मल्हार अध्याय 8 अनुमान और कल्पना से

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
अपने समूह में मिलकर चर्चा कीजिए— (क) एकांकी में विश्वनाथ अपनी पत्नी को अतिथियों के लिए भोजन की व्यवस्था करने के लिए कहता है। साथ ही रेवती की अस्वस्थता का विचार करके भोजन बाजार से मँगवाने का सुझाव भी देता है। लेकिन उसने स्वयं अतिथियों के लिए भोजन बनाने के विषय में क्यों नहीं सोचा?
उत्तर

क्योंकि उस समय के मध्यवर्गीय घर में रसोई को ‘स्त्री का काम’ मान लिया गया था — इतना गहरा मान लिया गया था कि विश्वनाथ के मन में यह विकल्प उठता ही नहीं।

ध्यान दीजिए, विश्वनाथ असंवेदनशील नहीं है। वह रेवती के सिरदर्द को जानता है, उसे छत पर सुलाना चाहता है, बच्चे को गोद में लेकर पंखा झलता है, और यहाँ तक कहता है — “जीवन में तुम्हें कोई सुख न दे सका।” जब वह देखता है कि रेवती की तबीयत ठीक नहीं, तो वह तुरंत रास्ता भी सुझाता है — “बाजार से कुछ मँगा दो न!” यानी उसे परवाह है। पर वह परवाह भी उसे रसोई तक नहीं ले जाती। उसकी सोच में समाधान दो ही हो सकते हैं — पत्नी बनाए या बाजार से आए। तीसरा समाधान — ‘मैं बना दूँ’ — उसकी कल्पना में है ही नहीं।

यह किसकी सीमा है: यह विश्वनाथ की व्यक्तिगत कमी से ज्यादा उस समय के सामाजिक ढाँचे की सीमा है। रोचक बात यह है कि इसी पुस्तक के ‘झरोखे से’ अंश में निराला जी का उदाहरण दिया गया है, जो अपने अतिथि के लिए “भोजन बनाने से लेकर जूठे बर्तन माँजने तक का काम” स्वयं सहर्ष करते थे। दोनों को साथ रखकर पढ़िए — पुस्तक चुपचाप एक तुलना सामने रख देती है।
आज के संदर्भ में: घर का काम किसी एक व्यक्ति का नहीं, सबका साझा उत्तरदायित्व है। यदि विश्वनाथ रसोई में हाथ बँटा देता, तो रेवती को न तुनककर मना करना पड़ता, न बाजार के तीन-चार रुपये खर्च करने पड़ते — और मेहमान भी बिना कड़वाहट के खा-पीकर चले जाते।
प्र2.
(ख) एकांकी में विश्वनाथ का बेटा प्रमोद अतिथियों के पेयजल की व्यवस्था करता है और छोटी बहन का भी ध्यान रखता है। प्रमोद को इस तरह के उत्तरदायित्व क्यों दिए गए होंगे?
उत्तर

क्योंकि इस घर में काम बाँटने के लिए और कोई है ही नहीं, और प्रमोद घर का सबसे बड़ा बच्चा है।

