कक्षा ८ सामाजिक विज्ञान अध्याय 2 आइए पता लगाएँ के लिए एनसीईआरटी समाधान

अद्यतन2026-09-19

प्र1.
चित्र 2.3, 2.12 और 2.16. के मानचित्रों की तुलना करें। आप क्या अंतर देखते हैं? इनमें क्या ‘परिवर्तन’ हुए हैं?
अरबसागरबंगाल कीखाड़ीहिंदमहासागरपेशावरपेशावरदिल्लीदिल्लीग्वालियरग्वालियरजौनपुरजौनपुरजूनागढ़जूनागढ़दौलताबाददौलताबादजाजनगरजाजनगरकोणार्ककोणार्कहालेबिदुहालेबिदुबेलूरबेलूरमदुरईमदुरई70° पू॰80° पू॰90° पू॰10° उ॰20° उ॰30° उ॰40° उ॰संकेतिकानरसिंहदेव के अधीन पूर्वी गंग क्षेत्र(1264)होयसल प्रदेश (1300)तुगलक वंश का विस्तार (1335)लोदी वंश का विस्तार (1479)महत्वपूर्ण नगरउ॰
चित्र 2.3, पृष्ठ 24 — तुगलक एवं लोदी शासकों (13वीं से 15वीं शताब्दी) के अधीन क्षेत्रों तथा दक्षिण एवं पूर्व की क्षेत्रीय शक्तियों के मध्य तुलना। वास्तविक अक्षांश-देशांतर पर पुनः बनाया गया; पुस्तक में यह उच्चावच (relief) पृष्ठभूमि पर छपा है।
बेरारबेरार(अचलपुर)(अचलपुर)अहमदनगरअहमदनगरबीदरबीदरगोलकुंडागोलकुंडाबीजापुरबीजापुर(बिजयपुर)(बिजयपुर)विजयनगरविजयनगर(हंपी)(हंपी)कालीकटकालीकट(कोझिकोड)(कोझिकोड)जाजनगरजाजनगर75° पू॰80° पू॰85° पू॰10° उ॰15° उ॰20° उ॰25° उ॰संकेतिकागजपति साम्राज्य (1458)बहमनी सल्तनत (1477)विजयनगर साम्राज्य (1509)कृष्णदेवराय के अधीन विजयनगरसाम्राज्य (1529)महत्वपूर्ण नगरउ॰
चित्र 2.12, पृष्ठ 33 — दक्कन के राजवंश एवं विजयनगर साम्राज्य, वास्तविक अक्षांश-देशांतर पर पुनः बनाया गया। संकेतिका ठीक वैसी ही दी गई है जैसी पुस्तक में छपी है — पुस्तक में “बहमनी सल्तनत (1477)” तथा “विजयनगर साम्राज्य (1509)” के सामने कोई अभिकल्प (pattern) नहीं छपा है।
अरबसागरबंगाल कीखाड़ीहिंदमहासागरपठानपठानजनजातिजनजातिमेवाड़मेवाड़लाहौरलाहौरमुल्तानमुल्तानदिल्लीदिल्लीजयपुरजयपुरआगराआगरापटनापटनागुवाहाटीगुवाहाटीढाकाढाकासूरतसूरतमुंबईमुंबईपुणेपुणेकटककटकगोलकुंडागोलकुंडाबीजापुरबीजापुर(बिजयपुर)(बिजयपुर)मछलीपट्टनममछलीपट्टनमकांचीपुरमकांचीपुरम70° पू॰80° पू॰90° पू॰10° उ॰20° उ॰30° उ॰संकेतिकाअकबर के अधीन मुगल साम्राज्य(1605)औरंगजेब के अधीन मुगल विस्तार(1700)राजपूत भूखंड (1751)अहोम राज्य (1826)सिख साम्राज्य (1839)महत्वपूर्ण नगरउ॰
चित्र 2.16, पृष्ठ 39 — विभिन्न कालखंडों में मुगल और क्षेत्रीय शक्तियों का उदय, वास्तविक अक्षांश-देशांतर पर पुनः बनाया गया। संकेतिका ठीक वैसी ही दी गई है जैसी पुस्तक में छपी है — पुस्तक में “राजपूत भूखंड (1751)”, “अहोम राज्य (1826)” तथा “सिख साम्राज्य (1839)” के सामने कोई अभिकल्प (pattern) नहीं छपा है।
उत्तर

इन तीनों को एक ही भूमि के, लगभग सौ-सौ वर्ष के अंतर पर लिए गए तीन छायाचित्रों की तरह पढ़िए। संकेतिका और छाया-चिह्नों से जो निकलता है, वह यह है —

