मल्हार अध्याय 7 अनुमान और कल्पना से

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
(क) मान लीजिए आप एक नया संसार बनाना चाहते हैं। उस संसार में आप क्या-क्या रखना चाहेंगे और क्या-क्या नहीं? अपने उत्तर का कारण भी बताइए।
उत्तर

इस प्रश्न का अच्छा उत्तर सूची भर नहीं होता। हर चीज़ के साथ कारण लिखिए, और कारण ऐसा हो जो किसी एक व्यक्ति के लिए नहीं, सबके लिए ठीक बैठे।

यह रखूँगा/रखूँगीक्योंयह नहीं रखूँगा/रखूँगीक्यों नहीं
सबके लिए खुला विद्यालय और पुस्तकालयजहाँ सीखने का रास्ता सबके लिए एक जैसा हो, वहीं सपने बराबरी से उगते हैंभेदभाव — जाति, धर्म, लिंग, भाषा या पैसे काभेदभाव सबसे पहले किसी के सपनों के ही पंख काटता है
साफ़ नदियाँ, पेड़ और पशु-पक्षियों की जगहकविता का ‘स्वर्ग’ केवल मनुष्यों का नहीं हैवह विकास जो जंगल और नदी को निगल जाएजो चीज़ लौटाई न जा सके, उसे लेना केवल आरोहण है, अवरोहण नहीं
कला, संगीत और शिल्प के लिए समय‘स्वर्ग बनाने का शिल्प’ कविता में यही हैडर और अपमान से चलने वाली व्यवस्थाडरा हुआ मन नई बात सोच ही नहीं पाता
ग़लती करने और सुधारने की छूटबिना ग़लती के कोई नया काम शुरू ही नहीं होतायुद्ध और हथियारवे उसी को नष्ट करते हैं जो पीढ़ियों में बना हो
नमूना उत्तर: “मेरे संसार में हर बस्ती के बीच एक बग़ीचा और एक पुस्तकालय होगा, ताकि खेलने और पढ़ने के लिए किसी को दूर न जाना पड़े। वहाँ यह पूछा ही नहीं जाएगा कि कौन किस घर से आया है। मैं वहाँ कूड़ा जलाना, पानी बरबाद करना और किसी को नाम लेकर चिढ़ाना — ये तीन चीज़ें नहीं रखूँगा/रखूँगी, क्योंकि तीनों से किसी दूसरे का नुकसान होता है और अपना कुछ भला नहीं होता।”
प्र2.
(ख) कविता में शिल्प और कला के महत्व की बात की गई है। कलाएँ हमारे आस-पास की दुनिया को सुंदर बनाती हैं। आप अपने जीवन को सुंदर बनाने के लिए कौन-सी कला सीखना चाहेंगे? उससे आपका जीवन कैसे सुंदर बनेगा? अनुमान करके बताइए।
उत्तर

उत्तर में तीन बातें होनी चाहिए — कौन-सी कला, क्यों वही, और उससे रोज़ के जीवन में क्या बदलेगा। अंतिम बात सबसे ज़रूरी है, क्योंकि प्रश्न ‘सुंदर बनेगा’ पूछ रहा है, ‘सीख लूँगा’ नहीं।

