मानचित्र सबसे पहले यही सिद्ध करता है कि उसकी संकेतिका के चारों खनिज — कोयला, तेल, लौह अयस्क और बॉक्साइट — बिल्कुल भी समान रूप से नहीं फैले हैं। हर खनिज कुछ ही ज़िलों में है और देश के अधिकांश भाग में कहीं नहीं।
चित्र 1.11 का खनिज-वार पाठ —
| खनिज (संकेतिका चिह्न) | मानचित्र पर अंकित स्थान | प्रतिरूप |
|---|---|---|
| कोयला (काला वृत्त) | रानीगंज, झरिया, बोकारो, कोरबा, तालचेर, सिंगरेनी, नेवेली; असम में माकुम और जंजी | एक पट्टी जो प्रायद्वीप के उत्तर-पूर्व में फैली है — झारखंड, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, छत्तीसगढ़ — तथा सुदूर दक्षिण में नेवेली और ऊपरी असम अलग-थलग |
| तेल (पीला त्रिभुज) | डिगबोई, नाहरकटिया, मोरान, हुगरीजन (असम); कलोल और अंकलेश्वर (गुजरात); बसीन और मुंबई हाई, दोनों अपतटीय | केवल दो गुच्छे — उत्तर-पूर्व में ऊपरी असम और पश्चिम में गुजरात तथा मुंबई के निकट समुद्र |
| लौह अयस्क (गुलाबी वर्ग) | गुआ, मयूरभंज, केंदुझार, दुर्ग, बैलाडीला, चंद्रपुर; रत्नागिरी, गोवा, बेल्लारी, चित्रदुर्ग, चिकमंगलूर, कुद्रेमुख, तुमकुरू | दो चाप — एक पूर्व में (झारखंड–ओडिशा–छत्तीसगढ़) और दूसरा पश्चिम एवं दक्षिण में (महाराष्ट्र, गोवा, कर्नाटक) |
| बॉक्साइट (नारंगी समचतुर्भुज) | कटनी, अमरकंटक, बिलासपुर, कोरापुट | सबसे कम स्थान, जो मध्य-पूर्वी पठार पर एक रेखा में हैं |
इस प्रतिरूप का अर्थ। ध्यान दीजिए कि झारखंड–ओडिशा–छत्तीसगढ़ की पट्टी में कोयला और लौह अयस्क कितनी बार साथ-साथ मिलते हैं। इसीलिए भारत के बड़े इस्पात नगर — बोकारो, दुर्गापुर, राउरकेला, भिलाई — ठीक वहीं विकसित हुए : अयस्क और उसे गलाने के लिए आवश्यक कोयला, दोनों पास ही थे। पृष्ठ 9 की अध्याय की बात यहाँ आँखों से दिखती है — उद्योग संसाधनों के निकट लगते हैं और उनके आस-पास बस्तियाँ विकसित होती हैं।
यह भी देखिए कि मानचित्र क्या नहीं दिखाता। उत्तरी मैदानों, राजस्थान और सुदूर दक्षिण के अधिकांश भाग पर कोई चिह्न नहीं है। ये क्षेत्र निर्धन नहीं हैं — उनकी संपदा इन चार खनिजों के स्थान पर मृदा, जल, सूर्य का प्रकाश और जन-शक्ति है। कोई भी संसाधन-मानचित्र केवल वही दिखाता है जो उसकी संकेतिका मापती है।
नमूना उत्तर (अपने क्षेत्र के लिए): ‘हमारा ज़िला मैदानी भाग में है और चित्र 1.11 पर उस पर कोई चिह्न नहीं है। हमारे संसाधन हैं जलोढ़ मृदा, नहर और भूजल, लगभग आठ माह की तेज़ धूप, और नदी-तट की ईंट-मिट्टी। इनका वितरण नदी ने तय किया है — सबसे उपजाऊ मृदा और सबसे ऊँचा भूजल स्तर नदी के दोनों ओर की चौड़ी पट्टी में है, ईंट-भट्ठे तट पर ही हैं, और नदी से दूर की पुरानी भूमि को अधिक सिंचाई चाहिए। मानचित्र पर अंकित निकटतम खनिज सिंगरौली का कोयला है, जो हमसे लगभग 200 कि.मी. दक्षिण में है और वहीं से हमारी बिजली आती है।’