हाँ — और यह बात भावना से नहीं, स्वयं अध्याय के प्रमाणों से सिद्ध होती है।
अध्याय ने जितनी समस्याएँ बताई हैं, सबका आकार एक ही है। हर व्यक्ति का निर्णय अकेले में उचित है, और उन सबका योग सबके लिए हानि है :
- कोई एक कृषक थोड़ा और भूजल खींचे तो वह अपनी फसल के लिए ठीक ही कर रहा है। परंतु जब सभी ऐसा करते हैं, तो दोहन पुनर्भरण से आगे निकल जाता है और पंजाब का लगभग 80% क्षेत्र ‘अति-दोहित’ हो जाता है — और तब किसी को भी जल नहीं मिलता (पृष्ठ 14)।
- एक व्यावसायिक बेड़ा अधिक टूना पकड़े तो उसका कुछ नहीं बिगड़ता। जब सब पकड़ते हैं, तो भंडार ही ढह जाता है और मत्स्य-व्यवसाय सबके लिए समाप्त हो जाता है (पृष्ठ 6)।
- एक कारखाना अपशिष्ट-उपचार का व्यय बचाए तो उसे लाभ है। जब अनेक बचाते हैं, तो नदी विषाक्त हो जाती है और जीवन का पोषण नहीं कर पाती (पृष्ठ 7)।
लोकसंग्रह ठीक इसी अंतर को पाटता है : वह प्रत्येक व्यक्ति से कहता है कि वह केवल अपनी तात्कालिक इच्छा नहीं, सभी की भलाई तौले — उनकी भी जो नदी के नीचे बसे हैं और उनकी भी जो अभी जन्मे नहीं हैं।
अध्याय अतीत में लौटने को नहीं कहता, न ही इसे सरल बताता है। उसके अपने उदाहरण दिखाते हैं कि इस पर चलना कैसा दिखता है : सिक्किम के कृषकों ने ऐसी मृदा पाने के लिए, जो टिके, पाँच कठिन वर्ष स्वीकार किए; भारत ने सौर तकनीक और वित्त अपने पास रखने के बजाय अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन के माध्यम से अन्य देशों के साथ साझा किया; समुदाय प्रजनन काल में मछली पकड़ना रोक देते थे। हर बार किसी ने आज का छोटा लाभ छोड़कर कल का बड़ा और साझा लाभ चुना।