प्र1.
आपके विचार से विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों में उपलब्ध प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग को सक्षम बनाने के लिए कौन-कौन से इनपुट आवश्यक हैं?
उत्तर
धरती के नीचे पड़ा भंडार अभी संसाधन नहीं है। उसे संसाधन बनाने में अनेक इनपुट लगते हैं — और पृष्ठ 11 की समापन पंक्ति निर्णायक इनपुट गिना देती है : मानवीय ज्ञान, सुशासन और रणनीतिक योजना ही तय करती है कि वे स्थायी लाभ बनेंगे या अस्थायी अप्रत्याशित लाभ।
| इनपुट | यह क्या करता है | इसके बिना |
|---|---|---|
| ज्ञान और प्रौद्योगिकी | भंडार खोजती है, वहाँ तक पहुँचाती है और प्रसंस्करण करती है | पृष्ठ 2 का अध्याय का अपना उदाहरण — समुद्र की जिस गहराई में स्थित खनिज तेल तक पहुँचने की तकनीक हमारे पास नहीं, वह संसाधन ही नहीं है |
| कुशल जन-शक्ति | अभियंता, भूवैज्ञानिक, मशीन चालक, तकनीशियन — और उन्हें तैयार करने वाले विद्यालय व प्रशिक्षण संस्थान | संयंत्र बन तो जाता है, पर न चलाया जा सकता है न सुधारा |
| पूँजी | खान खोदने, संयंत्र लगाने, ग्रिड बिछाने का धन — जो प्रायः किसी भी लाभ से वर्षों पहले लगाना पड़ता है | बात सर्वेक्षण से आगे नहीं बढ़ती। ध्यान दीजिए कि अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन का एक कार्य ‘मितव्ययी वित्तपोषण विकल्प उपलब्ध कराना’ ही है (पृष्ठ 18) |
| ऊर्जा और जल | निष्कर्षण और प्रसंस्करण का हर चरण दोनों खाता है | काम रुक जाता है — या स्थानीय भूजल सूख जाता है और एक दूसरी समस्या खड़ी हो जाती है |
| परिवहन और संपर्क | सड़क, रेल, बंदरगाह, पाइपलाइन और संचरण लाइनें, जो संसाधन को उपयोग-स्थल तक ले जाएँ | भंडार वहीं बंद पड़ा रह जाता है; बिना रेल के धरती में पड़े अयस्क का कोई मूल्य नहीं |
| मूल्य बढ़ाने वाले उद्योग | कच्चे माल को उच्च मूल्य वाले उत्पाद में बदलते हैं — अयस्क से इस्पात, इस्पात से मशीन | ठीक वही विफलता जिसे ‘प्रचुरता का विरोधाभास’ कहते हैं : ऐसे उद्योग न बना पाने वाली अर्थव्यवस्थाएँ संपदा निर्यात करती रहकर भी निर्धन रहती हैं |
| सुशासन और स्पष्ट नियम | पट्टे देना, प्रदूषण की सीमाएँ तय करना और लागू कराना, विवाद सुलझाना, वहाँ के लोगों की रक्षा करना | विस्थापन, पावन स्थलों पर संघर्ष और अनियंत्रित प्रदूषण |
| रणनीतिक योजना | यह तय करती है कि कितनी गति से निकालें, भंडार समाप्त होने पर क्या करें, और विकल्प समय रहते कैसे खड़ा हो | एक उछाल, फिर खाली भंडार और बिना काम के नगर |
| सांस्कृतिक स्वीकार्यता और स्थानीय सहमति | दोहन को वहाँ रहने वालों की दृष्टि में वैध बनाती है | पृष्ठ 2 की तीसरी शर्त टूट जाती है — जैसे पवित्र उपवन में वृक्ष काटना |
भूगोल बदलते ही इनपुट बदल जाते हैं। राजस्थान के सौर पार्क को चाहिए समतल, सस्ती, धूप वाली भूमि, पैनल, भंडारण और संचरण। हिमाचल की जल विद्युत परियोजना को चाहिए तीव्र ढाल, भरोसेमंद जल-प्रवाह और कठिन पर्वतीय अभियांत्रिकी। मुंबई हाई के अपतटीय संयंत्र को चाहिए समुद्री मंच, हेलिकॉप्टर और समुद्र के नीचे पाइपलाइन। विचार वही, सूची अलग।
भारत ‘संसाधन अभिशाप’ से बड़ी सीमा तक क्यों बचा: पृष्ठ 11 सीधे कारण देता है — अपनी बढ़ती आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु ऐसे उद्योगों के विकास में निवेश करके, जो संसाधनों को उच्च मूल्य वाले उत्पादों में बदल सकें। इसीलिए पूर्वी पट्टी का कोयला और लौह अयस्क केवल कच्चे अयस्क का निर्यात न रहकर इस्पात संयंत्र और इंजीनियरिंग उद्योग बने। इन्हीं इनपुट को आप इसी पुस्तक के आगे के अध्याय में ‘उत्पादन के कारक’ के रूप में पढ़ेंगे।