प्र1.
(क) कक्षा में पाँच-पाँच विद्यार्थियों के समूह बनाकर एक वाद-विवाद गतिविधि का आयोजन कीजिए। इसके लिए विषय है— “व्यक्ति को बाँध सकते हैं उसकी कल्पना और विचारों को नहीं।” एक समूह विषय के विपक्ष में और दूसरा समूह विषय के पक्ष में अपना तर्क देगा। जैसे—
समूह 1— व्यक्ति की कल्पना और विचारों पर नियंत्रण आवश्यक है।
समूह 2— स्वतंत्र विचार और कल्पना प्रगति के लिए महत्वपूर्ण हैं।
उत्तर
वाद-विवाद में अंक तर्क को मिलते हैं, ऊँची आवाज़ को नहीं। नीचे दोनों पक्षों के मज़बूत तर्क दिए गए हैं — अपने समूह के अनुसार चुनिए और हर तर्क के साथ एक उदाहरण रखिए।
| समूह 1 — नियंत्रण आवश्यक है | समूह 2 — स्वतंत्र विचार आवश्यक हैं |
|---|---|
| हर विचार निर्दोष नहीं होता; घृणा और हिंसा फैलाने वाले विचारों पर रोक ज़रूरी है। | कविता का ही तर्क — बँधा हुआ सपना न ऊपर जाता है, न लौटकर काम आता है। |
| झूठी ख़बरें और अफ़वाहें भी ‘विचार’ ही हैं, पर वे समाज को नुकसान पहुँचाती हैं। | इतिहास बताता है कि नियंत्रण टिकता नहीं — गैलीलियो को रोका गया, पर पृथ्वी घूमना बंद नहीं हुई। |
| बच्चों को सही-ग़लत सिखाना भी एक प्रकार का मार्गदर्शन है, जो पूरी छूट से संभव नहीं। | विज्ञान, कला और सुधार-आंदोलन सब ‘अलग सोचने’ से ही आए — प्रश्न पूछे बिना कुछ नया नहीं बनता। |
| पूरी स्वतंत्रता में दूसरों की स्वतंत्रता कुचली जा सकती है, इसलिए कुछ सीमा रहनी चाहिए। | विचार को रोका नहीं जा सकता, केवल छिपाया जा सकता है — दबा हुआ विचार और तीखा होकर लौटता है। |
संतुलित निष्कर्ष (जो अंत में कहा जा सकता है): नियंत्रण आचरण पर हो सकता है, सोच पर नहीं। किसी को नुकसान पहुँचाने वाले काम रोकना समाज का दायित्व है; पर सोचने और कल्पना करने पर पहरा बैठाना न संभव है, न उचित। कविता भी यही कहती है — सपने की गति मत बाँधो।
आयोजन का तरीक़ा: हर वक्ता को दो मिनट; पहले पक्ष, फिर विपक्ष; अंत में एक-एक मिनट का प्रत्युत्तर। निर्णायक तीन बातें देखें — तर्क का दम, उदाहरण, और दूसरे पक्ष को सुनकर उत्तर देने की क्षमता।