कलाक्या सिखाती हैजीवन में क्या बदलता है
चित्रकलाध्यान से देखनारोज़ की साधारण चीज़ें — पेड़, छाया, बरतन — दिलचस्प लगने लगती हैं
संगीत / वाद्यलय और धैर्यरियाज़ सिखाता है कि सुधार धीरे-धीरे आता है; मन शांत रहता है
मिट्टी का काम (मृत्तिका शिल्प)हाथ से आकार गढ़नाबिगड़ने पर फिर से गढ़ने की आदत पड़ती है — यही जीवन में भी काम आती है
कढ़ाई / बुनाई (वस्त्र शिल्प)बारीकी और नियमिततापुराने कपड़े नए रूप में काम आने लगते हैं; अपनी बनाई चीज़ पहनने का संतोष मिलता है
नाटक / अभिनयदूसरे की जगह खड़े होकर सोचनाबोलने का डर जाता है और दूसरों को समझना आसान हो जाता है
नमूना उत्तर: “मैं मिट्टी के बरतन बनाना सीखना चाहूँगा/चाहूँगी। मेरे गाँव में कुम्हार काका चाक चलाते हैं और मिट्टी का लोंदा उनके हाथ में कुछ ही मिनटों में घड़ा बन जाता है। मुझे यह बात अच्छी लगती है कि यदि आकार बिगड़ जाए तो मिट्टी बेकार नहीं होती — उसे फिर से गूँधकर नया रूप दिया जा सकता है। इससे मेरा जीवन इस तरह सुंदर बनेगा कि मैं अपने हाथ से कुछ बनाना सीखूँगा/सीखूँगी और यह भी सीखूँगा/सीखूँगी कि पहली बार में न बन पाना कोई हार नहीं है।”
प्र3.
(ग) “सौरभ उड़ जाता है नभ में /फिर वह लौट कहाँ आता है?” यदि आपके पास अपने बीते हुए समय में लौटने का अवसर मिले तो आप बीते हुए समय में क्या-क्या परिवर्तन करना चाहेंगे?
उत्तर

यह कल्पना का प्रश्न है, पर उत्तर में ईमानदारी ही उसे अच्छा बनाती है। जो बदलना चाहते हैं, उसके साथ यह भी लिखिए कि उससे क्या फ़र्क पड़ता।

  • जो बात कहनी थी पर कही नहीं — किसी को धन्यवाद, किसी से क्षमा, किसी की मदद का प्रस्ताव।
  • जो आदत देर से पड़ी — रोज़ थोड़ा पढ़ना, समय पर सोना, हिसाब से ख़र्च करना।
  • जिसे चिढ़ाया या जिसका साथ नहीं दिया — यह बदलने लायक़ सबसे ज़रूरी चीज़ होती है।
  • जो सीखना छोड़ दिया — कोई खेल, कोई वाद्य, कोई भाषा, जिसे बीच में छोड़ दिया था।
कविता से जोड़िए: पंक्ति का असली भाव यही है कि उड़ी हुई सुगंध लौटती नहीं — बीता समय वापस नहीं आता। इसीलिए यह प्रश्न वास्तव में अतीत के बारे में नहीं, आज के बारे में है। जो बात हम ‘बदलना चाहते’ हैं, उसे आगे से न दोहराना ही उस चाहत का सच्चा उत्तर है।
नमूना उत्तर: “कक्षा छह में मेरे साथ बैठने वाला एक साथी बहुत धीरे पढ़ता था और कुछ बच्चे उसकी हँसी उड़ाते थे। मैं चुप रह जाता था। यदि मैं लौट सकूँ तो उस दिन बोलूँगा। इससे उसका डर कम होता और शायद वह विद्यालय छोड़कर न जाता। अब मैं इतना कर सकता हूँ कि आगे कभी ऐसी जगह चुप न रहूँ।”
प्र4.
(घ) “बीज धूलि में गिर जाता जो / वह नभ में कब उड़ पाता है?” यदि सपने बीज की तरह हों तो उन्हें उगने के लिए किन चीजों की आवश्यकता होगी? (संकेत— धूप अर्थात मेहनत, पानी अर्थात लगन आदि।)
उत्तर

पुस्तक ने संकेत में ही रास्ता दे दिया है — बीज को जो-जो चाहिए, उसका एक-एक रूपक सपने के लिए भी बनाइए।