  • नौकर नहीं टिकता — विश्वनाथ स्वयं कहता है, “नौकर भी नहीं टिकता है।” रेवती कारण बताती है — “पानी जो तीन मंजिल पर चढ़ाना पड़ता है, इसीलिए भाग जाता है।”
  • माँ बीमार है — रेवती पंद्रह दिन से सिरदर्द से परेशान है, हाथ-पैर सुन्न पड़ते हैं, और अकेली रसोई सँभालती है।
  • पिता मेहमानों में उलझा है — विश्वनाथ को अतिथियों के पास बैठना पड़ रहा है, इसलिए बाहर के काम बेटे को सौंपने पड़ते हैं — “देखो प्रमोद, कहीं से बरफ मिले तो ले आओ”, “प्रमोद, इन्हें नीचे नल पर ले जाओ।”
  • बड़े बच्चे की भूमिका — ऐसे परिवारों में सबसे बड़े बच्चे को जल्दी बड़ा होना पड़ता है। प्रमोद खुद बताता है — “वहाँ उषा रोने लगी। उसे चुप कराया, पानी पिलाया और पंखा झलता रहा।” यह किसी ने कहा नहीं था; उसने स्वयं किया।
पात्र-रचना की दृष्टि से: प्रमोद को ये काम देकर एकांकीकार दो चीजें एक साथ साधता है। पहली — वह घर की तंगी दिखा देता है बिना यह कहे कि ‘घर गरीब है’। दूसरी — वह मेहमानों की ढिठाई को और चुभने वाला बना देता है, क्योंकि बरफ ढूँढ़ने गरमी में बाहर एक बच्चा जाता है, और ‘जान में जान’ मेहमान की आती है। यही कारण है कि प्रमोद जैसा छोटा पात्र भी एकांकी में जरूरी है।
प्र3.
(ग) “कैसी बातें करते हो, भैया! मैं अभी खाना बनाती हूँ” भीषण गरमी और सिर में दर्द के बावजूद भी रेवती भोजन की व्यवस्था करने के लिए क्यों तैयार हो गई होगी?
उत्तर

क्योंकि इस बार आने वाला अजनबी नहीं, उसका अपना भाई है। श्रम वही है, गरमी वही है, सिरदर्द भी वही है — पर रिश्ता बदल गया है, इसलिए वही काम बोझ नहीं रहा।

दोनों दृश्यों को साथ रखिए, अंतर साफ दिखेगा —

अजनबी मेहमानों के लिएभाई के लिए
“(तुनककर) खाना तो खिलाना ही होगा— तुम भी खूब हो!”“(प्रसन्न होकर) अरे अरे भैया हैं! आओ, आओ, तुमने तो खबर भी न दी।”
“मैं खाना नहीं बनाऊँगी, पहले आत्मा फिर परमात्मा।”“कैसी बातें करते हो भैया! मैं अभी खाना बनाती हूँ।”
“पहले तुम पूछ लो, मैं बाद में खाना बनाऊँगी।”“अब क्या, मैं खाना बनाऊँगी। भैया भूखे नहीं सो सकते।”

कारण, एक-एक करके:

  • अपनापन — भाई घर का है, ‘मेहमान’ नहीं। उसके लिए किया गया काम सेवा लगता है, मजबूरी नहीं।
  • अपराध-बोध — भाई ने तार भेजा था, जो मिला नहीं; वह चार घंटे भटकता रहा। रेवती को लगता है कि उसकी ओर से कमी रह गई।
  • भाई का संकोच — वह स्वयं कहता है, “खाना-वाना रहने दो… मुझे भूख नहीं है” और “शायद रात को आप लोगों को कोई कष्ट हो।” जो अतिथि संकोच करता है, उसके लिए मन अपने आप उदार हो जाता है — ठीक इसके उलट नन्हेमल और बाबूलाल थे, जो माँग-माँगकर मँगवा रहे थे।
एकांकी की असली बात यहीं है: रेवती आतिथ्य-विरोधी नहीं है। एकांकी यह नहीं कहती कि मेहमान बुरे होते हैं। वह यह कहती है कि आतिथ्य तब सुख है जब वह मन से निकले, और तब यातना है जब वह थोप दिया जाए। यही कारण है कि लेखक ने भाई का प्रवेश ठीक उन दो मेहमानों के जाते ही रखा — तुलना अपने आप हो जाती है।
प्र4.
(घ) एकांकी से गरमी की भीषणता दर्शाने वाली कुछ पंक्तियाँ दी जा रही हैं। अपनी कल्पना और अनुमान से बताइए कि सर्दी और वर्षा की भीषणता के लिए आप इनके स्थान पर क्या-क्या वाक्य प्रयोग करते हैं? अपने वाक्यों को दिए गए उचित स्थान पर लिखिए: 1. यह गरमी में भुन रहा है। 2. पर बरफ भी कोई कहाँ तक पिए। 3. सारे शहर में जैसे आग बरस रही हो। 4. प्यास है कि बुझने का नाम नहीं लेती। 5. चारों तरफ दीवारें तप रही हैं। 6. ठंडा-ठंडा पानी पिलाओ दोस्त, प्राण सूखे जा रहे हैं। 7. सचमुच गरमी में पानी ही तो जान है। 8. यह तो हमारा ही भाग्य है कि चने की तरह भाड़ में भुनते रहते हैं। 9. फिर भी पसीने से नहा गया हूँ।
उत्तर

