह चुनते हैं।
तिनके, सूखी घास, रुई के फाहे, धागे, थिगलियाँ जुटाकर घोंसला बनानाघर बनाना मेहनत माँगता है, और जिस चीज़ पर मेहनत लगी हो उसे कोई आसानी से नहीं छोड़ता।
बार-बार भगाए जाने पर भी लौट आना, अंडों के बाद जगह न छोड़नाबच्चों के लिए ख़तरा उठाना — यह मनुष्य के माता-पिता का भी सबसे बड़ा लक्षण है।
दुबला जाना, काली पड़ जाना, गाना बंद कर देनापक्षी भी चिंता और दुख अनुभव करते हैं; यह केवल भूख की बात नहीं है।
बच्चों की “चीं-चीं” सुनते ही माँ-बाप का झट से उड़कर आना और चोंच में चुगा डालनापुकार पहचानना और तुरंत दौड़ पड़ना — यही परिवार है।
सबसे बड़ा प्रमाण: कहानी में पिताजी को कोई समझाता नहीं। बच्चों की आवाज सुनते ही उनके “हाथ ठिठक गए”। यानी घोंसला केवल तब घर लगा जब उसमें बच्चे दिखे — और यह बात मनुष्य को समझाने की नहीं, पहचानने की होती है।
प्र4.
(घ) “अब मैं हार मानने वाला आदमी नहीं हूँ।” इस कथन से पिताजी के स्वभाव के कौन-से गुण उभरकर आते हैं?
उत्तर

इस एक वाक्य से पिताजी का पूरा स्वभाव खुल जाता है। उभरने वाले गुण —

  • दृढ़ता / जिद: एक बार जो ठान लिया, उसे पूरा करके छोड़ेंगे। दिन-पर-दिन गौरैयों को निकालना इसी का प्रमाण है।
  • आत्मसम्मान का तीखा भाव: उन्हें हार से ज़्यादा हारते हुए दिखना चुभता है। यह वाक्य वे तभी दोहराते हैं जब माँ हँसती हैं।
  • परिश्रमी और सक्रिय: वे केवल आदेश नहीं देते — स्वयं कूदते हैं, लाठी उठाते हैं, स्टूल पर चढ़ते हैं, कपड़े ठूँसते हैं।
  • क्रोधी और तुनकमिजाज: “माँ कोई बात व्यंग्य में कहें, तो पिताजी उबल पड़ते हैं।”
पर कहानी इस गुण को उलटकर भी दिखाती है। ठीक इसी वाक्य के आस-पास लेखक लिखता है — “पर आखिर वह भी तंग आ गए थे। आखिर जब उनकी सहनशीलता चुक गई…”। यानी घोषणा और सच्चाई साथ-साथ चल रहे हैं। यही हास्य पैदा करता है: जो आदमी बार-बार कहे कि वह हार नहीं मानता, वह असल में हारने के कगार पर खड़ा है।
और अंत में? अंत में पिताजी हारते नहीं, मान जाते हैं — यह अंतर महत्वपूर्ण है। लाठी वे किसी के दबाव में नहीं रखते; बच्चों को देखकर स्वयं रख देते हैं। ज़िद छोड़ देना भी एक तरह का बड़प्पन है।
प्र5.
(ङ) कहानी में गौरैयों के व्यवहार में कब और कैसा बदलाव आया? यह बदलाव क्यों आया? (संकेत— कहानी में खोजिए कि उन्होंने गाना कब बंद कर दिया?)
उत्तर

बदलाव तब आया जब पिताजी का अभियान रोज़ का सिलसिला बन गया — “अब तो रोज यही कुछ होने लगा।” और सबसे साफ़ रूप में वह उस दिन दिखा जब पिताजी घोंसला तोड़ने के लिए स्टूल पर चढ़े।

पहलेबाद में
“मजे से दोनों बैठी गाना गा रही हैं”“दोनों चुपचाप दीवार पर बैठी थीं… अब वे चहक भी नहीं रही थीं।
“मजे से बैठी मल्हार गा रही थीं”“कुछ-कुछ दुबला गई थीं, कुछ-कुछ काली पड़ गई थीं”
पिताजी का नाचना “जैसे बहुत पसंद आ रहा था”बाहर दीवार पर गुमसुम बैठी रहीं