बीज को चाहिएसपने के लिए उसका अर्थक्यों
धूपमेहनतबिना धूप के पौधा भोजन नहीं बना पाता; बिना मेहनत के सपना आगे नहीं बढ़ता
पानीलगनपानी रोज़ चाहिए, एक दिन बहुत-सा देने से काम नहीं चलता — लगन भी रोज़ की चीज़ है
उपजाऊ मिट्टीअच्छी संगति और सहयोग देने वाला परिवारबीज पत्थर पर नहीं उगता; सपना भी चिढ़ाने वाले माहौल में नहीं पनपता
खादसही जानकारी और मार्गदर्शनशिक्षक, पुस्तकें और अनुभवी लोग वही करते हैं जो खाद करती है
समय और धैर्यप्रतीक्षा करने की तैयारीबीज बोकर रोज़ खोदकर देखने से पौधा नहीं निकलता
निराई-गुड़ाईबुरी आदतें और ध्यान भटकाने वाली चीज़ें हटानाखरपतवार पौधे का ही भोजन खा जाती है
बाड़ / सुरक्षाहतोत्साहित करने वाली बातों से बचावछोटा पौधा हर पैर से कुचल सकता है; नया सपना हर ताने से टूट सकता है
रूपक का लाभ: बीज का उदाहरण एक बात बहुत सफ़ाई से समझा देता है — उगना धीरे-धीरे होता है और नीचे, दिखाई न देने वाली जगह से शुरू होता है। सपने के साथ भी यही होता है: बहुत दिन कुछ दिखता नहीं, फिर एक दिन अंकुर निकल आता है।
प्र5.
(ङ) “स्वर्ग बनाने का फिर कोई शिल्प / भूमि को सिखलायेगा!” यदि अच्छे सपनों या विचारों से स्वर्ग बनाया जा सकता है तो बुरे सपनों अथवा विचारों से क्या होता होगा? बुरे सपनों या विचारों से कैसे बचा जा सकता है?
उत्तर

पहला भाग — यदि अच्छा विचार धरती को स्वर्ग बनाने का शिल्प सिखा सकता है, तो बुरा विचार उसे नरक बनाने का शिल्प सिखाएगा। इतिहास इसका गवाह है: युद्ध, दंगे, छुआछूत और दूसरों को नीचा समझने की व्यवस्थाएँ — सब पहले किसी के मन में एक विचार ही थीं।

अच्छा विचार → सहयोग → कुछ बनता है
बुरा विचार → डर और घृणा → कुछ टूटता है

दूसरा भाग — बचाव कैसे:

  • विचार को पहचानिए। बुरा विचार अक्सर ‘ये लोग ऐसे ही होते हैं’ जैसे वाक्य से शुरू होता है। जहाँ पूरे समूह के बारे में एक जैसा फ़ैसला सुनाई दे, वहाँ रुक जाइए।
  • अकेले मत रहिए। बुरे विचार अकेलेपन और चुप्पी में बढ़ते हैं। बात किसी बड़े या मित्र से कह देने पर वे अपना आकार खो देते हैं।
  • मन को काम दीजिए। खेल, कला, पढ़ाई, किसी की मदद — व्यस्त मन में बुरा विचार जगह नहीं पाता।
  • अच्छी संगति और अच्छा पढ़ना। जो सुनते-पढ़ते हैं, वही सोचने लगते हैं; इसीलिए यह चुनना ज़रूरी है कि क्या सुनें और क्या देखें।
  • बदले की भावना को टालिए। क्रोध के क्षण में लिया गया निर्णय लगभग हमेशा ग़लत निकलता है।
ध्यान दीजिए: मन में बुरा विचार आ जाना अपने-आप में अपराध नहीं है — वह सबके मन में आता है। अंतर इस बात से पड़ता है कि हम उसे रोक लेते हैं या उस पर चल पड़ते हैं
प्र6.
(च) “इन सपनों के पंख न काटो /इन सपनों की गति मत बाँधो!” कल्पना कीजिए कि हर किसी को सपने देखने और उन्हें पूरा करने की पूरी स्वतंत्रता मिल जाए, तब दुनिया कैसी होगी? आपके अनुसार उस दुनिया में कौन-सी बातें महत्वपूर्ण होंगी?
उत्तर

वह दुनिया कैसी होगी — उसमें प्रतिभा किसी एक वर्ग या एक शहर तक सीमित नहीं रहेगी। जिस बच्चे को आज पढ़ाई छोड़नी पड़ती है, वह वैज्ञानिक बन सकेगा; जो लड़की आज मैदान तक नहीं जा पाती, वह खेल सकेगी। नए विचार बहुत अधिक आएँगे, क्योंकि सोचने वाले लोग बहुत अधिक हो जाएँगे।

