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‘दो गौरैया’ कहानी में आपने पढ़ा कि ‘दो गौरैया’ लेखक के घर में बिन बुलाए अतिथि की तरह आ जाती हैं। पिछले कई वर्षों से गाँव-नगरों में इन नन्हीं चिड़ियों की संख्या निरंतर कम होती जा रही है। इसलिए भारत सरकार ने इनके संरक्षण के लिए 20 मार्च को ‘विश्व गौरैया दिवस’ घोषित किया है। आइए, पढ़ते हैं ‘विश्व गौरैया दिवस’ पर प्रेस सूचना ब्यूरो द्वारा प्रकाशित लेख का एक अंश—
उत्तर
पढ़ने के बाद इस अंश की मुख्य बातें ये हैं —
- दिवस: हर साल 20 मार्च को विश्व गौरैया दिवस मनाया जाता है, ताकि इन छोटे प्राणियों के प्रति जागरूकता बढ़े और उनकी रक्षा हो सके।
- स्थिति: जो घरेलू गौरैया कभी बहुतायत में पाई जाती थी, वह अब कई जगहों पर “एक दुर्लभ दृश्य और रहस्य बन गई है”।
- सांस्कृतिक महत्व: “भारत में गौरैया सिर्फ़ पक्षी नहीं हैं; वे साझा इतिहास और संस्कृति का प्रतीक हैं।” हिंदी में गौरैया, तमिल में कुरुवी, उर्दू में चिरिया — कई नामों से जानी जाती हैं और पीढ़ियों से दैनिक जीवन का हिस्सा रही हैं।
गौरैया के घटने के कारण (लेख के अनुसार):
| कारण | असर |
|---|---|
| सीसा रहित पेट्रोल के उपयोग से पैदा हुए जहरीले यौगिक | वे उन कीटों को नुकसान पहुँचाते हैं जिन पर गौरैया भोजन के लिए निर्भर है |
| शहरीकरण | गौरैया के प्राकृतिक घोंसले के स्थान छिन गए |
| आधुनिक इमारतों की बनावट | उनमें वे कोने-छेद ही नहीं होते जहाँ गौरैया घोंसला बना सके, इसलिए बच्चों को पालने की जगह कम हो गई |
साभार: पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (भारत सरकार)।
यह लेख कहानी के साथ क्यों रखा गया है: कहानी में पिताजी दरवाजों के नीचे कपड़े ठूँसते हैं और रोशनदान का टूटा शीशा बंद कर देते हैं — यानी वे गौरैयों के रास्ते बंद कर देते हैं। लेख बताता है कि आज पूरे देश में यही हो रहा है, पर अनजाने में: नई इमारतों में रोशनदान, छज्जे और दरारें ही नहीं बचे। कहानी एक घर की बात करती है, लेख पूरे शहर की — और दोनों का निष्कर्ष एक ही है: जगह न बचे, तो पक्षी भी नहीं बचते।
Check it yourself: अपने घर के आस-पास गिनिए कि सुबह कितनी गौरैयाँ दिखती हैं। फिर घर के किसी बड़े से पूछिए कि उनके बचपन में कितनी दिखती थीं। यह छोटा-सा सर्वेक्षण लेख की बात को आँकड़ों से भी अच्छा समझा देगा।