मल्हार अध्याय 2 मेरी समझ से

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
(क) निम्नलिखित प्रश्नों के उपयुक्त उत्तर के सम्मुख तारा (★) बनाइए। कुछ प्रश्नों के एक से अधिक उत्तर भी हो सकते हैं। (1) पिताजी ने कहा कि घर सराय बना हुआ है क्योंकि— • घर की बनावट सराय जैसी बहुत विशाल है • घर में विभिन्न पक्षी और जीव-जंतु रहते हैं • पिताजी और माँ घर के मालिक नहीं हैं • घर में विभिन्न जीव-जंतु आते-जाते रहते हैं
उत्तर

तारा (★) दो विकल्पों पर बनेगा — ‘घर में विभिन्न पक्षी और जीव-जंतु रहते हैं’ और ‘घर में विभिन्न जीव-जंतु आते-जाते रहते हैं’

विकल्पसही / ग़लतकारण
घर की बनावट सराय जैसी बहुत विशाल हैग़लतकहानी में घर के आकार की कोई बात ही नहीं है। पिताजी घर की बनावट पर नहीं, उसमें आने-जाने वालों की भीड़ पर टिप्पणी कर रहे हैं।
घर में विभिन्न पक्षी और जीव-जंतु रहते हैंसही ★घर में चूहे बसते हैं, कबूतर हैं, छिपकलियाँ हैं, चींटियों की “फौज” है — ये सब वहाँ रहते हैं, मेहमान नहीं हैं।
पिताजी और माँ घर के मालिक नहीं हैंग़लतमकान उन्हीं का है। “घर के मालिक तो कोई दूसरे ही हैं” पिताजी का व्यंग्य है, कानूनी तथ्य नहीं।
घर में विभिन्न जीव-जंतु आते-जाते रहते हैंसही ★सराय की पहचान ही यही है — आना-जाना लगा रहे। बिल्ली “कभी-कभी झाँक जाती है”, तोते-गौरैयाँ आ पहुँचते हैं, चमगादड़ शाम को आते हैं।
क्यों दो उत्तर सही हैं: सराय शब्द में दो बातें एक साथ हैं — बहुत सारे प्राणी और लगातार आवाजाही। पिताजी की शिकायत यही है कि घर पर उनका एकाधिकार नहीं रहा; इसीलिए वे आगे जोड़ते हैं — “हम तो जैसे यहाँ मेहमान हैं।” प्रश्न में पहले ही कहा गया है कि एक से अधिक उत्तर हो सकते हैं, इसलिए दोनों पर तारा बनाना ही पूरा उत्तर है।
प्र2.
(2) कहानी में ‘घर के असली मालिक’ किसे कहा गया है? • माँ और पिताजी को जिनका वह मकान है • लेखक को जिसने यह कहानी लिखी है • जीव-जंतुओं को जो उस घर में रहते थे • मेहमानों को जो लेखक से मिलने आते थे
उत्तर

सही उत्तर है — जीव-जंतुओं को जो उस घर में रहते थे। इसी के सामने तारा (★) बनाइए।

कहानी की पहली ही पंक्तियों में पिताजी कहते हैं — “हम तो जैसे यहाँ मेहमान हैं, घर के मालिक तो कोई दूसरे ही हैं।” ‘कोई दूसरे’ का अर्थ यहाँ चूहे, गौरैयाँ, कबूतर, चमगादड़, छिपकलियाँ, चींटियाँ और बिल्ली ही हैं — क्योंकि वही घर पर बिना पूछे कब्जा जमाए बैठे हैं।

यह व्यंग्य कैसे काम करता है: लेखक ‘मालिक’ और ‘मेहमान’ की जगह आपस में बदल देता है। कानूनी मालिक मेहमान बन जाता है और बिन बुलाए प्राणी मालिक। इस उलटफेर से पाठक को हँसी भी आती है और यह बात भी चुपचाप बैठ जाती है कि घर पर केवल मनुष्य का हक नहीं है — यही पूरी कहानी का मूल भाव है।
प्र3.
(3) गौरैयों के प्रति माँ और पिताजी की प्रतिक्रियाएँ कैसी थीं? • दोनों ने खुशी से घर में उनका स्वागत किया • पिताजी ने उन्हें भगाने की कोशिश की लेकिन माँ ने मना किया • दोनों ने मिलकर उन्हें घर से बाहर निकाल दिया • माँ ने उन्हें निकालने के लिए कहा लेकिन पिताजी ने घर में रहने दिया
उत्तर

सही उत्तर है — पिताजी ने उन्हें भगाने की कोशिश की लेकिन माँ ने मना किया।

पिताजीमाँ
ताली बजाई, “श...शू” किया, बाँहें झुलाईं, कूदेखिलखिलाकर हँस दीं
लाठी से पंखे का गोला ठकोरा, चिड़ियों पर “हमला बोल दिया”“तुम तो बड़े समझदार हो जी…” — व्यंग्य से सलाह दी
दरवाजों के नीचे और रोशनदान में कपड़े ठूँसे“देखो जी, चिड़ियों को मत निकालो” — इस बार गंभीरता से
स्टूल पर चढ़कर घोंसला नोचने लगेअंत में उठकर सभी दरवाजे खोल दिए
क्यों बाकी विकल्प नहीं: ‘दोनों ने खुशी से स्वागत किया’ ग़लत है, क्योंकि पिताजी शुरू से गुस्से में हैं। ‘दोनों ने मिलकर निकाल दिया’ भी ग़लत है — माँ ने एक बार भी सहायता नहीं की (“माँ मदद तो करती नहीं थीं, बैठी हँसे जा रही थीं”)। चौथा विकल्प तो दोनों की भूमिकाएँ उलटी कर देता है।
प्र4.
(4) माँ बार-बार पिताजी की बातों पर मुसकराती और मजाक करती थीं। इससे क्या पता चलता है? • माँ चाहती थीं कि गौरैयाँ घर से भगाई न जाएँ • माँ को पिताजी के प्रयत्न व्यर्थ लगते थे • माँ को गौरैयों की गतिविधियों पर हँसी आ जाती थी • माँ को दूसरों पर हँसना और उपहास करना अच्छा लगता था
उत्तर

