‘ऐसे ही मकान’ से नन्हेमल का आशय है — शहर के वे तंग, बंद और हवा-रहित किराये के मकान, जिनमें एक छोटा कमरा, उसके पीछे एक और कमरा, नीचे एक जरा-सा आँगन और ऊपर साझी छत होती है।
वह यह बात तब कहता है जब बाबूलाल पूछता है — “पंडित जी, क्या मकान इतना ही बड़ा है?” नन्हेमल उत्तर देता है — “देख नहीं रहे, इसके पीछे एक कमरा दिखाई देता है। पंडित जी, इसके पीछे आँगन होगा और ऊपर छत होगी? शहर में तो ऐसे ही मकान होते हैं।”
- शहर की सच्चाई — विश्वनाथ स्वयं थोड़ी देर बाद यही बात आँकड़ों में कहता है: “आठ-नौ लाख आदमी इस शहर में रहते हैं और उनमें से छह-सात लाख आदमी इसी तरह के मकानों में रहते हैं।” यानी नन्हेमल की बात गलत नहीं है।
- नन्हेमल का असली मकसद — वह सहानुभूति नहीं जता रहा। वह घर की जगह नाप रहा है — कि सोने के लिए कहाँ जगह है, नहाने का प्रबंध कहाँ होगा। तुरंत बाद उसका अगला प्रश्न भी यही है — “नहाने का प्रबंध तो होगा, पंडित जी?”