मल्हार अध्याय 7 पंक्तियों पर चर्चा

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
कविता में से चुनकर कुछ पंक्तियाँ नीचे दी गई हैं। इन्हें ध्यानपूर्वक पढ़िए और इन पर विचार कीजिए। आपको इनका क्या अर्थ समझ में आया? अपने विचार अपने समूह में साझा कीजिए और लिखिए। (क) “सौरभ उड़ जाता है नभ में / फिर वह लौट कहाँ आता है? / बीज धूलि में गिर जाता जो / वह नभ में कब उड़ पाता है?”
उत्तर

भावार्थ — फूल की सुगंध हवा में उड़कर आकाश में घुल जाती है; उड़ जाने के बाद वह फिर उसी फूल में लौटकर नहीं आती। दूसरी ओर बीज मिट्टी में गिर पड़ता है; एक बार गिर जाने के बाद वह कभी आकाश में उड़ नहीं सकता।

सौरभ — केवल ऊपर जा सकता है, लौट नहीं सकता।
बीज — केवल नीचे गिर सकता है, उड़ नहीं सकता।
दोनों की गति एकतरफ़ा है।
यह चित्र कविता में क्यों है: ये चार पंक्तियाँ सीधे-सीधे सपनों की बात नहीं करतीं, फिर भी पूरी कविता इन्हीं पर टिकी है। कवयित्री पहले संसार से दो उदाहरण उठाती हैं और दिखाती हैं कि प्रकृति की अधिकतर चीज़ों की गति एक ही दिशा में बँधी होती है। इसके ठीक बाद वे कहती हैं — ‘सपनों में दोनों ही गति हैं’। यानी उदाहरण तुलना के लिए हैं, ताकि सपने की विशेषता उभरकर सामने आ जाए।

भाषा की बात — दोनों वाक्य प्रश्न के रूप में हैं, पर उत्तर माँगते नहीं। ‘लौट कहाँ आता है?’ और ‘कब उड़ पाता है?’ का अर्थ है ‘लौटता ही नहीं’, ‘उड़ पाता ही नहीं’। यह प्रश्नालंकार (काव्य-प्रश्न) है — प्रश्न पूछकर उत्तर मनवा लेने की युक्ति। साथ ही ‘सौरभ… नभ’ और ‘बीज… धूलि’ में ऊपर-नीचे का विरोधाभासी चित्र बनता है, जो अगली ही पंक्तियों में ‘आरोहण–अवरोहण’ बनकर लौटता है।

प्र2.
(ख) “मुक्त गगन में विचरण कर यह / तारों में फिर मिल जायेगा, / मेघों से रंग औ’ किरणों से / दीप्ति लिए भू पर आयेगा।”
उत्तर

भावार्थ — यदि सपने को खुला आकाश मिल जाए तो वह वहाँ स्वच्छंद घूमेगा और तारों में जा मिलेगा। पर वह वहीं नहीं रह जाएगा — लौटते समय बादलों से रंग और सूरज की किरणों से चमक अपने साथ लेता आएगा, और धरती पर उतरेगा।

ऊपर जाना → तारों तक आरोहण
वहाँ से पाना → मेघों से रंग, किरणों से दीप्ति
लौट आना → भू पर अवरोहण
बिंब कैसे काम करता है: यहाँ सपना पूरी तरह मानवीकृत हो गया है — वह घूमता है, मिलता है, कुछ लेता है और लौट आता है। सबसे सुंदर बात यह है कि वह ख़ाली हाथ नहीं लौटता। ‘रंग’ और ‘दीप्ति’ का अर्थ है — कल्पना जब स्वतंत्र होकर दूर तक जाती है, तो अनुभव और सुंदरता कमाकर लाती है। यही कमाई आगे ‘स्वर्ग बनाने का शिल्प’ बन जाती है।

भाषा की बात — ‘मुक्त गगन’ और ‘विचरण’ शब्द मिलकर बंधनहीनता का भाव बनाते हैं। ‘मेघों से रंग’ और ‘किरणों से दीप्ति’ — दोनों की बनावट एक जैसी है; यह समांतर रचना पंक्ति को गीत जैसी लय देती है। ‘औ’’ (और) का संक्षिप्त रूप छंद की मात्रा साधने के लिए आया है।

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