मल्हार अध्याय 8 भाषा की बात

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
“सारे शहर में जैसे आग बरस रही हो।” “चारों तरफ दीवारें तप रही हैं।” “यह तो हमारा ही भाग्य है कि चने की तरह भाड़ में भुनते रहते हैं।” उपर्युक्त वाक्यों में रेखांकित शब्द गरमी की प्रचंडता को दर्शा रहे हैं कि तापमान अत्यधिक है। एकांकी में इस प्रकार के और भी प्रयोग हुए हैं जहाँ शब्दों के माध्यम से विशेष प्रभाव उत्पन्न किया गया है, उन प्रयोगों को छाँटकर अपनी लेखन पुस्तिका में लिखिए।
उत्तर

एकांकी में ऐसे प्रयोग भरे पड़े हैं। इन्हें प्रभाव के अनुसार छाँटकर लिखिए —

प्रयोगकौन-सा प्रभावकैसे
“मकान है कि भट्टी!”गरमी की प्रचंडतामकान को सीधे भट्ठी कह देना — रूपक। तुलना का शब्द (‘जैसा’) भी नहीं लगाया गया, इसलिए असर और तेज है।
“पत्ता तक नहीं हिल रहा है।”हवा का बिलकुल बंद होना‘गरमी’ शब्द कहे बिना उमस दिखा देना। यह एक मुहावरे जैसा प्रयोग है।
“पानी पीते-पीते पेट फूला जा रहा है”बेचैनीअतिशयोक्ति — बात को बढ़ाकर कहना।
“जाने कब तक इस जेलखाने में सड़ना होगा।”घुटन और बेबसीमकान के लिए ‘जेलखाना’ — रूपक; और ‘सड़ना’ शब्द निराशा भर देता है।
“तमाम शरीर मारे गरमी के उबल उठा है।”शरीर की तपन‘उबलना’ पानी का शब्द है, शरीर के लिए प्रयोग होते ही अतिशयोक्ति बन जाता है।
“कपड़े तो ऐसे हो गए कि निचोड़ लो।” / “एक लोटे से कम पसीना नहीं निकलेगा।”पसीने की अधिकताअतिशयोक्ति — पसीने को लोटे से नापना।
“प्राण सूखे जा रहे हैं।”प्यास की तीव्रता‘प्राण’ का सूखना असंभव है — इसी असंभव से प्रभाव बनता है।
“फिर भी पसीने से नहा गया हूँ।”उमसनहाकर आने पर भी पसीने से नहाना — विरोधाभास जैसा प्रभाव।
“सिर फटा जा रहा है।”असह्य पीड़ादर्द को शरीर के टूटने जैसा दिखाना।
“गरीबों की तो मौत है।”व्यंग्य और करुणादो शब्दों में पूरा वर्ग-भेद कह देना।
“लाखों के आदमी खाक में मिल गए।”पूर्ण बरबादीमुहावरा; ‘लाखों के आदमी’ में समृद्धि और ‘खाक’ में शून्य — दोनों आमने-सामने।
“अब जान में जान आई।”गहरी राहतएक ही शब्द ‘जान’ को दो अर्थों में बरतना।
“ठंडा-ठंडा पानी”, “गट-गट पानी पीते हैं”, “जोर-जोर से पंखा”, “हबड़-तबड़”दृश्य और ध्वनि का सजीव चित्रपुनरुक्त और अनुकरणात्मक शब्द — इनसे संवाद बोलने पर सुनाई देने लगता है।
इन सबका साझा गुण: ये सब बोलचाल के प्रयोग हैं, किताबी अलंकार नहीं। उदयशंकर भट्ट ने पात्रों को वैसी ही भाषा दी जैसी एक तपते शहर में एक थका हुआ परिवार सचमुच बोलता। इसीलिए यह एकांकी पढ़ने में नहीं, सुनने में और अच्छी लगती है — और यही नाटक की भाषा की कसौटी है।
प्र2.
