मल्हार अध्याय 8 सोच-विचार के लिए

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
एकांकी को पुनः पढ़िए, पता लगाइए और लिखिए— (क) “शहर में तो ऐसे ही मकान होते हैं।” नन्हेमल का ‘ऐसे ही मकान’ से क्या आशय है?
उत्तर

‘ऐसे ही मकान’ से नन्हेमल का आशय है — शहर के वे तंग, बंद और हवा-रहित किराये के मकान, जिनमें एक छोटा कमरा, उसके पीछे एक और कमरा, नीचे एक जरा-सा आँगन और ऊपर साझी छत होती है।

वह यह बात तब कहता है जब बाबूलाल पूछता है — “पंडित जी, क्या मकान इतना ही बड़ा है?” नन्हेमल उत्तर देता है — “देख नहीं रहे, इसके पीछे एक कमरा दिखाई देता है। पंडित जी, इसके पीछे आँगन होगा और ऊपर छत होगी? शहर में तो ऐसे ही मकान होते हैं।”

इस वाक्य में दो बातें छिपी हैं:
  • शहर की सच्चाई — विश्वनाथ स्वयं थोड़ी देर बाद यही बात आँकड़ों में कहता है: “आठ-नौ लाख आदमी इस शहर में रहते हैं और उनमें से छह-सात लाख आदमी इसी तरह के मकानों में रहते हैं।” यानी नन्हेमल की बात गलत नहीं है।
  • नन्हेमल का असली मकसद — वह सहानुभूति नहीं जता रहा। वह घर की जगह नाप रहा है — कि सोने के लिए कहाँ जगह है, नहाने का प्रबंध कहाँ होगा। तुरंत बाद उसका अगला प्रश्न भी यही है — “नहाने का प्रबंध तो होगा, पंडित जी?”
ध्यान दीजिए: ‘तो’ और ‘ही’ — दोनों बल देने वाले शब्द इस छोटे-से वाक्य में हैं। ‘शहर में तो ऐसे ही मकान होते हैं’ का भाव है — इसमें कोई नई या शिकायत करने लायक बात नहीं, सब ऐसे ही रहते हैं। इसी अंदाज से नन्हेमल अपने ठहरने का रास्ता बना रहा है।
प्र2.
(ख) पड़ोसी को विश्वनाथ से किस तरह की शिकायत है? आपके विचार से पड़ोसी का व्यवहार उचित है या अनुचित? तर्क सहित उत्तर दीजिए।
उत्तर

शिकायत क्या है: पड़ोसी की शिकायत तीन बातों को लेकर है —

  1. विश्वनाथ के मेहमानों ने उसकी छत पर हाथ धो लिए और गंदा पानी फैल गया — “मैं यह बर्दाश्त नहीं कर सकता कि मेरी छत पर इस तरह गंदा पानी फैलाया जाए।”
  2. यह पहली बार नहीं हुआ — “अभी उसी दिन आपके एक और मेहमान ने पानी फैला दिया था। फिर वह हमारी खाट बिछाकर लेट गया था।”
  3. उसे लगता है कि इस छोटे मकान में इतने मेहमान बुलाना ही गलत है — “यदि मेहमान बुलाने हों तो बड़ा-सा मकान लो।”

मेरा मत: पड़ोसी की शिकायत उचित है, पर उसका व्यवहार अनुचित है। ये दोनों बातें अलग-अलग हैं और इन्हें अलग-अलग तौलना चाहिए।

पक्षआधार
शिकायत क्यों उचितछत उसकी है। उस पर दूसरों का गंदा पानी फैलाना और उसकी खाट पर बिना पूछे लेट जाना — दोनों ही उसका अधिकार छीनना है। विश्वनाथ स्वयं मानता है — “वाकई गलती हो गई।”
व्यवहार क्यों अनुचित(1) गलती मानी जा चुकी है, फिर भी वह ताना मारता है — “कहाँ तक कोई क्षमा करे। क्षमा, क्षमा!” (2) खाली पड़ी छत पर बच्चों के लिए एक खाट तक बिछाने नहीं देता। (3) रेवती के अनुसार — “वे तो हमको मुसीबत में देखकर प्रसन्न होते हैं।” (4) “बड़ा-सा मकान लो” कहना गरीबी पर सीधा तंज है, और अनुचित है, क्योंकि विश्वनाथ दो साल से दिन-रात एक करके मकान ढूँढ़ ही रहा है।
निष्कर्ष: अपने अधिकार की बात कहना हर व्यक्ति का हक है, पर उसे कहने का ढंग ही यह तय करता है कि पड़ोस बचेगा या टूटेगा। पड़ोसी अपनी बात शांति से भी कह सकता था और यह भी जोड़ सकता था कि “बच्चों को छत पर सुला लीजिए।” तब वही शिकायत सहयोग बन जाती।
प्र3.
(ग) एकांकी में विश्वनाथ नन्हेमल और बाबूलाल को नहीं जानता है, फिर भी उन्हें अपने घर में आने देता है। क्यों?
उत्तर

