मल्हार अध्याय 2 पाठ से आगे

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
(क) “गौरैयों ने घोंसले में से सिर निकालकर नीचे की ओर झाँककर देखा और दोनों एक साथ ‘चीं-चीं’ करने लगीं।” आपने अपने घर के आस-पास पक्षियों को क्या-क्या करते देखा है? उनके व्यवहार में आपको कौन-कौन से भाव दिखाई देते हैं?
उत्तर

इस प्रश्न में अपना निरीक्षण लिखना है। अच्छा उत्तर वह है जिसमें पहले पक्षी का काम लिखा हो, फिर उससे झलकने वाला भाव

पक्षी का व्यवहारदिखाई देने वाला भाव
गौरैया का आँगन में फुदकना, नल के नीचे पानी में नहाना और पंख फड़फड़ानानिश्चिंतता और उल्लास
कौए का किसी बिल्ली या चील को देखकर लगातार काँव-काँव करना और सब कौओं का इकट्ठा हो जानाचेतावनी और मिल-जुलकर बचाव
कबूतर का दूसरे कबूतर के आगे-पीछे गरदन फुलाकर घूमनाप्रेम-निवेदन और अधिकार-भाव
चिड़िया का चोंच में तिनका दबाए बार-बार एक ही जगह आनातैयारी और घर बनाने की लगन
घोंसले के पास कोई आ जाए तो चिड़िया का तेज-तेज चीखना और सिर पर मँडरानाडर और संतान की रक्षा का आवेग
बच्चों का मुँह खोलकर लगातार चीं-चीं करनाभूख और भरोसा — कि माँ-बाप जरूर आएँगे
शाम को तोतों और मैनाओं का झुंड बनाकर एक ही पेड़ पर लौटना और खूब शोर करनादिन भर की थकान के बाद घर लौटने की खुशी
नमूना उत्तर: हमारे आँगन में तुलसी के गमले के पास रोज सुबह दो गौरैयाँ आती हैं। पहले वे इधर-उधर देखती हैं, फिर पानी के कटोरे में उतरकर खूब नहाती हैं और पंख झाड़ती हैं — उस समय उनमें बिल्कुल बच्चों जैसी मस्ती दिखती है। पर जिस दिन छत पर बिल्ली दिख जाती है, उनकी आवाज ही बदल जाती है — तेज, रुक-रुककर, और वे नीचे उतरती ही नहीं। इससे मुझे लगता है कि उनकी अलग-अलग आवाजों के अलग-अलग अर्थ हैं, ठीक जैसे कहानी में बच्चों की ‘चीं-चीं’ का अर्थ था — हम आ गई हैं, हमारे माँ-बाप कहाँ हैं?
प्र2.
(ख) “कमरे में फिर से शोर होने लगा था, पर अबकी बार पिताजी उनकी ओर देख-देखकर केवल मुसकराते रहे।” कहानी के अंत में पिताजी गौरैयों का अपने घर में रहना स्वीकार कर लेते हैं। क्या आप भी कोई स्थान या वस्तु किसी अन्य के साथ साझा करते हैं? उनके बारे में बताइए। साझेदारी में यदि कोई समस्या आती है तो उसे कैसे हल करते हैं?
उत्तर

उत्तर में तीन बातें आनी चाहिए — क्या साझा करते हैं, क्या समस्या आती है, और उसे कैसे हल करते हैं

साझा की जाने वाली चीजआम समस्याहल
भाई-बहन के साथ पढ़ने की मेजएक को शांति चाहिए, दूसरे को बोलकर पढ़ना हैसमय बाँट लेना — पहले एक घंटा एक का, फिर दूसरे का
कक्षा में साथी के साथ बेंचजगह और सामान फैलाने पर झगड़ाबीच में एक सीमा तय कर लेना और पहले से पूछकर सामान लेना
मोहल्ले का मैदानछोटे बच्चे और बड़े लड़के एक साथ खेलना चाहते हैंमैदान के हिस्से और खेलने के समय बाँट देना
घर का आँगन — पक्षियों और गिलहरियों के साथदाना बिखरता है, बीट गिरती हैएक कोना उनके लिए तय कर देना और वहीं सफाई करना
नमूना उत्तर: मैं अपनी साइकिल छोटे भाई के साथ साझा करता हूँ। शुरू में रोज झगड़ा होता था — कभी वह देर से लौटता, कभी हवा निकाल आता। फिर हमने तीन नियम बना लिए: (1) स्कूल के दिनों में शाम को पहले एक घंटा मेरा, फिर उसका; (2) जो चलाकर लाएगा, वही हवा जँचवाएगा; (3) जिसे किसी दिन ज्यादा जरूरत हो, वह पहले से बता देगा। नियम बनने के बाद झगड़ा लगभग खत्म हो गया।

मुझे लगता है कि साझेदारी की सबसे बड़ी शर्त यही है — दूसरे की जरूरत को भी असली मानना। कहानी में पिताजी की गलती यही थी कि उन्हें गौरैयों की जरूरत ‘असली’ लगती ही नहीं थी; उन्हें केवल अपना कालीन दिख रहा था। जिस क्षण उन्हें दो नन्हीं चोंचें दिखीं, साझेदारी अपने-आप बन गई।
प्र3.
(ग) परिवार के लोग गौरैयों को घर से बाहर भगाने की कोशिश करते हैं, किंतु गौरैयों के बच्चों के कारण उनका दृष्टिकोण बदल जाता है। क्या आपके साथ कभी ऐसा हुआ है कि किसी को देखकर या किसी से मिलकर आपका दृष्टिकोण बदल गया हो?
उत्तर

यह अनुभव का प्रश्न है। अच्छे उत्तर की बनावट यह रहेगी — पहले मैं क्या सोचता था → फिर क्या हुआ/दिखा → अब क्या सोचता हूँ। कहानी भी ठीक इसी क्रम में चलती है।

नमूना उत्तर: हमारी गली के कोने पर एक बुजुर्ग रहते हैं जो हमेशा चिल्लाते रहते थे — “गेंद मत मारो!”, “यहाँ मत खेलो!” हम सब उन्हें चिड़चिड़ा और झगड़ालू मानते थे और उनके घर के आगे जान-बूझकर शोर करते थे।

एक दिन हमारी गेंद उनके आँगन में चली गई। मैं डरते-डरते लेने गया तो देखा कि आँगन में ढेर सारे गमले हैं और वे एक-एक पत्ती पोंछ रहे हैं। उन्होंने गेंद उठाकर दी और बस इतना कहा, “बेटा, गेंद से डंठल टूट जाता है। ये पौधे मेरी पत्नी लगाकर गई थीं।”

उस एक वाक्य ने मेरा पूरा दृष्टिकोण बदल दिया। वे झगड़ालू नहीं थे — वे कुछ बचाने की कोशिश कर रहे थे, और हमें यह पता ही नहीं था। उसके बाद हमने खेलने की जगह थोड़ी आगे कर ली, और अब वे कभी-कभी हमारा खेल देखने भी आ जाते हैं।

इस अनुभव में और कहानी में एक ही बात समान है — दृष्टिकोण तर्क से नहीं बदलता, कारण दिख जाने से बदलता है। पिताजी को भी किसी ने समझाया नहीं था; उन्होंने बस दो नन्हीं गौरैयाँ देख लीं।
लिखते समय ध्यान रखें: केवल ‘मेरी सोच बदल गई’ लिख देना काफी नहीं। वह क्षण बताइए जिसमें बदलाव हुआ — कहानी में वह क्षण एक आवाज है: “चीं-चीं, चीं-चीं!!!”
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