मल्हार अध्याय 6 आपकी बात

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
(क) कहानी में वृद्धा की पोती अपने घर से बहुत प्यार करती थी। आपके घर से अपने लगाव का अनुभव बताइए।
उत्तर

यह आपका अपना अनुभव है, इसलिए उत्तर आपके ही घर से आएगा। पर एक बात याद रखिए — घर से लगाव दीवारों से नहीं, दीवारों में जमा यादों से होता है। इसलिए घर का वर्णन मत कीजिए, कोई एक याद बताइए।

सोचने के लिए —

  • घर की कौन-सी एक जगह है जो सिर्फ़ आपकी है? (छत, सीढ़ी का कोना, खिड़की के पास की जगह)
  • घर की कौन-सी आवाज़ या गंध आपको सबसे पहले याद आती है?
  • कोई ऐसी चीज़ जो पुरानी है, काम की नहीं, फिर भी घर से निकाली नहीं गई?
  • कहीं बाहर रहने पर आपको घर की किस चीज़ की सबसे ज़्यादा याद आई?
नमूना उत्तर: “हमारे घर के आँगन में एक अमरूद का पेड़ है, जो शायद मुझसे भी पुराना है। उसके फल छोटे और खट्टे होते हैं, बाज़ार वाले कहीं अच्छे मिलते हैं। पर गर्मी की छुट्टियों में हम सब भाई-बहन उसी के नीचे बैठते हैं। पिछले साल पड़ोसी ने कहा कि इसे कटवा दो, धूप रुकती है। माँ ने मना कर दिया। उस दिन मुझे समझ आया कि हमें उस पेड़ से अमरूद नहीं चाहिए — हमें वह छाया चाहिए जिसमें हम बड़े हुए हैं। पोती की बात मुझे इसीलिए समझ में आती है। उसे रोटी नहीं चाहिए थी, अपने घर की रोटी चाहिए थी।”
प्र2.
(ख) क्या कभी आपको किसी स्थान, वस्तु या व्यक्ति से इतना लगाव हुआ है कि उसे छोड़ना मुश्किल लगा हो? अपना अनुभव साझा कीजिए।
उत्तर

इस प्रश्न में तीन दिशाएँ खुली हैं — स्थान, वस्तु या व्यक्ति। कोई एक चुनिए और उसी पर टिकिए।

उत्तर में ये तीन बातें आनी चाहिए —

  1. वह क्या था और आपके जीवन में उसकी जगह क्या थी।
  2. छोड़ने की घड़ी कैसी थी — उसी क्षण का एक ब्योरा दीजिए।
  3. उसके बाद क्या बदला, और आपने क्या सीखा।
नमूना उत्तर: “पिताजी का तबादला होने पर हमें अपना पुराना मकान छोड़ना पड़ा। सामान ट्रक में चढ़ चुका था। मैं आखिरी बार खाली कमरों में गया तो देखा — दीवार पर पेंसिल से बनी वे लकीरें अब भी थीं जिनसे हर जन्मदिन पर मेरी लंबाई नापी जाती थी। सबसे नीचे वाली लकीर तब की थी जब मैं तीन साल का था। मैंने बहुत देर तक उन्हें देखा। मन हुआ कि दीवार का वह टुकड़ा साथ ले जाऊँ। नए घर में सब कुछ बेहतर है — बड़ा कमरा, नई खिड़की। पर वे लकीरें वहीं रह गईं। तब मुझे समझ आया कि हम जगह से नहीं, वहाँ बीते समय से बँधे होते हैं। शायद इसीलिए वृद्धा बिना मरे झोंपड़ी से निकलना नहीं चाहती थी।”
प्र3.
(ग) कहानी में ज़मींदार अपने किए पर पश्चाताप कर रहा है। क्या आपने कभी किसी को उनके किए पर पछताते हुए देखा है? उस घटना के बारे में बताइए। यह भी बताइए कि उस पश्चाताप का क्या परिणाम निकला?
उत्तर

प्रश्न के दो हिस्से हैं और दोनों का उत्तर देना ज़रूरी है — घटना और परिणाम। दूसरा हिस्सा ही असली है, क्योंकि कहानी भी यही कहती है कि पश्चाताप तभी पूरा होता है जब वह कुछ बदल दे।

नमूना उत्तर: “हमारी कक्षा में एक लड़के ने किसी और की कॉपी छिपा दी थी, मज़ाक में। जिसकी कॉपी थी, उसे अगले दिन गृहकार्य न करने पर डाँट पड़ी और वह रो पड़ा। छिपाने वाला उस समय चुप रहा। पर छुट्टी के बाद वह अध्यापिका के पास गया और खुद बता दिया। उसे दंड मिला, पर उससे बड़ी बात यह हुई कि उसने अपने साथी से माफ़ी माँगी और उसका पूरा गृहकार्य साथ बैठकर लिखवाया। आज वे दोनों सबसे अच्छे दोस्त हैं। यदि वह चुप रह जाता, तो शायद दोनों कभी दोस्त न बनते।”
कहानी से जोड़िए: ज़मींदार ने भी केवल ‘क्षमा’ नहीं माँगी — उसने झोंपड़ी वापस दे दी। यही अंतर है कहने और करने में। जिस पश्चाताप के बाद कुछ लौटाया या सुधारा न जाए, वह सिर्फ़ अपने मन का बोझ हल्का करना है।
प्र4.
(घ) क्या कभी ऐसा हुआ कि आपने कोई काम गुस्से या अहंकार में किया हो और बाद में पछताए हों? फिर आपने क्या किया? उस अनुभव से आपने क्या सीखा?
उत्तर

यह अपने ऊपर लौटकर देखने वाला प्रश्न है। ईमानदारी से लिखिए — इस तरह के उत्तर में अपनी गलती छिपाना उत्तर को बेकार कर देता है।

उत्तर का ढाँचा — क्या किया → क्यों किया (गुस्सा या अहंकार) → कब समझ आया कि गलत था → फिर क्या किया → अब क्या सीखा।

नमूना उत्तर: “एक बार खेल में मेरे छोटे भाई ने मुझे हरा दिया। सबके सामने हारना मुझे बुरा लगा और गुस्से में मैंने उसका बनाया हुआ मिट्टी का किला तोड़ दिया, जिस पर वह दो दिन से मेहनत कर रहा था। वह रोया नहीं, बस चुपचाप बैठा रहा — और यही मुझे सबसे ज़्यादा चुभा। रात को मैंने उससे माफ़ी माँगी और अगले दिन उसके साथ बैठकर वैसा ही किला दोबारा बनाया, पहले से बड़ा। उस दिन मैंने सीखा कि गुस्सा कुछ ही पलों का होता है, पर उसमें किया गया काम बहुत दिन तक याद रहता है। और यह भी कि टूटी हुई चीज़ बनाई जा सकती है, बशर्ते आप उसे बनाने में खुद हाथ लगाएँ।”
कहानी की याद: ज़मींदार ने भी अहंकार में एक घर छीना और बाद में वही घर लौटाया। ध्यान दीजिए — भरपाई उसने अपने हाथ से की, नौकरों से नहीं करवाई। गलती सुधारने में भी वही अपने हाथ का काम चाहिए जो टोकरी उठाने में चाहिए था।
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