प्र1.
स्तंभ 1 में कुछ पंक्तियाँ दी गई हैं और स्तंभ 2 में उनसे मिलते-जुलते भाव दिए गए हैं। स्तंभ 1 की पंक्तियों को स्तंभ 2 की उनके सही भाव वाली पंक्तियों से रेखा खींचकर मिलाइए— स्तंभ 1: 1. लाखों के आदमी खाक में मिल गए। 2. धोती ऐसी चर्रा रही है, जैसे पुरानी हो। 3. माल-मसाला तो अंटी में है न? 4. खाने में क्या देर-दार है। 5. पहले आत्मा फिर परमात्मा — स्तंभ 2: 1. भोजन की व्यवस्था कब तक हो जाएगी 2. पहले अपना ध्यान फिर दूसरा काम 3. बहुत ही समृद्ध व्यक्ति थे पर अब उनके पास कुछ भी नहीं है 4. कपड़ा पसीने से भीगकर पुराने जैसा हो गया है 5. धनराशि सुरक्षित तो है न!
उत्तर
सही मिलान इस प्रकार है:
| स्तंभ 1 | → | स्तंभ 2 | यह भाव क्यों |
|---|---|---|---|
| 1. लाखों के आदमी खाक में मिल गए। | → 3 | बहुत ही समृद्ध व्यक्ति थे पर अब उनके पास कुछ भी नहीं है | नन्हेमल संपतराम के बारे में कहता है — “उन बेचारों का कारोबार सब चौपट हो गया।” ‘खाक में मिलना’ मुहावरा है — पूरी तरह नष्ट हो जाना। |
| 2. धोती ऐसी चर्रा रही है, जैसे पुरानी हो। | → 4 | कपड़ा पसीने से भीगकर पुराने जैसा हो गया है | बाबूलाल की धोती नई है — “पिछले दिनों नकद नौ रुपये खर्च करके खरीदी थी” — पर पसीने से भीगकर चरचराने लगी है। |
| 3. माल-मसाला तो अंटी में है न? | → 5 | धनराशि सुरक्षित तो है न! | ‘अंटी’ = कमर में धोती की गाँठ, जहाँ रुपये रखे जाते थे। नन्हेमल का उत्तर इसे पक्का कर देता है — “नहीं, जेब में है, बंडी की जेब में है।” |
| 4. खाने में क्या देर-दार है। | → 1 | भोजन की व्यवस्था कब तक हो जाएगी | नन्हेमल भूख और नींद का हवाला देकर खाने की देर पूछ रहा है — “बात यह है कि नींद बड़े जोर से आ रही है।” |
| 5. पहले आत्मा फिर परमात्मा | → 2 | पहले अपना ध्यान फिर दूसरा काम | रेवती कहती है — “जब शरीर ही ठीक नहीं रहता तो फिर और क्या करूँ?” यानी पहले अपना शरीर सँभालूँ, बाकी बाद में। |
मिलान करने की तरकीब: पहले वे जोड़े मिलाइए जिनमें कोई शब्द साफ संकेत दे — ‘माल-मसाला’ में धन का संकेत है, ‘खाने में’ में भोजन का। बचे हुए विकल्पों में से चुनना तब आसान हो जाता है। यही तरीका परीक्षा में भी काम आता है।
ध्यान दीजिए: ये पाँचों प्रयोग बोलचाल की भाषा के हैं, किताबी नहीं। उदयशंकर भट्ट ने पात्रों की जुबान वैसी ही रखी है जैसी उस समय एक कस्बाई व्यापारी और एक थकी हुई गृहिणी बोलती — इसीलिए संवाद आज भी सच्चे लगते हैं।