उस दुनिया में ये बातें महत्वपूर्ण होंगी —

  • अवसर की बराबरी। केवल ‘सपना देखने की छूट’ काफ़ी नहीं; विद्यालय, पुस्तक, प्रशिक्षण और समय भी सबको मिलना चाहिए, वरना स्वतंत्रता केवल काग़ज़ पर रहेगी।
  • दूसरे की स्वतंत्रता का ध्यान। मेरा सपना वहीं तक जा सकता है जहाँ किसी और का हक़ शुरू नहीं होता। यही एक सीमा ज़रूरी है।
  • असफलता को सामान्य मानना। जहाँ बहुत लोग नए काम करेंगे, वहाँ बहुत असफलताएँ भी होंगी। असफल व्यक्ति का मज़ाक़ न उड़े, यह सबसे बड़ी शर्त होगी।
  • धरती का ध्यान। सबके सपने पूरे करने का बोझ प्रकृति पर पड़ेगा, इसलिए कम में अधिक करने की समझ आवश्यक होगी।
  • मिलकर काम करना। कविता के अनुसार सपना अकेले नहीं, ‘शिल्प’ बनकर पूरी भूमि को सिखाता है — यानी बड़े सपने साझे प्रयास से ही पूरे होते हैं।
सावधानी: ‘पूरी स्वतंत्रता’ का अर्थ ‘कोई नियम नहीं’ नहीं है। कविता भी बंधन-मुक्ति माँगती है, अराजकता नहीं — वह सपने की गति की बात करती है, दूसरों को कुचलने की नहीं।
प्र7.
(छ) “इन सपनों के पंख न काटो /इन सपनों की गति मत बाँधो!” आपके विचार से यह सुझाव है? आदेश है? प्रार्थना है? या कुछ और है? यह बात किससे कही जा रही है?
उत्तर

यह मुख्यतः प्रार्थना है, जो आदेश के रूप में कही गई है। रूप देखिए तो ‘न काटो’, ‘मत बाँधो’ आज्ञार्थक क्रियाएँ हैं — यानी व्याकरण की दृष्टि से यह आदेश है। पर भाव देखिए तो इसमें कोई अधिकार जताता नहीं, कोई विनती करता सुनाई देता है।

रूपपक्ष में तर्ककितना ठीक
आदेशक्रियाएँ आज्ञार्थक हैं — काटो, बाँधो, रोकोरूप में ठीक, भाव में नहीं — आदेश देने के लिए ताक़त चाहिए, जो यहाँ बोलने वाले के पास नहीं है
प्रार्थनापूरी कविता ‘मत’ और ‘न’ पर टिकी है; कुछ माँगा नहीं जा रहा, केवल न रोकने को कहा जा रहा हैसबसे उपयुक्त
सुझावअंत में तर्क दिया गया है — सपना लौटकर धरती को शिल्प सिखाएगाआंशिक रूप से ठीक; कविता कारण भी बताती है
चेतावनीपंख काट देने का अर्थ है संभावनाओं का समाप्त हो जानाभीतर छिपी हुई है, कही नहीं गई

यह बात किससे कही जा रही है — उन सबसे जिनके हाथ में सपनों को रोकने की शक्ति है: माता-पिता, शिक्षक, बड़े लोग और समाज। और एक अर्थ में स्वयं सपना देखने वाले से भी, क्योंकि अपने सपने के पंख सबसे पहले अक्सर हम ख़ुद ही काटते हैं — यह सोचकर कि ‘यह मुझसे नहीं होगा’।

दोहराव का असर: ये दो पंक्तियाँ कविता के आरंभ और अंत — दोनों जगह हैं। बीच में तर्क चलता है, और तर्क पूरा होने पर वही बात लौटकर आती है। पहली बार वह निवेदन लगती है; अंत में, कारण सुन लेने के बाद, वह सिद्ध की हुई बात लगने लगती है। यही टेक की ताक़त है।
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