कक्षा ८ हिंदी अध्याय 7 मत बाँधो के लिए एनसीईआरटी समाधान
अद्यतन 2026-09-19
इस अध्याय के बारे में
कविता का मूल स्वर एक निषेधात्मक प्रार्थना है — ‘न काटो’, ‘मत बाँधो’, ‘मत रोको’। कवयित्री कुछ माँगती नहीं, केवल इतना कहती हैं कि सपनों के रास्ते में मत खड़े हो जाइए। पहले चार उदाहरण आते हैं — सौरभ (जो उड़कर लौटता नहीं), बीज (जो गिरकर उड़ नहीं पाता), अग्नि (जो धरती पर ही जलती है) और धूम (जो केवल ऊपर उठता है)। हर उदाहरण में गति एक ही दिशा की है। सपना इन सबसे अलग है, क्योंकि उसमें दोनों गतियाँ हैं — आरोहण (ऊपर उठना, कल्पना बनना) और अवरोहण (लौटकर आँखों में, यानी व्यवहार में उतरना)। यही कविता का केंद्रीय विचार है। मुक्त सपना तारों तक जाकर लौटता है तो मेघों से रंग और किरणों से दीप्ति लेता आता है, और धरती को ‘स्वर्ग बनाने का शिल्प’ सिखा देता है — अर्थात् स्वतंत्र कल्पना ही समाज को सुंदर बनाने की कारीगरी देती है। कविता की भाषा में तत्सम शब्द (सौरभ, नभ, गगन, अग्नि, धूम, आरोहण, अवरोहण, विचरण, दीप्ति,
त्वरित पुनरावृत्ति
| शब्द | अर्थ | कविता की पंक्ति | ध्यान देने की बात |
|---|---|---|---|
| सौरभ | सुगंध, महक | सौरभ उड़ जाता है नभ में | उड़ता है पर लौटता नहीं — एकतरफ़ा गति |
| नभ / गगन | आकाश | वह नभ में कब उड़ पाता है? / धूम गगन में मँडराता है! | दोनों समानार्थी शब्द हैं; कवयित्री ने दोहराव से बचने के लिए दोनों बरते |
| धूलि | धूल, मिट्टी | बीज धूलि में गिर जाता जो | गिरता है पर उड़ता नहीं — फिर एकतरफ़ा गति |
| धूम | धुआँ | धूम गगन में मँडराता है! | अग्नि नीचे, धूम ऊपर — आग और धुआँ भी बँटे हुए हैं |
| मँडराना | चारों ओर घूमना, ऊपर छाया रहना | धूम गगन में मँडराता है! | धुएँ का ऊपर टिका रह जाना दिखाता है कि वह लौट नहीं सकता |
| आरोहण | नीचे से ऊपर की ओर जाना, चढ़ना | इसका आरोहण मत रोको | सपने का विचार बनकर ऊपर उठना |
| अवरोहण | ऊपर से नीचे की ओर आना, उतरना | इसका अवरोहण मत बाँधो! | सपने का लौटकर व्यवहार में उतरना; ‘आरोहण’ का विपरीतार्थक |
| विचरण | स्वच्छंद घूमना | मुक्त गगन में विचरण कर यह | ‘मुक्त’ के साथ आकर यह शब्द स्वतंत्रता का चित्र बना देता है |
| मेघ | बादल | मेघों से रंग औ’ किरणों से | बादल से रंग लेना — कल्पना जो अनुभव से समृद्ध होकर लौटती है |
| दीप्ति | चमक, आभा | दीप्ति लिए भू पर आयेगा। | किरणों से ली गई चमक; ‘रंग’ और ‘दीप्ति’ लौटती हुई कमाई हैं |
| भू / भूमि | धरती | दीप्ति लिए भू पर आयेगा। / भूमि को सिखलायेगा! | दो समानार्थी शब्द पास-पास — यही कविता की एक विशेषता है |
| शिल्प | हाथ से कोई चीज़ बनाने का काम; कारीगरी, हुनर | स्वर्ग बनाने का फिर कोई शिल्प | ‘स्वर्ग’ यहाँ सुखद स्थान है और ‘शिल्प’ उसे बनाने की विधि |
अभ्यास
- मेरी समझ से
- पंक्तियों पर चर्चा
- मिलकर करें मिलान
- सोच-विचार के लिए
- शीर्षक
- अनुमान और कल्पना से
- कविता की रचना
- शब्दों की बात
- काल परिवर्तन
- शब्दकोश से
- आपकी बात
- चर्चा-परिचर्चा
- सृजन
- खोया-पाया
- वाद-विवाद
- देखना-सुनना-समझना…
- आपदा प्रबंधन
- शिल्प
- झरोखे से / साझी समझ
- खोजबीन के लिए