प्र1.
कक्षा में एक वाद-विवाद गतिविधि का आयोजन कीजिए। वाद-विवाद का विषय है— “माँ चिड़ियों को घर से निकालना चाहती थीं।” कक्षा में आधे समूह इस कथन के पक्ष में और आधे समूह इसके विपक्ष में तर्क देंगे।
उत्तर
वाद-विवाद में दोनों पक्षों के तर्क पाठ की पंक्तियों पर टिके होने चाहिए, अपनी राय पर नहीं। नीचे दोनों ओर की सामग्री दी गई है।
| पक्ष में (हाँ, माँ निकालना चाहती थीं) | विपक्ष में (नहीं, माँ नहीं निकालना चाहती थीं) |
|---|---|
| उपाय उन्होंने ही बताया — “एक दरवाजा खुला छोड़ो, बाकी दरवाजे बंद कर दो। तभी ये निकलेंगी।” | वही उपाय गौरैयों को सुरक्षित बाहर निकालने का था — लाठी से मारने से बचाने का। |
| “पंखा चला देते, तो ये उड़ जातीं” — यह भी निकालने का ही सुझाव है। | पंखा चलाना लाठी घुमाने से कम खतरनाक था; और यह बात उन्होंने हँसकर कही, गंभीरता से नहीं। |
| जब गौरैयाँ बाहर निकल गईं, तो माँ तालियाँ बजाने लगीं। | तालियाँ गौरैयों के जाने पर नहीं, पिताजी की मेहनत के तमाशे पर थीं — पूरी कहानी में वे यही करती आई हैं। |
| उन्होंने पिताजी को कभी सीधे रोका नहीं, केवल टिप्पणी की। | अंत में उन्होंने सीधे रोका — “देखो जी, चिड़ियों को मत निकालो… अब तो इन्होंने अंडे भी दे दिए होंगे।” — और यह बात ‘गंभीरता से’ कही। |
| — | अंत में माँ ने ही उठकर सभी दरवाजे खोल दिए, ताकि माँ-बाप गौरैयाँ अंदर आ सकें। |
| — | वे बार-बार दोहराती रहीं — “ये निकलेंगी नहीं, जी”, “अब ये यहाँ से नहीं जाएँगी” — यानी वे मन ही मन उनके रुकने के पक्ष में थीं। |
निष्कर्ष (जो सभा के अंत में कहा जा सकता है): पाठ के प्रमाण विपक्ष की ओर भारी हैं। माँ के सुझाव निकालने के लिए नहीं, बल्कि पिताजी की तोड़-फोड़ रोकने के लिए थे — उन्होंने हर बार वह उपाय बताया जिसमें चिड़ियों को चोट न पहुँचे। और सबसे बड़ा प्रमाण कहानी का अंतिम मोड़ है: दरवाजे उन्होंने खोले, बंद नहीं किए।
वाद-विवाद कैसे कीजिए: हर वक्ता 2 मिनट बोले; तर्क के साथ पाठ की पंक्ति पढ़कर सुनाए; व्यक्तिगत टिप्पणी न करे। अंत में एक साथी दोनों पक्षों के तर्क बोर्ड पर लिखे और कक्षा मिलकर तय करे कि किस पक्ष के पास अधिक प्रमाण थे — किसके पास अधिक ऊँची आवाज थी, यह नहीं।