इसके तीन कारण एकांकी में साफ दिखते हैं।

  1. संकोच — विश्वनाथ पूछता तो है, पर हर बार अधूरा — “जी, आप लोग…”, “क्षमा कीजिएगा आप कहाँ से आए हैं?”, “क्षमा कीजिए, मैंने आपको…”। वह वाक्य पूरा ही नहीं कर पाता। रेवती से वह स्वयं स्वीकार करता है — “क्या पूछ लूँ? दो-तीन बार पूछा, ठीक-ठीक उत्तर ही नहीं देते।”
  2. आतिथ्य की परंपरा — ‘अतिथि देवो भव’ के संस्कार में पले मध्यवर्गीय व्यक्ति के लिए रात को दरवाजे पर आए आदमी को लौटा देना लगभग असंभव है। वह रेवती से कहता है — “कोई भी हों, जब आए हैं तो खाना जरूर खाएँगे।” और आगे — “क्या कहेंगे कि रातभर भूखा मारा।” उसे अपनी परेशानी से ज्यादा यह चिंता है कि लोग क्या कहेंगे।
  3. दोनों मेहमानों की चतुराई — वे विश्वनाथ को मौका ही नहीं देते। वे बिस्तर और संदूक लेकर सीधे भीतर आ जाते हैं, उसे ‘पंडित जी’ और ‘चाचा’ कहकर पुकारते हैं, संपतराम और सेठ जगदीशप्रसाद जैसे नाम गिनाते हैं, और जब भी कोई सीधा प्रश्न आता है, बात मोड़ देते हैं — “अरे पंडित जी, आप कैसी बातें करते हैं? हम तो आपके पास के हैं।”
गहरी बात: एकांकी का यही विषय है — आतिथ्य का वह संस्कार जब सामर्थ्य से बड़ा हो जाए, तो वह सेवा नहीं, बोझ बन जाता है। विश्वनाथ बुरा आदमी नहीं है और मेहमान भी डाकू नहीं हैं; टकराव संस्कार और सामर्थ्य के बीच है। इसीलिए ‘मान न मान मैं तेरा मेहमान’ कहावत पाठ के आरंभ में ही दे दी गई है।
प्र4.
(घ) एकांकी के उन संवादों को ढूँढ़कर लिखिए जिनसे पता चलता है कि बाबूलाल और नन्हेमल विश्वनाथ के परिचित नहीं हैं?
उत्तर

