मल्हार अध्याय 7 सोच-विचार के लिए

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
कविता को पुन: पढ़िए, पता लगाइए और लिखिए— (क) कविता में ‘मत बाँधो’, ‘पंख न काटो’ आदि संबोधन किसके लिए किए गए होंगे?
उत्तर

ये संबोधन उन सब बड़ों के लिए हैं जिनके हाथ में बच्चों के सपनों को रोकने की ताक़त होती है — माता-पिता, शिक्षक, परिवार के बुज़ुर्ग, और आगे बढ़कर वह पूरा समाज तथा व्यवस्था जो तय करती है कि कौन क्या बन सकता है।

कैसे पता चलता है: कविता में क्रियाएँ मध्यम पुरुष में हैं — ‘काटो’, ‘बाँधो’, ‘रोको’। यानी सामने कोई है, जिससे बात की जा रही है। और वही रोक सकता है जिसके पास अधिकार हो। सपना देखने वाला बच्चा अपने ही सपने के पंख नहीं काटता — काटता वही है जो उससे ऊपर है।

ध्यान देने की बात यह है कि कवयित्री ने किसी का नाम नहीं लिया। यही कविता को बड़ा बनाता है — पाठक ख़ुद तय करता है कि वह इस पंक्ति में सुनने वाला है या कहने वाला। बहुत बार यह प्रार्थना अपने-आप से भी है, क्योंकि डर और आत्म-संदेह भी सपनों के पंख काट देते हैं।

प्र2.
(ख) कविता में सपनों की गति न बाँधने की बात क्यों कही गई होगी?
उत्तर

क्योंकि सपने की सारी उपयोगिता उसकी गति में ही है। बँधा हुआ सपना केवल एक इच्छा रह जाता है; चलता हुआ सपना काम बन जाता है।

सपना उठता है → कल्पना/विचार बनता है (आरोहण)
सपना लौटता है → आँखों में, फिर व्यवहार में उतरता है (अवरोहण)
गति बाँध दी → न कल्पना बनेगी, न सच्चाई
कारण: कविता की पूरी दलील उदाहरणों से बनी है। सौरभ, बीज, अग्नि और धूम — इन चारों की गति एक ही दिशा में बँधी है, इसलिए इनमें से कोई भी कुछ नया नहीं रच सकता। सपना अकेला ऐसा है जिसमें दोनों गतियाँ हैं; इसी से वह ‘मेघों से रंग’ और ‘किरणों से दीप्ति’ लेकर धरती तक ला पाता है। गति बाँध देने का अर्थ है — सपने को उन्हीं चीज़ों जैसा बना देना जो कुछ नहीं बदल सकतीं।
जोड़कर देखिए: इतिहास में जो कुछ बदला, पहले किसी के सपने में ही बना — स्वतंत्रता, सबके लिए शिक्षा, चाँद तक पहुँचना। यदि उन सपनों की गति बाँध दी जाती, तो वे कभी व्यवहार में नहीं उतरते।
प्र3.
(ग) कविता में सौरभ, बीज, धुआँ, अग्नि जैसे उदाहरणों के माध्यम से सपनों को इनसे भिन्न बताते हुए उसे विशेष बताया गया है। आपकी दृष्टि में इन सबसे अलग सपनों की और कौन-सी विशेषताएँ हो सकती हैं?
उत्तर

कविता जो अंतर बताती है वह है — दोहरी गति। इसके अतिरिक्त सपनों की कुछ और विशेषताएँ इन उदाहरणों से उन्हें अलग करती हैं:

  • सपना बाँटने से घटता नहीं, बढ़ता है। सुगंध बिखर जाए तो कम हो जाती है; आग बाँटो तो ईंधन ख़र्च होता है। पर एक व्यक्ति का सपना जब दूसरों तक पहुँचता है तो और मज़बूत होता है — जैसे स्वतंत्रता का सपना करोड़ों का सपना बन गया।
  • सपना समय का बंधन नहीं मानता। बीज को उगने के लिए ऋतु चाहिए, आग को ईंधन। सपना बीते समय में भी जा सकता है और आने वाले समय में भी।
  • सपना अपनी दिशा ख़ुद चुनता है। धुआँ केवल वहीं जाएगा जहाँ हवा ले जाए। सपना जहाँ चाहे जाता है — ‘मुक्त गगन में विचरण’ करता है।
  • सपना ख़त्म नहीं होता, अगली पीढ़ी को मिल जाता है। अग्नि बुझ जाती है, सुगंध उड़ जाती है; अधूरा सपना किसी और के हाथ में जाकर पूरा हो जाता है।
  • सपना बदल सकता है। बीज से वही पौधा निकलेगा जिसका वह बीज है। सपना रास्ते में सीखकर अपना रूप बदल लेता है — ‘मेघों से रंग’ लेकर लौटता है।
तर्क का ढंग: इन उदाहरणों को कवयित्री ने यों ही नहीं चुना। चारों दिखाई या महसूस होने वाली चीज़ें हैं, फिर भी बँधी हुई हैं। सपना दिखाई नहीं देता, फिर भी सबसे स्वतंत्र है — यही विरोधाभास कविता को धार देता है।
प्र4.
(घ) कविता में ‘आरोहण’ और ‘अवरोहण’ दोनों के महत्व की बात की गई है। उदाहरण देकर बताइए कि आपने ‘आरोहण’ और ‘अवरोहण’ को कब-कब सार्थक होते देखा?
उत्तर

