मल्हार अध्याय 2 हास्य-व्यंग्य

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
(क) आपको इस कहानी में कौन-कौन से वाक्य पढ़कर हँसी आई? उन वाक्यों को चुनकर लिखिए।
उत्तर

हँसी लाने वाले वाक्यों को छाँटते समय यह देखिए कि हँसी किस बात से आ रही है — बढ़ा-चढ़ाकर कहने से, किसी की मुद्रा से, या बात के उलट जाने से।

वाक्यहँसी क्यों आती है
“जो भी पक्षी पहाड़ियों-घाटियों पर से उड़ता हुआ दिल्ली पहुँचता है… जैसे हमारे घर का पता लिखवाकर लाया हो।”बात इतनी बढ़ा-चढ़ाकर कही गई है कि पक्षियों के पास घर का पता होने की कल्पना बन जाती है।
“एक चूहा अँगीठी के पीछे बैठना पसंद करता है, शायद बूढ़ा है उसे सर्दी बहुत लगती है।”चूहे को बूढ़ा आदमी बना दिया गया है — जिसे सर्दी लगती है और जिसकी अपनी पसंदीदा जगह है।
“उन्होंने जोर से ताली बजाई और मुँह से ‘श...शू’ कहा, बाँहें झुलाईं, फिर खड़े-खड़े कूदने लगे।”एक गंभीर, गुस्सैल पिता का यह दृश्य ही हास्यास्पद है — और वे इसे बड़ी गंभीरता से कर रहे हैं।
“चिड़ियाँ एक-दूसरे से पूछ रही हैं कि यह आदमी कौन है और नाच क्यों रहा है?”पिताजी की चेष्टा को चिड़ियों की आँख से दिखा दिया गया — और वहाँ से वह ‘नाच’ लगती है।
“एक बार तो झूलती लाठी माँ के सिर पर लगते-लगते बची।”निशाना चिड़ियों पर था और खतरा माँ पर आ गया — यही उलटफेर हँसाता है।
“तुम तो बड़े समझदार हो जी, सभी दरवाजे खुले हैं और तुम गौरैयों को बाहर निकाल रहे हो।”तारीफ़ के शब्दों में उलटी बात कही गई है।
“चलो, दो तिनके तो निकल गए, अब बाकी दो हजार भी निकल जाएँगे!”बहुत बड़ी संख्या बताकर पिताजी की सफलता को नन्हा-सा दिखा दिया गया।
“इतनी तकलीफ करने की क्या जरूरत थी। पंखा चला देते, तो ये उड़ जातीं।”इतनी मेहनत के बाद इतना आसान उपाय सुनना — यही विडंबना हँसाती है।
प्र2.
(ख) अब चुने हुए वाक्यों में से कौन-कौन से वाक्य ‘व्यंग्य’ कहे जा सकते हैं? उन पर सही का चिह्न लगाइए।
उत्तर

पहचान की कसौटी यह है — क्या बात सीधे कही गई है या उलटी/संकेत से? और क्या उसमें किसी की कमी या विडंबना उजागर हो रही है? दोनों उत्तर ‘हाँ’ हों, तभी वह व्यंग्य है।

वाक्यव्यंग्य?कारण
“छोड़ो जी, चूहों को तो निकाल नहीं पाए, अब चिड़ियों को निकालेंगे!”कहा जा रहा है ‘निकालेंगे’, अर्थ है ‘नहीं निकाल पाओगे’। पिताजी की पिछली असफलता याद दिलाकर उनकी कमी उजागर की गई है। पाठ स्वयं कहता है — “माँ ने व्यंग्य से कहा।”
“तुम तो बड़े समझदार हो जी, सभी दरवाजे खुले हैं और तुम गौरैयों को बाहर निकाल रहे हो।”‘बड़े समझदार’ प्रशंसा के शब्द हैं, पर आशय उलटा है — यही व्यंग्य की सबसे पहचानी हुई चाल है।
“चलो, दो तिनके तो निकल गए, अब बाकी दो हजार भी निकल जाएँगे!”ऊपर से उत्साह, भीतर से यह चिढ़ाना कि इस गति से काम कभी पूरा नहीं होगा।
“इतनी तकलीफ करने की क्या जरूरत थी। पंखा चला देते, तो ये उड़ जातीं।”सहानुभूति के रूप में कही गई बात, पर उसका असली अर्थ है — तुमने बेकार में मेहनत की।
“चिड़ियाँ पूछ रही हैं कि यह आदमी कौन है और नाच क्यों रहा है?”पिताजी के प्रयास को ‘नाच’ कहकर उसका उपहास किया गया है — और वह भी सीधे नहीं, चिड़ियों के मुँह से।
“उन्होंने ताली बजाई… फिर खड़े-खड़े कूदने लगे।”✗ (केवल हास्य)यह घटना का सीधा वर्णन है। इसमें कोई उलटी बात या संकेत नहीं है — हँसी दृश्य से आती है, कहने के ढंग से नहीं।
“शायद बूढ़ा है उसे सर्दी बहुत लगती है।”✗ (हास्य + कल्पना)यह चूहे के मन का मीठा अनुमान है, किसी की कमी उजागर करना नहीं।
“झूलती लाठी माँ के सिर पर लगते-लगते बची।”✗ (परिस्थितिजन्य हास्य)हँसी स्थिति से पैदा हुई है, भाषा के मोड़ से नहीं।
हास्य और व्यंग्य में अंतर: हास्य केवल हँसाता है; व्यंग्य हँसाते हुए चोट भी करता है और सोचने पर मजबूर भी। इसीलिए इस कहानी के सारे व्यंग्य माँ के मुँह से निकलते हैं — वे लड़ती नहीं, हँसाती हैं, पर उनकी हर हँसी में एक तर्क छिपा है। पुस्तक की परिभाषा भी यही कहती है: “व्यंग्य में बात को सीधे न कहकर उलटा या संकेतात्मक ढंग से कहा जाता है ताकि उसमें चुटकीलापन भी हो और गंभीर सोच की संभावना भी बनी रहे।”
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