पहली पंक्ति पुस्तक में भरी हुई दी गई है। उसी ढंग पर शेष आठ इस प्रकार भरे जा सकते हैं (आपके वाक्य इनसे अलग भी हो सकते हैं — बस भाव वही रहना चाहिए):

गरमी की भीषणता दर्शाने वाली पंक्तियाँसर्दी की भीषणता दर्शाने वाली पंक्तियाँवर्षा की भीषणता दर्शाने वाली पंक्तियाँ
1. यह गरमी में भुन रहा है।यह सर्दी में जम गया।यह वर्षा में भीग रहा है।
2. पर बरफ भी कोई कहाँ तक पिए।पर रजाई भी कोई कहाँ तक ओढ़े।पर छाता भी कोई कहाँ तक ताने।
3. सारे शहर में जैसे आग बरस रही हो।सारे शहर पर जैसे बरफ जम रही हो।सारे शहर पर जैसे आसमान फट पड़ा हो।
4. प्यास है कि बुझने का नाम नहीं लेती।ठिठुरन है कि जाने का नाम नहीं लेती।झड़ी है कि थमने का नाम नहीं लेती।
5. चारों तरफ दीवारें तप रही हैं।चारों तरफ दीवारें बरफ हुई जा रही हैं।चारों तरफ दीवारें सील रही हैं।
6. ठंडा-ठंडा पानी पिलाओ दोस्त, प्राण सूखे जा रहे हैं।गरम-गरम चाय पिलाओ दोस्त, प्राण जमे जा रहे हैं।सूखा-सूखा कपड़ा दे दो दोस्त, प्राण काँपे जा रहे हैं।
7. सचमुच गरमी में पानी ही तो जान है।सचमुच सर्दी में धूप ही तो जान है।सचमुच वर्षा में सूखी छत ही तो जान है।
8. यह तो हमारा ही भाग्य है कि चने की तरह भाड़ में भुनते रहते हैं।यह तो हमारा ही भाग्य है कि बरफ की सिल्ली की तरह जमते रहते हैं।यह तो हमारा ही भाग्य है कि मेंढक की तरह पानी में डूबते-उतराते रहते हैं।
9. फिर भी पसीने से नहा गया हूँ।फिर भी ठंड से नीला पड़ गया हूँ।फिर भी छाते के नीचे भीग गया हूँ।
वाक्य बनाते समय यह ध्यान रखिए: मूल वाक्य की बनावट मत बदलिए, केवल उसमें मौसम बदलिए। जैसे पंक्ति 4 का ढाँचा है — “X है कि Y का नाम नहीं लेती”। उसमें ‘प्यास–बुझने’ की जगह ‘ठिठुरन–जाने’ रख दीजिए, ढाँचा वही रहेगा और भाव नया हो जाएगा। इसी तरह पंक्ति 8 में उपमा (‘चने की तरह’) को उपमा से ही बदलिए — तब वाक्य में वही व्यंग्य बना रहेगा।
Tip: ‘तर’ (गीला), ‘ठिठुरन’, ‘झड़ी’ (लगातार वर्षा), ‘सीलन’ जैसे मौसम-शब्द याद रखिए। एक अच्छा वाक्य वही है जो मौसम का नाम लिए बिना मौसम महसूस करा दे — जैसे ‘पत्ता तक नहीं हिल रहा है’ में ‘गरमी’ शब्द है ही नहीं।
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