आरोहण और अवरोहण तभी सार्थक होते हैं जब वे एक ही चक्र के दो हिस्से हों — ऊपर जाना कुछ पाने के लिए, नीचे आना उसे काम में लाने के लिए।

क्षेत्रआरोहणअवरोहणसार्थकता
जल-चक्रभाप बनकर पानी का ऊपर उठनावर्षा बनकर बरसनाऊपर उठे बिना बादल नहीं, बरसे बिना खेत नहीं
संगीतसा से सा तक आरोहऊपर के सा से नीचे उतरना — अवरोहराग दोनों से पूरा होता है; केवल चढ़ता स्वर अधूरा लगता है
पर्वतारोहणचोटी तक चढ़ाईसुरक्षित उतरकर लौटनाजो लौटा नहीं, उसकी विजय अधूरी रह गई
पढ़ाईनई कठिन बात सीखनाउसे सरल करके किसी और को समझानासमझाने पर ही पता चलता है कि सचमुच समझा या नहीं
रॉकेट / उपग्रहअंतरिक्ष तक जानाचित्र और आँकड़े धरती पर भेजनाभेजा गया आँकड़ा ही उड़ान को उपयोगी बनाता है
नमूना उत्तर: “हमारे विद्यालय में विज्ञान-प्रदर्शनी के लिए मैंने वर्षा-जल संचयन पर बहुत पढ़ा — यह मेरा आरोहण था। पर काम तब पूरा हुआ जब मैंने वही बात घर पर सबको समझाई और हमने छत के पाइप को गड्ढे तक जोड़ दिया। सीखी हुई बात का इस तरह ज़मीन पर उतरना ही अवरोहण था।”
प्र5.
(ङ) “सपनों में दोनों ही गति है/उड़कर आँखों में आता है!” क्या आप सहमत हैं कि सपने ‘आँखों में लौटकर’ वास्तविकता बन जाते हैं? अपने अनुभव या आस-पास के अनुभवों से कोई उदाहरण दीजिए।
उत्तर

हाँ, इस शर्त के साथ कि लौटने के बाद उस पर काम किया जाए। कविता की पंक्ति यही कहती है — सपना ऊपर उड़ता है, पर टिकता तब है जब वह ‘आँखों में’ आ जाता है, यानी जब आँखें रोज़ उसे देखने लगती हैं।

‘आँखों में आना’ का अर्थ: यह मुहावरा दो काम एक साथ करता है। पहला — जो चीज़ आँख के सामने रहती है, उसे भुलाया नहीं जा सकता। दूसरा — आँख शरीर का वह हिस्सा है जिससे हम दुनिया को नापते हैं; सपना आँख में आ गया तो अब वह कल्पना नहीं, योजना है। इसीलिए कवयित्री ने ‘मन में आता है’ नहीं, ‘आँखों में आता है’ लिखा।
नमूना उत्तर: “हमारे मोहल्ले के एक बड़े भैया राष्ट्रीय स्तर पर कबड्डी खेलना चाहते थे। पहले यह केवल बात थी। फिर उन्होंने अपने कमरे में एक तारीख़ लिखकर चिपका दी और रोज़ सुबह पाँच बजे मैदान जाने लगे। दो साल बाद वे राज्य की टीम में चुने गए। सपना पहले उड़ा था, पर वह उस दिन सच होना शुरू हुआ जिस दिन वह हर सुबह उनकी आँखों के सामने आ गया।”

दूसरा पक्ष भी लिखिए — हर सपना पूरा नहीं होता, और यह मान लेना भी ईमानदारी है। पर अधूरा रहा सपना भी बेकार नहीं जाता: वह रास्ता, अभ्यास और अनुभव छोड़ जाता है, जो किसी दूसरे काम में लग जाता है।

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