प्र1.
अपने दो पुत्रों को लिखे गए पत्रों में औरंगजेब ने लिखा है, “मैं अकेला आया था और अकेला जा रहा हूँ। मैं नहीं जानता कि मैं कौन हूँ और क्या कर रहा था... मैंने न देश के लिए और न ही लोगों के लिए अच्छा किया है। भविष्य के लिए भी मेरे पास कोई आशा नहीं है... मैं जीवनभर निराश रहा और दीन-हीन अवस्था में ही जा रहा हूँ।” ये शब्द उनके व्यक्तित्व के कौन-से पक्ष को उजागर करते हैं? आपको उनके बारे में कैसा महसूस होता है?
उत्तर
ये शब्द बताते हैं कि इस अध्याय के सबसे लंबे और सबसे शक्तिशाली शासनकाल के अंत में, उसे चलाने वाले व्यक्ति ने स्वयं उसे असफल माना — और वह भी उस कसौटी पर जो विजय नहीं थी।
पंक्ति-दर-पंक्ति देखिए कि वह क्या कह रहा है —
- “मैं अकेला आया था और अकेला जा रहा हूँ।” यह वह सम्राट कह रहा है जिसने तीन भाइयों को रास्ते से हटाया और अपने पिता को बंदी बनाया।
- “मैं नहीं जानता कि मैं कौन हूँ।” यह उस शासक के शब्द हैं जिसने स्वयं को ‘आलमगीर’ अर्थात ‘विश्वविजेता’ नामित किया था।
- “मैंने न देश के लिए और न ही लोगों के लिए अच्छा किया है।” ध्यान दीजिए कि वह कसौटी कौन-सी चुनता है। क्षेत्र नहीं — उस माप से तो वह सफल था, क्योंकि उसी के शासनकाल में साम्राज्य अपने चरम विस्तार पर पहुँचा — बल्कि देश और लोग।
- “मैं जीवनभर निराश रहा…” यह उस व्यक्ति के शब्द हैं जिसने अपने जीवन के अंतिम 25 वर्ष दक्कन में युद्ध करते हुए बिताए और राजकोष क्षीण कर दिया।
इतिहासकार ऐसे अंश को कैसे पढ़ते हैं। यहाँ एक से अधिक पाठ संभव हैं, और दोनों बताना ही ईमानदारी है:
- सच्चा पश्चात्ताप। पुत्रों को लिखा निजी पत्र कोई सार्वजनिक घोषणा नहीं है; इससे उसे कुछ पाना नहीं था। इस पाठ में यह एक व्यक्ति का अंत में अपना जीवन तौलना है, और यह पाना कि साम्राज्य उसका उत्तर नहीं है।
- पारंपरिक विनम्रता। औरंगजेब अत्यधिक मजहबी था और अनुशासित जीवन जीता था। उस परंपरा में मरणासन्न व्यक्ति से ईश्वर के समक्ष अपनी तुच्छता स्वीकार करने की अपेक्षा की जाती है। इस पाठ में पत्र सच्चा तो है, किंतु औपचारिक — वह उसकी आस्था के विषय में अधिक बताता है, उसकी नीतियों के मूल्यांकन के विषय में कम।
नमूना उत्तर — दूसरा भाग पूछता है कि आपको कैसा लगता है; यह व्यक्तिगत उत्तर है, इसलिए अपना लिखिए। तुलना के लिए एक ईमानदार उत्तर यहाँ है। “मुझे यह पत्र प्रेरक नहीं, दुखद लगता है। दुखद इसलिए कि उपमहाद्वीप में जिस व्यक्ति के पास सबसे अधिक शक्ति थी, वह उसका उपयोग वह करने में नहीं कर सका जिसे वह स्वयं अच्छा मानता था — और यह वह जानता भी था। किंतु इससे उसके शासन के बारे में मेरा निर्णय नहीं बदलता। जिनके मंदिर और गुरुद्वारे नष्ट हुए, और गुरु तेग बहादुर, जिनका 1675 में उसी के आदेश पर सिर काटा गया — उनके लिए इस पश्चात्ताप से कुछ नहीं बदलता। मुझे लगता है दोनों बातें एक साथ सच हो सकती हैं: पत्र एक वास्तविक मनुष्य को दिखाता है, और अभिलेख वास्तविक क्षति को।”