चित्र 2.3 (पृष्ठ 24)चित्र 2.12 (पृष्ठ 33)चित्र 2.16 (पृष्ठ 39)
क्षेत्रसंपूर्ण उपमहाद्वीपकेवल दक्कन और दक्षिणसंपूर्ण उपमहाद्वीप
सबसे बड़ा भागतुगलक वंश, 1335 — उत्तर-पश्चिम में पेशावर से सुदूर दक्षिण में मदुरई तक, और पूर्व में बंगाल तककृष्णदेवराय के अधीन विजयनगर, 1529 — लगभग 15° उ० से नीचे का संपूर्ण प्रायद्वीपअकबर के अधीन मुगल साम्राज्य (1605), जिसमें औरंगजेब (1700) ने दक्कन तथा कांचीपुरम तक का पूर्वी तट जोड़ा
कौन बाहर हैनरसिंहदेव के अधीन पूर्वी गंग क्षेत्र, 1264 (जाजनगर, कोणार्क); होयसल प्रदेश, 1300 (बेलूर, हालेबिदु)गजपति साम्राज्य, 1458, पूर्वी तट पर; बहमनी सल्तनत, 1477, उत्तरी दक्कन मेंउत्तर-पश्चिम में पठान कबीले; मेवाड़ एक अलग भाग के रूप में; और पूर्व में गुवाहाटी तथा अहोम क्षेत्र बाहर
सिकुड़नालोदी वंश, 1479 — केवल दिल्ली, ग्वालियर और जौनपुर के आस-पास का गंगा का मैदान। न पेशावर, न गुजरात, न दक्कन।बहमनी सल्तनत पाँच राज्यों में बँटती है — बीजापुर, गोलकुंडा, बरार (अचलपुर), अहमदनगर और बीदर, जो इसी मानचित्र पर नगरों के रूप में अंकित हैंसंकेतिका में उत्तराधिकारी पहले से हैं: राजपूत भूखंड (1751), अहोम राज्य (1826), सिख साम्राज्य (1839)

तो ‘परिवर्तन’ क्या है? तीन प्रवृत्तियाँ — और हर एक मानचित्र पर दिखती है, केवल कही नहीं गई है:

  1. विस्तार के तुरंत बाद विखंडन। सबसे स्पष्ट उदाहरण तुगलक 1335 से लोदी 1479 है: उसी वंश का क्षेत्र 150 वर्ष से कम में एक अंश रह जाता है। बहमनी सल्तनत भी दक्कन में यही करती है — पाँच टुकड़े।
  2. भूमि खाली नहीं रहती। जहाँ दिल्ली नियंत्रण खोती है, वहाँ नई क्षेत्रीय शक्ति उभरती है — होयसलों के बाद विजयनगर, तट पर गजपति, दक्कन की सल्तनतें, और आगे चलकर राजपूत, अहोम, मराठे और सिख।
  3. शक्ति एक बड़े केंद्र और अनेक क्षेत्रीय केंद्रों के बीच झूलती रहती है। चित्र 2.3 में पहले एक विशाल भाग, फिर एक छोटा; चित्र 2.12 में कई मध्यम शक्तियाँ; चित्र 2.16 में फिर एक विशाल भाग — जिस पर उसके उत्तराधिकारी भी अंकित हैं।
ऐसा क्यों हुआ: क्षेत्र जीतने से अधिक कठिन था उसे बनाए रखना। विजय से शासक को कर और लूट मिलती थी, किंतु दूरस्थ प्रांतों को चलाने के लिए राज्यपालों पर विश्वास करना पड़ता था — और साम्राज्य के दूसरे छोर पर बैठा राज्यपाल स्वतंत्रता की घोषणा कर सकता था, और करता भी था। हरिहर और बुक्का राय ने “आरंभ में मुहम्मद बिन तुगलक के अधीन राज्यपाल के रूप में सेवाएँ दीं”; दक्कन की पाँच सल्तनतों की स्थापना उन “पूर्व प्रशासकों अथवा ‘तरफदारों’” ने की “जिन्होंने स्वायत्तता की घोषणा कर दी थी”। जो अधिकारी साम्राज्य को फैलाते थे, वही उसे तोड़ने की सबसे अच्छी स्थिति में भी होते थे।
यह कीजिए: भारत का एक रिक्त रेखा-मानचित्र लीजिए और तीन सबसे बड़े विस्तार तीन रंगों में भरिए — तुगलक 1335, विजयनगर 1529 और औरंगजेब 1700। फिर वे नगर चिह्नित कीजिए जो अध्याय के एक से अधिक मानचित्र पर आते हैं (दिल्ली, जाजनगर, गोलकुंडा, बीजापुर, कोणार्क, मदुरई खोजिए)। नगर साम्राज्यों से अधिक जीवित रहते हैं, और यह कागज पर देखने योग्य बात है।
क्या यह उपयोगी रहा?