मल्हार अध्याय 8 पंक्तियों पर चर्चा

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
पाठ में से चुनकर कुछ पंक्तियाँ नीचे दी गई हैं। इन्हें ध्यानपूर्वक पढ़िए और इन पर विचार कीजिए। आपको इनका क्या अर्थ समझ में आया? अपने विचार अपनी कक्षा में साझा कीजिए। — “पानी पीते-पीते पेट फूला जा रहा है, और प्यास है कि बुझने का नाम नहीं लेती।”
उत्तर

अर्थ: गरमी इतनी है कि पानी पेट भर चुका है, पर प्यास फिर भी नहीं मरी। विश्वनाथ चार गिलास पीकर आया है और होंठ अब भी सूख रहे हैं।

भाव: यह पंक्ति एक साथ दो बातें कहती है। ऊपर से यह गरमी की तीव्रता बताती है। भीतर से यह उस परिवार की पूरी हालत का चित्र है — जो उपाय उनके पास है, वह उनकी तकलीफ के आगे बहुत छोटा है। पानी है, पर राहत नहीं; मकान है, पर हवा नहीं; कमाई है, पर बड़ा मकान नहीं।

भाषा कैसे काम करती है: ‘प्यास है कि बुझने का नाम नहीं लेती’ में प्यास को एक जिद्दी व्यक्ति की तरह बरता गया है, जो मानने से इनकार कर रहा हो — यह मानवीकरण है। ‘पेट फूला जा रहा है’ में अतिशयोक्ति है। दोनों मिलकर पाठक को गरमी बताते नहीं, महसूस कराते हैं।
प्र2.
“सारे शहर में जैसे आग बरस रही हो।”
उत्तर

अर्थ: लू और तपन इतनी है मानो आसमान से पानी नहीं, आग बरस रही हो। पूरा शहर तप रहा है — केवल एक घर नहीं।

भाव: विश्वनाथ यह वाक्य कहकर आगे जोड़ता है — “इसीलिए यहाँ गर्मियों में सभी बड़े लोग पहाड़ों पर चले जाते हैं।” और रेवती का उत्तर पूरी बात खोल देता है — “चले जाते होंगे। गरीबों की तो मौत है।” यानी गरमी सब पर बरसती है, पर उससे बचने का उपाय सबके पास नहीं। यहाँ मौसम का वर्णन चुपके से एक सामाजिक बात कह जाता है।

भाषा कैसे काम करती है: ‘बरसना’ शब्द वर्षा का है। उसे आग के साथ जोड़ते ही अर्थ उलट जाता है — जो शब्द राहत का था, वही यातना का बन गया। ‘जैसे’ के कारण यह उपमा है।
प्र3.
“यह तो हमारा ही भाग्य है कि चने की तरह भाड़ में भुनते रहते हैं।”
उत्तर

अर्थ: जैसे भाड़ (भट्ठी) में चने डालकर भूने जाते हैं, वैसे ही हम इस तंग, गरम मकान में भुनते रहते हैं — और यही हमारी किस्मत है।

भाव: यह रेवती का सबसे कड़वा वाक्य है। इससे ठीक पहले वह कह चुकी है कि नौकर तीन मंजिल पानी चढ़ाने से भाग जाता है — “किसी को क्या जरूरत पड़ी है जो गरमी में भुने।” यानी नौकर के पास तो भाग जाने का विकल्प है, उनके पास वह भी नहीं। ‘भाग्य’ शब्द में शिकायत भी है और हार भी।

भाषा कैसे काम करती है: ‘चने की तरह’ — उपमा; ‘भाड़ में भुनना’ — मुहावरा, जिसका अर्थ है बहुत कष्ट सहना। चने की तुलना खास तौर पर चुभती है, क्योंकि चना सबसे सस्ता और सबसे मामूली दाना है। रेवती अपने परिवार को उतना ही मामूली और उतना ही बेबस मान रही है।
प्र4.
“आह, अब जान में जान आई। सचमुच गरमी में पानी ही तो जान है।”
उत्तर

अर्थ: ठंडा पानी पीते ही नन्हेमल को राहत मिलती है। ‘जान में जान आना’ का अर्थ है — घबराहट दूर होकर चैन आ जाना।

भाव: ऊपर से यह गरमी में पानी के महत्त्व की बात है। पर इसे कहने वाला कौन है, यह देखना जरूरी है। नन्हेमल एक ऐसा मेहमान है जिसने अभी तक अपना परिचय तक ठीक से नहीं दिया, और जिसकी राहत के लिए इस घर का बच्चा गरमी में बाहर जाकर बरफ ढूँढ़ लाया है। एक की ‘जान में जान’ दूसरे की दौड़-भाग से आई है — एकांकी यही विडंबना बार-बार दिखाती है।

भाषा कैसे काम करती है: एक ही वाक्य में ‘जान’ शब्द दो अर्थों में आया है — पहले ‘प्राण/चेतना’, फिर ‘प्राण देने वाली वस्तु’। एक शब्द के दो अर्थों का यह खेल वाक्य को याद रह जाने लायक बना देता है। ‘आह’ जैसा उद्गार संवाद को मंच पर बोलने लायक भी बनाता है।
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