मुहावरे — “आज दो साल से दिन-रात एक करके ढूँढ़ रहा हूँ।” “लाखों के आदमी खाक में मिल गए।” उपर्युक्त वाक्यों में रेखांकित वाक्यांश ‘रात-दिन एक करना’ तथा ‘खाक में मिलना’ मुहावरों का प्रायोगिक रूप है। ये वाक्य में एक विशेष प्रभाव उत्पन्न कर रहे हैं। एकांकी में आए अन्य मुहावरों की पहचान करके लिखिए और उनके अर्थ समझते हुए उनका अपने वाक्यों में प्रयोग कीजिए।
उत्तर
मुहावराअर्थएकांकी मेंमेरा अपना वाक्य
जान में जान आनाघबराहट दूर होकर चैन मिलना“आह! अब जान में जान आई।”बेटे का फोन आते ही माँ की जान में जान आई।
सिर फटनातेज सिरदर्द होना“दर्द के मारे सिर फटा जा रहा है।”दिन भर के शोर से मेरा सिर फटा जा रहा है।
आग बरसनाअत्यधिक गरमी पड़ना“सारे शहर में जैसे आग बरस रही हो।”जून की दोपहर में तो आसमान से आग बरसती है।
भाड़ में भुननाबहुत कष्ट सहना“चने की तरह भाड़ में भुनते रहते हैं।”बिना पंखे के उस कमरे में हम भाड़ में भुनते रहे।
गला तर करनापानी पीकर प्यास बुझाना“ज़रा गला ही तर कर लूँ।”दौड़ से लौटकर उसने पहले गला तर किया।
प्राण सूखनाबहुत घबरा जाना या व्याकुल होना“प्राण सूखे जा रहे हैं।”अँधेरी गली में अकेला देखकर मेरे प्राण सूख गए।
चल बसनामर जाना“और वह चल बसी।”लंबी बीमारी के बाद वे चल बसे।
चौपट होनापूरी तरह नष्ट हो जाना“उन बेचारों का कारोबार सब चौपट हो गया।”बाढ़ में किसानों की सारी फसल चौपट हो गई।
धुन सवार होनाकिसी बात की लगन या जिद चढ़ जाना“तुम्हें भी न जाने क्या धुन सवार हो जाती है।”उसे इन दिनों तैराकी सीखने की धुन सवार है।
हाथ-पैर फूल जाना / सुन्न हो जानाघबराहट या कमजोरी से शरीर का जवाब दे देना“पहले सोते-सोते हाथ-पैर सुन्न हो जाते थे, अब बैठे-बैठे हो जाते हैं।”परीक्षा-भवन में प्रश्न देखकर उसके हाथ-पैर फूल गए।
पत्ता तक न हिलनाबिलकुल हवा न चलना; पूरी तरह सन्नाटा होना“पत्ता तक नहीं हिल रहा है।”दोपहर की उमस में पत्ता तक नहीं हिल रहा था।
पसीने से नहा जानाबहुत अधिक पसीना आना“फिर भी पसीने से नहा गया हूँ।”मैदान से लौटते-लौटते वह पसीने से नहा गया।
कहावत भी देखिए: पाठ के आरंभ की भूमिका में एक कहावत आई है — ‘मान न मान मैं तेरा मेहमान’, यानी बिना संबंध के जबरदस्ती अपनापन जताना। पूरी एकांकी इसी एक कहावत का विस्तार है।
मुहावरा और कहावत में अंतर: मुहावरा वाक्य का अंश होता है और क्रिया के साथ रूप बदलता है (‘जान में जान आई’, ‘जान में जान आएगी’)। कहावत पूरा वाक्य होती है और उसका रूप नहीं बदलता।
प्र3.
बात पर बल देना — “वह तो कहो, मैं भी ढूँढ़कर ही रहा।” उपर्युक्त वाक्य से रेखांकित शब्द ‘ही’ हटाकर पढ़िए— “वह तो कहो, मैं भी ढूँढ़कर रहा” (क) दो-दो के जोड़े में चर्चा कीजिए कि वाक्य में ‘ही’ के प्रयोग से किस बात को बल मिल रहा था और ‘ही’ हटा देने से क्या कमी आई?
उत्तर

