प्र1.
(क) “अब तो ये नहीं उड़ेंगी। पहले इन्हें उड़ा देते, तो उड़ जातीं। अब तो इन्होंने यहाँ घोंसला बना लिया है।”
उत्तर
यह माँ का पहला ही निर्णय है, और पूरी कहानी उसे सच सिद्ध करती है। माँ कह रही हैं कि अब समय निकल चुका है — जब तक गौरैयाँ केवल ‘मकान देख’ रही थीं, तब तक उन्हें हटाना आसान था; अब उन्होंने घोंसला बना लिया है, इसलिए वे नहीं जाएँगी।
इसका गहरा अर्थ: माँ की बात में घोंसले और घर का अंतर छिपा है। घोंसला केवल तिनकों का ढेर नहीं होता — वह किसी प्राणी का भविष्य होता है, क्योंकि उसी में अंडे आएँगे और बच्चे पलेंगे। जिसने कहीं अपना घर बना लिया, वह उस जगह से डर के मारे नहीं भागता। यही कारण है कि गौरैयाँ लाठी, ताली और बंद दरवाजों के बाद भी लौटती रहीं।
वाक्य-रचना पर ध्यान दीजिए: ‘पहले उड़ा देते, तो उड़ जातीं’ — यह ऐसी स्थिति की बात है जो अब बीत चुकी है। माँ पिताजी को यह भी जता रही हैं कि देर हो चुकी है, और यही बात आगे उनके हर व्यंग्य की जड़ बनती है।