प्र1.
“सारे शहर में जैसे आग बरस रही हो।” “चारों तरफ दीवारें तप रही हैं।” “यह तो हमारा ही भाग्य है कि चने की तरह भाड़ में भुनते रहते हैं।” उपर्युक्त वाक्यों में रेखांकित शब्द गरमी की प्रचंडता को दर्शा रहे हैं कि तापमान अत्यधिक है। एकांकी में इस प्रकार के और भी प्रयोग हुए हैं जहाँ शब्दों के माध्यम से विशेष प्रभाव उत्पन्न किया गया है, उन प्रयोगों को छाँटकर अपनी लेखन पुस्तिका में लिखिए।
उत्तर
एकांकी में ऐसे प्रयोग भरे पड़े हैं। इन्हें प्रभाव के अनुसार छाँटकर लिखिए —
| प्रयोग | कौन-सा प्रभाव | कैसे |
|---|---|---|
| “मकान है कि भट्टी!” | गरमी की प्रचंडता | मकान को सीधे भट्ठी कह देना — रूपक। तुलना का शब्द (‘जैसा’) भी नहीं लगाया गया, इसलिए असर और तेज है। |
| “पत्ता तक नहीं हिल रहा है।” | हवा का बिलकुल बंद होना | ‘गरमी’ शब्द कहे बिना उमस दिखा देना। यह एक मुहावरे जैसा प्रयोग है। |
| “पानी पीते-पीते पेट फूला जा रहा है” | बेचैनी | अतिशयोक्ति — बात को बढ़ाकर कहना। |
| “जाने कब तक इस जेलखाने में सड़ना होगा।” | घुटन और बेबसी | मकान के लिए ‘जेलखाना’ — रूपक; और ‘सड़ना’ शब्द निराशा भर देता है। |
| “तमाम शरीर मारे गरमी के उबल उठा है।” | शरीर की तपन | ‘उबलना’ पानी का शब्द है, शरीर के लिए प्रयोग होते ही अतिशयोक्ति बन जाता है। |
| “कपड़े तो ऐसे हो गए कि निचोड़ लो।” / “एक लोटे से कम पसीना नहीं निकलेगा।” | पसीने की अधिकता | अतिशयोक्ति — पसीने को लोटे से नापना। |
| “प्राण सूखे जा रहे हैं।” | प्यास की तीव्रता | ‘प्राण’ का सूखना असंभव है — इसी असंभव से प्रभाव बनता है। |
| “फिर भी पसीने से नहा गया हूँ।” | उमस | नहाकर आने पर भी पसीने से नहाना — विरोधाभास जैसा प्रभाव। |
| “सिर फटा जा रहा है।” | असह्य पीड़ा | दर्द को शरीर के टूटने जैसा दिखाना। |
| “गरीबों की तो मौत है।” | व्यंग्य और करुणा | दो शब्दों में पूरा वर्ग-भेद कह देना। |
| “लाखों के आदमी खाक में मिल गए।” | पूर्ण बरबादी | मुहावरा; ‘लाखों के आदमी’ में समृद्धि और ‘खाक’ में शून्य — दोनों आमने-सामने। |
| “अब जान में जान आई।” | गहरी राहत | एक ही शब्द ‘जान’ को दो अर्थों में बरतना। |
| “ठंडा-ठंडा पानी”, “गट-गट पानी पीते हैं”, “जोर-जोर से पंखा”, “हबड़-तबड़” | दृश्य और ध्वनि का सजीव चित्र | पुनरुक्त और अनुकरणात्मक शब्द — इनसे संवाद बोलने पर सुनाई देने लगता है। |
इन सबका साझा गुण: ये सब बोलचाल के प्रयोग हैं, किताबी अलंकार नहीं। उदयशंकर भट्ट ने पात्रों को वैसी ही भाषा दी जैसी एक तपते शहर में एक थका हुआ परिवार सचमुच बोलता। इसीलिए यह एकांकी पढ़ने में नहीं, सुनने में और अच्छी लगती है — और यही नाटक की भाषा की कसौटी है।