मल्हार अध्याय 8 सृजन

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
(क) आपने यह एकांकी पढ़ी। इस एकांकी में एक कहानी कही गई है। उस कहानी को अपने शब्दों में लिखिए। (जैसे— एक दिन मेरे घर में मेहमान आ गए…)
उत्तर

यहाँ एकांकी को कहानी में बदलना है। इसका अर्थ है — संवादों को हटाकर घटनाओं को क्रम से सुनाना, और रंगमंच-निर्देशों को वर्णन में बदल देना। कहानी किसी एक पात्र की जुबानी लिखी जा सकती है (यहाँ प्रमोद की जुबानी लिखी गई है)।

नमूना उत्तर — ‘उस रात के मेहमान’

एक दिन मेरे घर में मेहमान आ गए, और वह दिन मुझे आज तक याद है।

गरमी की वह रात ऐसी थी कि पत्ता तक नहीं हिल रहा था। हमारा किराये का मकान वैसे भी छोटा है — दो कमरे, एक छोटा-सा आँगन और ऊपर एक साझी छत। मेज पर रखा पुराना पंखा घरघराता तो बहुत था, पर हवा नाम की चीज नहीं देता था। पिता जी दफ्तर से लौटकर छोटे भाई को हाथ के पंखे से हवा कर रहे थे और बार-बार कह रहे थे कि मकान है कि भट्टी। माँ का सिर पंद्रह दिन से दर्द कर रहा था। उन्होंने ईश्वर से बस एक ही बात माँगी थी — इन दिनों कोई मेहमान न आए।

तभी दरवाजा खटखटा। पिता जी नीचे गए और थोड़ी देर बाद दो अजनबी बिस्तर और संदूक उठाए ऊपर चढ़ आए। कमीजों के ऊपर काली बंडी, सिर पर सफेद पगड़ी। बड़े का नाम नन्हेमल था, छोटे का बाबूलाल। वे आते ही ‘पंडित जी’ कहकर बैठ गए, पसीना पोंछा और ठंडे पानी की माँग की। मैं दौड़कर गली से बरफ ले आया। दोनों गट-गट पानी पीकर बोले — अब जान में जान आई। फिर मुझसे और बहन किरण से नाम पूछा और आपस में कहा, “कितने सीधे लड़के हैं।”

पिता जी बार-बार पूछते रहे कि वे कौन हैं, कहाँ से आए हैं। वे कभी किसी संपतराम का नाम लेते, कभी सेठ जगदीशप्रसाद का। चिट्ठी पूछी गई तो सकपका गए। भीतर माँ ने साफ कह दिया कि वे खाना नहीं बनाएँगी। इसी बीच मेहमानों ने पड़ोसी की छत पर हाथ धो लिए, पानी फैल गया और पड़ोसी अंकल गुस्से में आ धमके — “मेहमान आपके होंगे, मेरे नहीं।” पिता जी बार-बार क्षमा माँगते रहे, और वे बार-बार ताना मारकर चले गए।

आखिर पिता जी ने सीधा पूछ लिया कि जिनके यहाँ जाना है, उनका नाम क्या है और वे करते क्या हैं। बहुत सोचने के बाद बाबूलाल बोला — शायद कविराज हैं, वैद्य हैं। तब मुझे याद आया कि पिछली गली में कविराज रामलाल वैद्य रहते हैं। दोनों उछल पड़े — “अरे हाँ, वही तो!” और राम-राम कहकर मेरे साथ चल दिए। मैं उन्हें उनका घर दिखाकर लौटा तो माँ चैन की साँस ले रही थीं।

पर उसी समय नीचे से आवाज आई — “भले आदमी, न जाने कहाँ मकान लिया है, ढूँढ़ते-ढूँढ़ते आधी रात हो गई।” माँ का चेहरा खिल उठा। मामा जी आए थे। उन्होंने झाँसी से तार भेजा था, जो हमें मिला ही नहीं, और वे चार घंटे से मकान खोज रहे थे। मामा जी बार-बार कहते रहे कि इतनी गरमी में खाना रहने दो, वे पानी पीकर सो जाएँगे। पर माँ, जिन्होंने घंटे भर पहले खाना बनाने से साफ मना कर दिया था, उसी सिरदर्द और उसी गरमी में रसोई की ओर चल दीं। जाते-जाते उन्होंने बस इतना कहा — “भैया भूखे नहीं सो सकते।”

उस रात मुझे समझ आया कि मेहमानदारी बोझ है या सुख, यह मेहमान के आने से नहीं, आने वाले के अपनेपन से तय होता है।

कहानी लिखते समय ध्यान दीजिए:
  • संवाद बिलकुल न रखें, ऐसा जरूरी नहीं — पर उन्हीं को रखिए जो कहानी का मोड़ बनाते हों (जैसे “भैया भूखे नहीं सो सकते।”)।
  • रंगमंच-निर्देशों को वर्णन बना दीजिए — “कमरा बेहद गरम है” को “कमरा भट्ठी जैसा तप रहा था” लिख दीजिए।
  • घटनाओं का क्रम मत बदलिए — दस्तक → मेहमानों का आना → पड़ोसी का झगड़ा → खुलासा → भाई का आना।
  • अंत में अपनी एक पंक्ति जोड़िए, जिसमें आपकी समझ दिखे। कहानी वहीं से आपकी बनती है।
क्या यह उपयोगी रहा? त्रुटि बताएँ