बदलाव क्यों आया —

  • लगातार डर: रोज लाठी, ताली और खदेड़े जाने ने उनकी निश्चिंतता छीन ली। गाना निश्चिंत मन से निकलता है।
  • अंडों की चिंता: अब वे केवल अपने लिए नहीं लड़ रही थीं। घोंसले में अंडे थे, इसलिए हर बार भगाया जाना दुगुना डर था।
  • थकान और भूख: दिन में बाहर निकाल दी जातीं और रात को चोरी-छिपे लौटतीं — इसी दौड़-भाग ने उन्हें दुबला और काला कर दिया।
लेखक ने यह बदलाव कैसे दिखाया: उसने कहीं नहीं लिखा कि ‘गौरैयाँ दुखी थीं’। उसने केवल तीन बाहरी बातें बताईं — दुबलापन, रंग और चुप्पी। पाठक स्वयं भीतर का दुख समझ लेता है। यही अच्छी कहानी की पहचान है: भाव बताया नहीं जाता, दिखाया जाता है।
प्र6.
(च) कहानी में गौरैयों ने किन-किन स्थानों से घर में प्रवेश किया था? सूची बनाइए।
उत्तर
क्रमप्रवेश का रास्ताकहानी में कब
1.खुले दरवाजे से सीधे अंदरसबसे पहली बार — “एक दिन दो गौरैया सीधी अंदर घुस आईं और बिना पूछे उड़-उड़कर मकान देखने लगीं।”
2.दरवाजों के नीचे बची खाली जगह सेजब सब दरवाजे बंद कर दिए गए — “दरवाजे के नीचे से आ गई हैं,” माँ बोलीं। लेखक ने देखा, “सचमुच दरवाजों के नीचे थोड़ी-थोड़ी जगह खाली थी।”
3.रोशनदान से, जिसका एक शीशा टूटा हुआ थाजब दरवाजों के नीचे कपड़े ठूँस दिए गए — “अबकी बार वे रोशनदान में से आ गई थीं।”
4.रात में किसी अज्ञात रास्ते से“दिन में तो वे बाहर निकाल दी जातीं पर रात के वक्त जब हम सो रहे होते, तो न जाने किस रास्ते से वे अंदर घुस आतीं।”
इस सूची में कहानी की बनावट छिपी है: हर बार पिताजी एक रास्ता बंद करते हैं और गौरैयाँ नया खोज लेती हैं। रास्तों की यह श्रृंखला ही कहानी को आगे बढ़ाती है — और चौथा ‘अज्ञात रास्ता’ तो पिताजी की हार की घोषणा जैसा है, क्योंकि जिस रास्ते का पता ही न हो, उसे बंद कैसे करेंगे?
प्र7.
(छ) इस कहानी को कौन सुना रहा है? आपको यह बात कैसे पता चली?
उत्तर

कहानी घर का बेटा सुना रहा है — वही लड़का जो माँ और पिताजी के साथ उस घर में रहता है। कहानी प्रथम पुरुष (‘मैं’ शैली) में कही गई है।

यह कैसे पता चलता है — चार सूत्र:

  1. पहली ही पंक्ति: “घर में हम तीन ही व्यक्ति रहते हैं— माँ, पिताजी और मैं।” — यानी सुनाने वाला तीसरा व्यक्ति है।
  2. वह घटनाओं में शामिल है:मैंने भागकर दोनों दरवाजे बंद कर दिए”, “मैंने दरवाजे के नीचे देखा”, “मैं अवाक् उनकी ओर देखता रहा।”
  3. पिताजी उसे डाँटते हैं: “अब पिताजी ने मुझे झिड़ककर कहा, ‘तू खड़ा क्या देख रहा है? जा, दोनों दरवाजे बंद कर दे।’” — ‘तू’ और ‘झिड़कना’ बताते हैं कि सुनाने वाला घर का बच्चा है।
  4. माँ और पिताजी — वह उन्हें नाम से नहीं, रिश्ते से पुकारता है; बाहर का कोई व्यक्ति ऐसा नहीं कहेगा।
इस शैली का लाभ: बेटा किसी का पक्ष नहीं लेता — वह केवल देखता और बताता है। इसी तटस्थता के कारण पिताजी हास्यास्पद भी लगते हैं और अंत में हमें उनसे सहानुभूति भी होती है। यदि यही कहानी पिताजी स्वयं सुनाते, तो वे अपनी हँसी उड़वाने वाली बातें शायद न बताते; और यदि माँ सुनातीं, तो वह केवल मज़ाक बनकर रह जाती।
ध्यान रखें: ‘मैं’ का अर्थ हमेशा लेखक स्वयं नहीं होता। यहाँ ‘मैं’ कहानी का एक पात्र है — कहानी का कहनेवाला। लेखक भीष्म साहनी हैं, यह हमें पाठ के अंत में दिए नाम से पता चलता है।
प्र8.
(ज) माँ बार-बार क्यों कह रही होंगी कि गौरैयाँ घर छोड़कर नहीं जाएँगी?
उत्तर

क्योंकि माँ वह बात जानती हैं जो पिताजी नहीं समझ रहे — गौरैयाँ अब मेहमान नहीं, गृहस्थ हैं। इसके तीन कारण हैं:

  • घोंसला बन चुका है: “अब तो इन्होंने यहाँ घोंसला बना लिया है।” जिसने अपना ठिकाना बना लिया, वह डर के मारे उसे नहीं छोड़ता।
  • अंडे हैं: “अब इन्होंने अंडे दे दिए होंगे”, और आगे गंभीरता से — “अब तो इन्होंने अंडे भी दे दिए होंगे। अब ये यहाँ से नहीं जाएँगी।” माँ स्वयं माँ हैं; वे जानती हैं कि संतान के रहते कोई जगह नहीं छोड़ी जाती।
  • उन्होंने पहले भी देखा है: उसी घर में चूहे बरसों से डटे हैं और निकाले नहीं जा सके। माँ का व्यंग्य इसी अनुभव से निकलता है — “छोड़ो जी, चूहों को तो निकाल नहीं पाए, अब चिड़ियों को निकालेंगे!”
दोहराने का एक और कारण: माँ सीधे-सीधे यह नहीं कहतीं कि “चिड़ियों को मत निकालो” — यह वे केवल एक बार, अंत में कहती हैं। बाकी समय वे यही दोहराती रहती हैं कि ये जाएँगी नहीं। यह उनका तरीका है — विरोध नहीं, भविष्यवाणी। हर बार जब भविष्यवाणी सच होती है, पिताजी का उत्साह थोड़ा और घटता है। अंत में माँ को कुछ कहना ही नहीं पड़ता; पिताजी स्वयं मान जाते हैं।
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