प्र1.
“कमरे में फिर से शोर होने लगा था, पर अबकी बार पिताजी उनकी ओर देख-देखकर केवल मुसकराते रहे।” इस पंक्ति में बताया गया है कि पिताजी का दृष्टिकोण कैसे बदल गया। इस प्रकार यह विशेष वाक्य है। इस तरह के वाक्यों से कहानी और अधिक प्रभावशाली बन जाती है। (क) आपको इस कहानी में ऐसी अनेक विशेषताएँ दिखाई देंगी। उन्हें अपने समूह के साथ मिलकर ढूँढ़िए और उनकी सूची बनाइए।
उत्तर
पहले उस नमूने वाले वाक्य को समझिए। कहानी की शुरुआत में यही शोर पिताजी को असह्य था — “वह शोर मचता है कि कानों के पर्दे फट जाएँ”। अंत में शोर वही है, पर प्रतिक्रिया उलट गई है। लेखक ने कहीं नहीं लिखा कि “पिताजी को गौरैयों से प्रेम हो गया” — उसने केवल एक मुसकान दिखाई, और पूरा परिवर्तन पाठक तक पहुँच गया।
कहानी की विशेषताओं की सूची:
- प्रथम पुरुष कथन — घर का बेटा ‘मैं’ बनकर सुनाता है, इसलिए घटनाएँ पास से देखी हुई लगती हैं।
- अतिशयोक्ति से हास्य — “बीसियों तो चूहे बसते हैं”, “चींटियों की तो जैसे फौज ही छावनी डाले हुए है”।
- छोटे-छोटे संवाद — पूरी कहानी बातचीत से आगे बढ़ती है, वर्णन से नहीं।
- व्यंग्य — माँ का हर वाक्य सीधा नहीं, तिरछा है।
- पशु-पक्षियों का मानवीकरण — बिल्ली ‘फिर आऊँगी’ कहती है, चमगादड़ ‘कसरत’ करते हैं, गौरैयाँ ‘निरीक्षण’ करती हैं।
- दोहराव से गति — निकालना–लौटना, निकालना–लौटना; हर बार एक नया रास्ता। इसी से कहानी में लय बनती है।
- बिना उपदेश का अंत — कोई सीख नहीं लिखी गई, केवल एक दृश्य छोड़ दिया गया।
- छोटे ब्योरों से बड़ी बात — “कुछ-कुछ दुबला गई थीं, कुछ-कुछ काली पड़ गई थीं” — इससे गौरैयों का दुख बिना कहे कह दिया गया।
- सामान्य घर का सामान्य दृश्य — पंखा, रोशनदान, अँगीठी, लाठी, स्टूल; कोई असाधारण घटना नहीं, फिर भी कहानी बँधी रहती है।
समूह-कार्य कैसे कीजिए: कहानी को चार हिस्सों में बाँट लीजिए और हर समूह अपने हिस्से से ऐसे ‘विशेष वाक्य’ छाँटे जो कुछ बदलते हुए दिखाते हों। फिर सब मिलाकर एक सूची बनाइए।