क्योंकि उस समय के मध्यवर्गीय घर में रसोई को ‘स्त्री का काम’ मान लिया गया था — इतना गहरा मान लिया गया था कि विश्वनाथ के मन में यह विकल्प उठता ही नहीं।
ध्यान दीजिए, विश्वनाथ असंवेदनशील नहीं है। वह रेवती के सिरदर्द को जानता है, उसे छत पर सुलाना चाहता है, बच्चे को गोद में लेकर पंखा झलता है, और यहाँ तक कहता है — “जीवन में तुम्हें कोई सुख न दे सका।” जब वह देखता है कि रेवती की तबीयत ठीक नहीं, तो वह तुरंत रास्ता भी सुझाता है — “बाजार से कुछ मँगा दो न!” यानी उसे परवाह है। पर वह परवाह भी उसे रसोई तक नहीं ले जाती। उसकी सोच में समाधान दो ही हो सकते हैं — पत्नी बनाए या बाजार से आए। तीसरा समाधान — ‘मैं बना दूँ’ — उसकी कल्पना में है ही नहीं।