मल्हार अध्याय 2 मिलकर करें मिलान

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
(क) पाठ में से चुनकर कुछ वाक्य नीचे दिए गए हैं। प्रत्येक वाक्य के सामने दो-दो अर्थ दिए गए हैं। अपने समूह में इन पर चर्चा कीजिए और इन्हें इनके सबसे उपयुक्त अर्थ से मिलाइए।
उत्तर

सही मिलान नीचे दिया गया है। हर पंक्ति में यह भी बताया गया है कि दूसरा अर्थ क्यों नहीं चलेगा।

क्रमवाक्यसबसे उपयुक्त अर्थदूसरा अर्थ क्यों नहीं
1.वह शोर मचता है कि कानों के पर्दे फट जाएँ, पर लोग कहते हैं कि पक्षी गा रहे हैं!पक्षियों का शोर बहुत तेज होता है, लेकिन लोग उसे संगीत की तरह सराहते हैं।दूसरे अर्थ में ‘पिताजी’ जोड़ दिए गए हैं, जबकि वाक्य में पिताजी का नाम है ही नहीं। यहाँ बात सब लोगों की आम आदत की है।
2.आँगन में आम का पेड़ है। तरह-तरह के पक्षी उस पर डेरा डाले रहते हैं।आम के पेड़ पर अलग-अलग प्रकार के पक्षी हर समय निवास करते हैं।‘डेरा डालना’ मुहावरा है — जमकर बैठ जाना। पक्षी सचमुच तंबू नहीं लगाते; दूसरा अर्थ मुहावरे को शब्दशः ले लेता है।
3.वह धमा-चौकड़ी मचती है कि हम लोग ठीक तरह से सो भी नहीं पाते।चूहों की भागदौड़ और शोर इतना होता है कि घर के लोग चैन से सो नहीं पाते।दूसरे अर्थ में शोर मचाने वाले और न सो पाने वाले — दोनों उलट गए हैं। मूल वाक्य से पहले ही लिखा है कि चूहे रात-भर भागते फिरते हैं।
4.वह समझते हैं कि माँ उनका मजाक उड़ा रही हैं।पिताजी को ऐसा भ्रम होने लगता है कि माँ उनकी चेष्टाओं का उपहास कर रही हैं।‘वह समझते हैं’ का अर्थ है — उन्हें ऐसा लगता है। पहला अर्थ (‘मजाक समझ जाते हैं’) क्रिया का अर्थ ही बदल देता है।
5.पिताजी ने लाठी दीवार के साथ टिकाकर रख दी और छाती फैलाए कुर्सी पर आ बैठे।पिताजी ने लाठी एक ओर रख दी और गर्व से, विजयी मुद्रा में बैठ गए।‘छाती फैलाना’ गर्व और विजय की मुद्रा है, हाँफना नहीं। इसी क्षण गौरैयाँ बाहर निकली थीं और माँ तालियाँ बजा रही थीं।
6.इतने में रात पड़ गई।कहानी की घटनाओं के बीच धीरे-धीरे रात हो गई और अँधेरा छा गया।‘रात पड़ना’ भी मुहावरा है। रात कोई वस्तु नहीं जो ऊपर से गिरे — पहला अर्थ मुहावरे को शब्दशः पढ़ने की भूल है।
7.जब हम लोग नीचे उतरकर आए तो वे फिर से मौजूद थीं और मजे से बैठी मल्हार गा रही थीं।गौरैयाँ फिर से लौट आई थीं और शांत व प्रसन्न भाव से चहचहा रही थीं जैसे कोई राग गा रही हों।चिड़ियाँ शास्त्रीय संगीत का अभ्यास नहीं करतीं! ‘मल्हार गाना’ लेखक का प्रयोग है — चहचहाहट को राग का नाम देकर उसमें प्रसन्नता और निश्चिंतता भर देना।
इन सातों में एक ही कौशल की परीक्षा है: क्या आप मुहावरे/लाक्षणिक भाषा और शब्दशः अर्थ में फ़र्क कर पाते हैं? हर पंक्ति में एक ‘जाल’ रखा गया है — या तो मुहावरे को सीधा पढ़ लिया गया है (डेरा, रात पड़ना, मल्हार), या कर्ता-कर्म उलट दिया गया है (धमा-चौकड़ी), या वाक्य में न कही बात जोड़ दी गई है (पिताजी)।
प्र2.
(ख) अपने उत्तर को अपने मित्रों के उत्तर से मिलाइए और विचार कीजिए कि आपने कौन-से अर्थ का चुनाव किया है और क्यों?
उत्तर

यह जोड़ी/समूह में करने का काम है। मिलान करते समय अपने चुनाव को इन तीन जाँचों पर कसिए —

  1. क्या वाक्य में वह बात सचमुच लिखी है? जो नाम या भाव वाक्य में नहीं है, वह अर्थ में भी नहीं आना चाहिए (जैसे 1 में ‘पिताजी’)।
  2. क्या यहाँ कोई मुहावरा है? ‘डेरा डालना’, ‘रात पड़ना’, ‘छाती फैलाना’, ‘मल्हार गाना’ — इनका सीधा अर्थ लेने पर वाक्य हास्यास्पद हो जाता है।
  3. कौन क्या कर रहा है? कर्ता और कर्म बदल देने से अर्थ पूरा उलट जाता है (क्रम 3 और 4)।
नमूना उत्तर: “हमारे समूह में क्रम 5 पर मतभेद हुआ। एक साथी ने ‘छाती और साँस फूलने लगी’ चुना था, क्योंकि पिताजी सचमुच थक गए थे। पर हमने पाठ का अगला वाक्य पढ़ा — ‘आज दरवाजे बंद रखो,’ उन्होंने हुक्म दिया — तब सबको लगा कि यहाँ थकान नहीं, विजय का भाव है। इसलिए हमने पहला अर्थ चुना।”
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