यह उत्तर आपका अपना होगा, क्योंकि हर घर और हर क्षेत्र का ढंग अलग है। दो हिस्सों में लिखिए — अभिवादन और व्यंजन।
अभिवादन के अलग-अलग रूप: हाथ जोड़कर नमस्ते या प्रणाम; बड़ों के चरण छूना; ‘राम-राम’ (जैसे एकांकी के अंत में विश्वनाथ और मेहमान कहते हैं); ‘नमस्कार’, ‘सत श्री अकाल’, ‘आदाब’, ‘जय जिनेंद्र’, ‘खम्मा घणी’ (राजस्थान), ‘नमस्कारम्’ (दक्षिण भारत), ‘नमोश्कार’ (बंगाल), ‘जोहार’ (झारखंड-ओडिशा का आदिवासी अभिवादन)। कई घरों में अतिथि के आते ही पहले पानी दिया जाता है, फिर बैठने को कहा जाता है — यह भी अभिवादन का ही अंग है।
क्षेत्र के अनुसार पारंपरिक व्यंजन:
| राज्य / क्षेत्र | पारंपरिक व्यंजन |
|---|---|
| उत्तर प्रदेश / बिहार | पूरी-सब्जी, लिट्टी-चोखा, ठेकुआ, मालपुआ |
| राजस्थान | दाल-बाटी-चूरमा, गट्टे की सब्जी, घेवर |
| पंजाब | मक्के की रोटी–सरसों का साग, छोले-भटूरे, लस्सी |
| गुजरात | ढोकला, थेपला, ऊंधियू, श्रीखंड |
| महाराष्ट्र | पूरन पोली, मोदक, वड़ा पाव |
| बंगाल | माछेर झोल, लुची-आलूर दम, रसगुल्ला, संदेश |
| दक्षिण भारत | इडली-सांभर, डोसा, पोंगल, अवियल, पायसम |
| पूर्वोत्तर | बाँस की सब्जी, पिट्ठा, थुक्पा, मोमो |
| जम्मू-कश्मीर / हिमाचल | राजमा-चावल, धाम, कहवा |
नमूना उत्तर: “हमारे घर अतिथि के आते ही सबसे पहले उन्हें बैठने को कहा जाता है और ठंडा पानी दिया जाता है। हम बड़ों के चरण छूकर प्रणाम करते हैं और हमउम्र लोगों से हाथ जोड़कर नमस्ते कहते हैं। मैं अपने अतिथियों को अपने क्षेत्र का दाल-बाटी-चूरमा खिलाना चाहूँगी, क्योंकि यह हमारे यहाँ हर खास मौके पर बनता है और इसे मेरी दादी अब भी उपलों की आँच पर बनाती हैं।”