प्र1.
कवि सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ का जीवन सादगी भरा था, परंतु वे अपने आतिथ्य के लिए जाने जाते थे। उनके घर में कोई अतिथि आ जाए तो वे उसके सत्कार के लिए जी-जान से जुट जाते थे। महादेवी वर्मा की पुस्तक पथ के साथी से निराला के आतिथ्य भाव का एक छोटा-सा अंश पढ़िए—
उत्तर
यह अंश महादेवी वर्मा की पुस्तक पथ के साथी से लिया गया है, जिसमें उन्होंने अपने समकालीन साहित्यकारों के रेखाचित्र लिखे हैं। पाठ के साथ इसे रखने का कारण साफ है — यह ‘नए मेहमान’ के ठीक उल्टी तस्वीर सामने रखता है।
अंश क्या कहता है:
- निराला जी अचानक पहुँचकर कहते — “मेरे इक्के पर कुछ लकड़ियाँ, थोड़ा घी आदि रखवा दो। अतिथि आए हैं, घर में सामान नहीं है।” यानी घर में सामान न होने पर भी अतिथि को लौटाने की बात उनके मन में आती ही नहीं।
- “भोजन बनाने से लेकर जूठे बर्तन माँजने तक का काम वे अपने अतिथि देवता के लिए सहर्ष करते हैं।” — सेवा किसी और से नहीं करवाते, स्वयं करते हैं, और खुशी से करते हैं।
- महादेवी जी आधुनिक युग पर व्यंग्य करती हैं — “तैंतीस कोटि देवताओं के देश में इस वर्ग के देवताओं की संख्या कम नहीं, पर आधुनिक युग ने उनकी पूजा विधि में बहुत कुछ सुधार कर लिया है।” यानी अब अतिथि-सेवा बेयरा और नौकर कर देते हैं, और गृहपति को बस खाने की मेज पर बैठे रहने का ‘कर्तव्य’ निभाना पड़ता है — कुछ तो उससे भी छूट जाते हैं।
- अंत में वे कहती हैं कि निराला जी में आतिथ्य का वही पुरातन संस्कार है जो इस देश के ग्रामीण किसान में मिलता है — गहरा, सहज और बिना दिखावे का।
‘नए मेहमान’ से तुलना कीजिए:
| बिंदु | निराला (पथ के साथी) | विश्वनाथ (नए मेहमान) |
|---|---|---|
| अतिथि के आने पर भाव | उत्साह — सामान न हो तो उधार लाकर भी जुट जाते हैं। | घबराहट और संकोच — “यदि कोई अतिथि आ जाए तो क्या होगा?” |
| सेवा कौन करता है | स्वयं — भोजन बनाने से बर्तन माँजने तक। | पत्नी, बच्चे, या बाजार — “बाजार से कुछ मँगा दो न!” |
| अतिथि कौन है | ‘जो अपना घर समझकर आए हैं’ — अपनापन दोनों ओर से। | अजनबी, जो अपनापन केवल जताते हैं। |
दोनों को साथ पढ़ने से क्या मिलता है: एकांकी दिखाती है कि आतिथ्य का संस्कार सामर्थ्य से टकराने पर कैसे बोझ बन जाता है। यह अंश दिखाता है कि वही संस्कार मन से निकलने पर कैसे सुख बन जाता है। दोनों में अंतर पैसे का नहीं है — निराला जी भी सादगी भरा जीवन जीते थे। अंतर भाव का है। और यही बात एकांकी के अंत में रेवती भी सिद्ध कर देती है, जब वह अपने भाई के लिए उसी थके शरीर से रसोई में चली जाती है।