अन्वेषण अध्याय 2 आइए पता लगाएँ

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
कक्षा में चर्चा करें कि ‘पाइक’ प्रणाली ने अहोम साम्राज्य में लोगों के दैनिक-जीवन को चुनौतियों एवं लाभों के संदर्भ में कैसे प्रभावित किया तथा कैसे राजाओं को सेना और अर्थव्यवस्था दोनों का प्रबंधन करने में सहायता की।
उत्तर

पहले यह ठीक-ठीक समझिए कि प्रणाली थी क्या। ‘पाइक’ प्रणाली में “प्रत्येक सक्षम व्यक्ति से भूमि अधिकारों के स्थान पर श्रम या सैन्य कर्तव्य के माध्यम से राज्य को सेवा प्रदान करने का आह्वान किया जाता था।” अर्थात पाइक पेशेवर सैनिक नहीं था। वह किसान था जिस पर राज्य के लिए काम करने का दायित्व था — और राज्य उसे सिक्कों में नहीं, भूमि रखने के अधिकार में भुगतान करता था।

लोगों के लिए लाभलोगों के लिए चुनौती
भूमिभूमि रखने के लिए नकद राजस्व नहीं देना पड़ता था। दायित्व ऐसा काम था जो आप वास्तव में कर सकते थे।भूमि का अधिकार सेवा से बँधा था। सेवा रुकी तो जोत का आधार ही समाप्त।
समयसेवा बारी-बारी से थी, इसलिए किसी घर के सारे पुरुष एक साथ नहीं जाते थे।बुवाई या कटाई के समय बुलावा आ जाए तो परिवार का पूरा वर्ष बिगड़ सकता था। खेती प्रतीक्षा नहीं करती।
किया गया कामश्रम से तटबंध, सड़कें और तालाब बने, जिनका उपयोग वही गाँव करते थे। अपने काम का फल दिखता था।आपका श्रम आपका नहीं था कि आप उसे बेच सकें। क्या बनेगा, यह राज्य तय करता था।
युद्धआप अपनी ही भूमि पर, अपनी ही घाटी के लिए, अपने पड़ोसियों के साथ लड़ते थे — जो अच्छी तरह लड़ने का प्रबल कारण है।युद्ध का सीधा जोखिम साधारण किसानों पर पड़ता था, और बार-बार पड़ता था।

इसने राजा की दो सबसे कठिन समस्याएँ एक साथ हल कीं —

  • सेना की समस्या। अध्याय परिणाम ठीक-ठीक बताता है: “इससे शासकों को सार्वजनिक आधारभूत संरचना का निर्माण करने एवं स्थायी सेना के बिना विशाल त्वरित बल बनाए रखने का अवसर मिला।” स्थायी सेना को शांति के हर महीने में वेतन देना पड़ता है। पाइक बल तब तक कुछ खर्च नहीं करता जब तक बुलाया न जाए।
  • अर्थव्यवस्था की समस्या। वही लोग, उसी बारी में, खाइयाँ खोदते, तटबंध बनाते और नौकाएँ गढ़ते थे। जिस व्यवस्था से राज्य को सैनिक मिलते थे, उसी से सार्वजनिक निर्माण भी — एक दायित्व, दो लाभ
यह यहीं क्यों सफल हुआ: ब्रह्मपुत्र घाटी में किसान के पास पहले से जो कौशल थे, युद्ध को उन्हीं की आवश्यकता थी। नाव चलाना, खाई खोदना, तीरंदाजी — ये सैन्य कर्तव्य बनने से पहले दैनिक काम थे। मुगल सेनापति राम सिंह ने यही देखा: “प्रत्येक असमिया सैनिक नाव चलाने, तीरंदाजी करने, खाई खोदने तथा बंदूकों एवं तोपों को चलाने में निपुण है।” यह साहस की प्रशंसा नहीं, पाइक प्रणाली के परिणाम का वर्णन है। 1671 में सरायघाट में लचित बरफुकन और उनके 10,000 सैनिकों ने 30,000 की मुगल सेना को पराजित किया।
आपकी कक्षा-चर्चा के लिए — यह तुलना कीजिए: इस अध्याय के हर राज्य के सामने यही समस्या थी और हर एक ने भिन्न समाधान निकाला। दिल्ली सल्तनत ने इक्ता अपनाई: कुलीनों को क्षेत्र, जिनसे कर वसूलकर सेना का खर्च चले। अकबर ने मनसबदारी अपनाई: मनसब के अनुसार निश्चित संख्या में हाथी, घोड़े, ऊँट और सैनिक, और भुगतान जागीर में। अहोमों ने पाइक अपनाई: सबका श्रम, भुगतान भूमि अधिकार में। कक्षा से पूछिए कि इन तीनों में से साधारण किसान पर सबसे भारी बोझ कौन-सी डालती है — और बदले में सबसे अधिक कौन-सी देती है।
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