एकांकी में ऐसे संवाद क्रम से आते हैं और हर बार शक और गहरा होता जाता है।

संवादयह क्या सिद्ध करता है
विश्वनाथ — “जी, आप लोग…”पहली ही मुलाकात में विश्वनाथ को परिचय पूछना पड़ रहा है।
विश्वनाथ — “क्षमा कीजिएगा आप कहाँ से आए हैं?”वह उन्हें पहचान नहीं पा रहा।
विश्वनाथ — “कौन संपतराम?” … “मैं संपतराम को नहीं जानता।”मेहमान जिस साझे परिचित का नाम ले रहे हैं, वह विश्वनाथ के लिए अनजान है।
रेवती — “ये लोग कौन हैं? जान-पहचान के तो मालूम नहीं पड़ते।” / विश्वनाथ — “न जाने कौन हैं।”घर का कोई भी व्यक्ति उन्हें नहीं जानता।
विश्वनाथ — “तो आप कोई चिट्ठी-विट्ठी लाए हैं?” / दोनों (सकपकाकर) — “चिट्ठी, चिट्ठी तो नहीं लाए हैं।”कोई प्रमाण नहीं — और ‘सकपकाकर’ का रंगमंच-निर्देश उनकी घबराहट खोल देता है।
विश्वनाथ — “पर कृष्णा गली तो यहाँ छह हैं। कौन-सी गली में बताया था?” / नन्हेमल — “हमें तो यह मालूम नहीं है… याद ही नहीं रहा।”उन्हें पता तक याद नहीं — वे किसी जान-पहचान के भरोसे नहीं, अंदाजे से आए हैं।
विश्वनाथ (खीझकर) — “जिसके यहाँ आपको जाना है, उसका नाम भी तो बताया होगा?” / नन्हेमल — “नाम तो याद नहीं आता।”जिससे मिलने आए हैं, उसका नाम भी नहीं मालूम।
विश्वनाथ — “लेकिन मैं कविराज तो नहीं हूँ?” … “पर मैं तो वैद्य नहीं हूँ।”वे जिस व्यक्ति को खोज रहे हैं, वह विश्वनाथ है ही नहीं।
बाबूलाल — “आप तो, पंडित जी, शायद वैद्य हैं?”मेहमान स्वयं अंदाज लगा रहे हैं कि मेजबान करता क्या है।
दोनों (उछलकर) — “अरे हाँ, वही तो कविराज रामलाल।”अंतिम प्रमाण — उन्हें कविराज रामलाल वैद्य के यहाँ जाना था, विश्वनाथ के यहाँ नहीं।
लेखन-कौशल देखिए: उदयशंकर भट्ट कहीं भी यह नहीं लिखते कि “ये दोनों अजनबी हैं।” वे केवल संवाद रखते जाते हैं और पाठक स्वयं निष्कर्ष निकालता है — यही नाटक की शक्ति है। साथ ही ‘सकपकाकर’, ‘खीझकर’, ‘उछलकर’ जैसे तीन छोटे रंगमंच-निर्देश पूरे दृश्य का तनाव बता देते हैं।
प्र5.
(ङ) एकांकी के उन वाक्यों को ढूँढ़कर लिखिए जिनसे पता चलता है कि शहर में भीषण गरमी पड़ रही है।
उत्तर

एकांकी में गरमी केवल पृष्ठभूमि नहीं, लगभग एक पात्र है। ये वाक्य इसे सिद्ध करते हैं —

  • “इन बंद मकानों में रहना कितना भयंकर है! मकान है कि भट्टी!
  • पत्ता तक नहीं हिल रहा है। जैसे साँस बंद हो जाएगी। सिर फटा जा रहा है।”
  • “पानी पीते-पीते पेट फूला जा रहा है और प्यास है कि बुझने का नाम नहीं लेती।
  • “आँगन में घड़े में भी तो पानी ठंडा नहीं होता— हवा लगे तब तो ठंडा हो।”
  • सारे शहर में जैसे आग बरस रही हो। यहाँ की गरमी से तो ईश्वर बचाए।”
  • “इन सुकुमार बालकों का क्या अपराध है? तमाम शरीर मारे गरमी के उबल उठा है।
  • “और ऊपर भी क्या हवा है! चारों तरफ दीवारें तप रही हैं।
  • “बच्चे को ले जाओ। यह गरमी में भुन रहा है।
  • “पैदल चले आ रहे हैं, कपड़े तो ऐसे हो गए कि निचोड़ लो।
  • “मेरे कपड़े निचोड़कर देख लो, एक लोटे से कम पसीना नहीं निकलेगा।
  • ठंडा-ठंडा पानी पिलाओ दोस्त, प्राण सूखे जा रहे हैं।
  • “तबीयत अब शांत हुई है, फिर भी पसीने से नहा गया हूँ।
  • “यह तो हमारा ही भाग्य है कि चने की तरह भाड़ में भुनते रहते हैं।
रंगमंच-निर्देश भी गरमी बताते हैं: “कमरा बेहद गरम है।”, “मेज पर रखा हुआ पुराना पंखा चल रहा है, जिससे बहुत कम हवा आ रही है।”, “पंखे की हवा केवल उस बच्चे को लग रही है। फिर भी वह पसीने से तर है।” — यानी संवाद और निर्देश, दोनों मिलकर एक ही प्रभाव बनाते हैं।
क्यों इतनी गरमी दिखाई गई: गरमी यहाँ केवल मौसम नहीं है। वह घर की चिड़चिड़ाहट, थकान और असमर्थता को हर क्षण बढ़ाती रहती है। यदि मौसम सुहावना होता, तो वही दो मेहमान इतना बड़ा संकट न लगते। मौसम को कथा का दबाव बनाना एकांकीकार की कुशलता है।
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