तारा (★) पहले दो विकल्पों पर — ‘माँ चाहती थीं कि गौरैयाँ घर से भगाई न जाएँ’ और ‘माँ को पिताजी के प्रयत्न व्यर्थ लगते थे’

  • पहला क्यों: माँ का सबसे गंभीर वाक्य यही है — “देखो जी, चिड़ियों को मत निकालो… अब तो इन्होंने अंडे भी दे दिए होंगे।” और अंत में वही उठकर सभी दरवाजे खोल देती हैं ताकि माँ-बाप गौरैयाँ अपने बच्चों तक पहुँच सकें। इससे बड़ा प्रमाण क्या होगा?
  • दूसरा क्यों: “छोड़ो जी, चूहों को तो निकाल नहीं पाए, अब चिड़ियों को निकालेंगे!” और “चलो, दो तिनके तो निकल गए, अब बाकी दो हजार भी निकल जाएँगे!” — दोनों वाक्य साफ़ कहते हैं कि माँ को यह मेहनत बेकार लग रही थी।
तीसरा और चौथा विकल्प क्यों नहीं: माँ की हँसी गौरैयों की हरकतों पर नहीं, पिताजी की हरकतों पर है — वे कहती भी हैं, “चिड़ियाँ पूछ रही हैं कि यह आदमी कौन है और नाच क्यों रहा है?” और चौथा विकल्प माँ के चरित्र पर अन्याय है: वे किसी का उपहास करने के लिए नहीं हँसतीं, बल्कि इसलिए हँसती हैं कि वे शुरू से जानती हैं कि लड़ाई किस ओर जाएगी। उनका मज़ाक हथियार नहीं, समझदारी है।
प्र5.
(5) कहानी में गौरैयों के बार-बार लौटने को जीवन के किस पहलू से जोड़ा जा सकता है? • दूसरों पर निर्भर रहना • असफलताओं से हार मान लेना • अपने प्रयास को निरंतर जारी रखना • संघर्ष को छोड़कर नए रास्ते अपनाना
उत्तर

सही उत्तर है — अपने प्रयास को निरंतर जारी रखना।

गौरैयाँ हर बार निकाली जाती हैं और हर बार लौट आती हैं — कभी दरवाजे के नीचे की खाली जगह से, कभी टूटे शीशे वाले रोशनदान से, कभी “न जाने किस रास्ते से”। रोचक बात यह है कि थकता कौन है — पिताजी, जो कहते तो हैं “मैं हार मानने वाला आदमी नहीं हूँ,” पर आखिर “तंग आ गए थे” और उनकी “सहनशीलता चुक गई”।

बाकी विकल्प क्यों नहीं: गौरैयाँ किसी पर निर्भर नहीं हैं — घोंसला उन्होंने स्वयं बनाया, तिनके स्वयं जुटाए। हार भी उन्होंने नहीं मानी। और ‘नए रास्ते अपनाना’ भी ग़लत है — नए रास्ते तो उन्होंने ज़रूर खोजे, पर लक्ष्य वही रहा: वही घोंसला, वही घर। संघर्ष छोड़ा नहीं, केवल तरीका बदला।
ध्यान दें: यह लगन अंधी ज़िद नहीं है। गौरैयाँ इसलिए नहीं लौटतीं कि उन्हें जीतना है, बल्कि इसलिए कि वहाँ उनके अंडे हैं। कहानी का यही मोड़ अंत में पिताजी का मन भी बदल देता है।
प्र6.
(ख) हो सकता है कि आपके समूह के साथियों ने अलग-अलग उत्तर चुने हों। अपने मित्रों के साथ विचार कीजिए कि आपने ये उत्तर ही क्यों चुने?
उत्तर

यह चर्चा की गतिविधि है। इसमें उत्तर ‘सही या ग़लत’ से ज़्यादा महत्वपूर्ण यह है कि आप अपने चुनाव का कारण पाठ से दे सकें

चर्चा कैसे कीजिए:

  1. हर साथी अपना चुना हुआ विकल्प पढ़े और उसके साथ कहानी की एक पंक्ति बोले जो उसके पक्ष में जाती है।
  2. जहाँ मतभेद हो, वहाँ यह देखिए कि दूसरे साथी ने कहानी का कौन-सा हिस्सा पढ़ा है जो आपने नहीं पढ़ा।
  3. अंत में तय कीजिए — क्या दोनों उत्तर साथ-साथ सही हो सकते हैं? (प्रश्न 1 और 4 में ऐसा ही है।)
नमूना उत्तर: “मैंने प्रश्न 4 में ‘माँ को पिताजी के प्रयत्न व्यर्थ लगते थे’ चुना, क्योंकि माँ का हर व्यंग्य पिताजी की मेहनत की ओर ही इशारा करता है — ‘अब बाकी दो हजार भी निकल जाएँगे!’ मेरे मित्र ने ‘माँ चाहती थीं कि गौरैयाँ भगाई न जाएँ’ चुना और उसका प्रमाण भी मजबूत था — अंत में माँ ने ही सारे दरवाजे खोले। चर्चा के बाद हमें लगा कि दोनों उत्तर एक-दूसरे को काटते नहीं, जोड़ते हैं — माँ को प्रयत्न इसीलिए व्यर्थ लगते थे क्योंकि वे मन से गौरैयों के साथ थीं।”
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