‘ही’ किस बात को बल दे रहा था: उसने आधी रात तक भटकने के बाद भी हार नहीं मानी — मकान ढूँढ़कर ही दम लिया। यहाँ ‘ही’ दृढ़ निश्चय पर बल देता है: काम पूरा किए बिना नहीं छोड़ा।

वाक्य से पहले का संदर्भ इसे और साफ करता है। आगंतुक कहता है — “भाई, बहुत बड़ा शहर है। वह तो कहो, मैं भी ढूँढ़कर ही रहा, नहीं तो न जाने कहाँ होटल या धर्मशाला में रहना पड़ता।” यानी उसकी जिद न होती, तो वह रात होटल में काटता।

‘ही’ हटाने से क्या कमी आई:

  • वाक्य का जोर खत्म हो गया — “मैं भी ढूँढ़कर रहा” में अब कोई निश्चय नहीं बचा, बस एक सूचना रह गई।
  • वाक्य अधूरा-सा लगने लगा — पाठक को लगता है कि आगे कुछ और आना चाहिए।
  • अगले हिस्से से जुड़ाव टूट गया — “नहीं तो न जाने कहाँ होटल में रहना पड़ता” का विरोध तभी सार्थक है जब पहले खंड में जिद हो।
क्यों होता है ऐसा: ‘ही’ अपने आप में कोई नई सूचना नहीं देता — वह केवल यह बताता है कि वाक्य का भार किस शब्द पर रखना है। ऐसे शब्दों का काम बोलने में स्वर के उतार-चढ़ाव जैसा होता है। (व्याकरण में इन्हें निपात कहा जाता है।) इसीलिए ‘ही’ का स्थान बदलते ही अर्थ भी बदल जाता है — “मैं ही ढूँढ़कर रहा” का अर्थ है कि और कोई नहीं ढूँढ़ पाता; “मैं ढूँढ़कर ही रहा” का अर्थ है कि मैंने हार नहीं मानी।
प्र4.
(ख) नीचे लिखे वाक्यों में ऐसे स्थान पर ‘ही’ का प्रयोग कीजिए कि वे सामने लिखा अर्थ देने लगे— 1. विश्वनाथ के अतिथि यहाँ रुकेंगे — और किसी के अतिथि नहीं। 2. विश्वनाथ के अतिथि यहाँ रुकेंगे — यहाँ के अतिरिक्त और कहीं नहीं। 3. विश्वनाथ के अतिथि यहाँ रुकेंगे — यहाँ रुकना निश्चित है।
उत्तर
क्र.वांछित अर्थ‘ही’ लगाकर बना वाक्य‘ही’ किस शब्द पर लगा
1.और किसी के अतिथि नहीं।विश्वनाथ के ही अतिथि यहाँ रुकेंगे।‘विश्वनाथ के’ पर — यानी किसके अतिथि, यह तय किया जा रहा है।
2.यहाँ के अतिरिक्त और कहीं नहीं।विश्वनाथ के अतिथि यहीं रुकेंगे।‘यहाँ’ पर — यानी कहाँ रुकेंगे, यह तय किया जा रहा है। (‘यहाँ + ही’ मिलकर यहीं बन जाता है।)
3.यहाँ रुकना निश्चित है।विश्वनाथ के अतिथि यहाँ रुकेंगे हीक्रिया ‘रुकेंगे’ पर — यानी रुकना पक्का है, इसमें कोई संदेह नहीं।
नियम पकड़िए: ‘ही’ हमेशा उस शब्द के तुरंत बाद आता है जिस पर बल देना है। इसलिए एक ही वाक्य के तीन अलग-अलग अर्थ केवल ‘ही’ की जगह बदलकर बनाए जा सकते हैं — शब्द वही रहते हैं, क्रम भी लगभग वही रहता है।
ध्यान रहे: कुछ शब्दों में ‘ही’ जुड़कर नया रूप बना लेता है — यहाँ + ही = यहीं, वहाँ + ही = वहीं, अब + ही = अभी, तब + ही = तभी, यह + ही = यही, वह + ही = वही। इसीलिए दूसरे वाक्य में ‘यहाँ ही’ नहीं, ‘यहीं’ लिखना अधिक सहज है।
प्र5.
• “तुम नहाने तो जाओ।” उपर्युक्त वाक्य में ‘तो’ का स्थान बदलकर अर्थ में आए परिवर्तन पर ध्यान दें— “तुम तो नहाने जाओ।” “तुम नहाने जाओ तो।” ‘ही’ और ‘तो’ के ऐसे और प्रयोग करके वाक्य बनाइए।
उत्तर

पहले दिए गए तीनों वाक्यों का अंतर समझिए —

वाक्यबल किस परअर्थ
तुम नहाने तो जाओ।‘नहाने’ परबाकी बातें छोड़ो, पहले नहाने का काम कर आओ। (एकांकी में विश्वनाथ यही कहकर आगंतुक को भेजता है और फिर रेवती से बात करता है।)
तुम तो नहाने जाओ।‘तुम’ परदूसरों की चिंता मत करो, तुम अपना काम करो।
तुम नहाने जाओ तोपूरी क्रिया पर, शर्त के रूप मेंपहले जाओ तो सही — फिर आगे की बात होगी। इसमें हल्का उलाहना भी है।

‘ही’ के मेरे अपने वाक्य:

  • रेवती ही खाना बनाएगी। (और कोई नहीं बनाएगा।)
  • रेवती खाना ही बनाएगी। (और कोई काम नहीं करेगी।)
  • रेवती खाना बनाएगी ही। (बनाना निश्चित है।)
  • प्रमोद अभी बरफ लेकर आ जाएगा। (अब + ही)
  • मेहमान वहीं ठहरे थे। (वहाँ + ही)

‘तो’ के मेरे अपने वाक्य:

  • तुम तो पहले पानी पी लो। (और लोगों की बात बाद में।)
  • तुम पानी तो पी लो। (कम से कम इतना तो कर ही लो।)
  • तुम पानी पी लो तो। (पहले यह कर लो, फिर आगे बात करेंगे।)
  • आया तो वह था, पर बहुत देर से। (आना सच है, समय गलत था।)
‘ही’ और ‘तो’ में अंतर: ‘ही’ किसी बात को सीमित करता है — बाकी सबको बाहर कर देता है (‘रेवती ही’ = और कोई नहीं)। ‘तो’ किसी बात को अलग करके सामने रखता है, पर बाकी को नकारता नहीं (‘पानी तो पी लो’ = खाना भले न खाओ, पानी पी लो)। इसीलिए ‘तो’ में अक्सर आग्रह, तुलना या हल्का उलाहना घुला रहता है।
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