प्र1.
(क) विश्वनाथ ने नन्हेमल और बाबूलाल से उनका परिचय नहीं पूछा और उन्हें घर के भीतर ले आए। यदि आप उनके स्थान पर होते तो क्या करते?
उत्तर
मैं दरवाजे पर ही, विनम्रता से पर स्पष्ट रूप से, पूरा परिचय पूछ लेता — और परिचय स्पष्ट हुए बिना उन्हें घर के भीतर न ले जाता।
मैं क्रम से यह करता:
- दरवाजा पूरा न खोलकर पहले पूछता — “आप कौन हैं और किससे मिलना है?” भीतर आने का न्योता उत्तर मिलने के बाद देता।
- किसका नाम लेकर आए हैं, यह पक्का करता — वे ‘संपतराम’ का नाम ले रहे थे, जिसे विश्वनाथ जानता ही नहीं था। यहीं रुककर पूछ लेना चाहिए था।
- पता मिलाता — उन्हें ‘रेलवे रोड, कृष्णा गली’ जाना था। यह पता विश्वनाथ के घर का है या नहीं, यह पहले ही मिल जाता।
- किसी प्रमाण की बात करता — “कोई चिट्ठी लाए हैं?” यह प्रश्न विश्वनाथ ने बहुत देर से पूछा। यह पहला प्रश्न होना चाहिए था।
- पड़ोस या परिवार को साथ रखता — यदि संदेह बना रहता, तो घर के किसी बड़े व्यक्ति को साथ बुला लेता।
- मदद से मना न करता — मैं उन्हें भीतर न बुलाकर भी पानी पिला सकता था, सही पता बता सकता था और पास की धर्मशाला या कविराज रामलाल वैद्य का घर बता सकता था। सावधानी और सज्जनता साथ-साथ चल सकती हैं।
विश्वनाथ से यह चूक क्यों हुई: वह अशिष्ट कहलाने से डर गया। उसने हर बार प्रश्न शुरू किया और ‘क्षमा कीजिएगा’ कहकर बीच में छोड़ दिया। सीखने की बात यह है — परिचय पूछना अशिष्टता नहीं है। अशिष्टता तरीके में होती है, प्रश्न में नहीं।