प्र1.
अहोमों ने असम की नदियों, पहाड़ियों और जंगलों का उपयोग अपने लाभ के लिए कैसे किया? क्या आप उन उपायों के बारे में सोच सकते हैं, जिनसे भूगोल ने उनकी रक्षा प्रणाली को सुदृढ़ करने और युद्ध लड़ने में सहायता प्रदान की?
उत्तर
उन्होंने मुगलों को ऐसी भूमि पर लड़ने के लिए विवश किया जहाँ संख्या का महत्व समाप्त हो जाता है। अध्याय इस विषय में स्पष्ट है: मुगलों “के पास अधिक सैनिक और नदी-नौकाओं का एक बड़ा बेड़ा था”, फिर भी वे हारे।
| असम की विशेषता | अहोमों ने इसका उपयोग कैसे किया | आक्रमणकारी को इसकी क्या कीमत चुकानी पड़ी |
|---|---|---|
| ब्रह्मपुत्र | उन्होंने नदी पर लड़ना चुना। सरायघाट का युद्ध (1671) वर्तमान गुवाहाटी के निकट ब्रह्मपुत्र नदी पर लड़ा गया। | नदी पर बड़ा बेड़ा अपनी सारी नौकाएँ एक साथ नहीं लगा सकता; बड़ा बल भी उतने ही सँकरे मोर्चे में सिमट जाता है जितने में छोटा। |
| घने जंगल | “लगातार गुरिल्ला रणनीति” के लिए आड़ — क्षेत्र की जानकारी रखने वाले छोटे समूह अचानक आक्रमण और घात लगाते थे। | जिस सेना को दिखता नहीं, वह अपने आकार का उपयोग नहीं कर सकती। रसद की टुकड़ियाँ निशाना बन जाती हैं। |
| पहाड़ियाँ | उन मार्गों पर नजर रखने और घात लगाने की जगहें, जिनसे आक्रमणकारी को गुजरना ही था। | हर कूच देखा जाता है; कुछ भी आकस्मिक नहीं रह जाता। |
| नदियाँ एवं दलदल | उन्होंने खाइयाँ खोदीं और मिट्टी के बाँध बनाए — वही कौशल जो राम सिंह ने गिनाए — और नौकाओं को लड़ाई के मंच के रूप में प्रयोग किया। | भारी तोपें और घुड़सवार सेना, जो मुगलों की शक्ति थीं, आर्द्र एवं ऊबड़-खाबड़ भूमि में सबसे कम उपयोगी होती हैं। |
अभियान का क्रम ही इस पद्धति को दिखा देता है। औरंगजेब की भेजी सेना ने अहोम राजधानी गढ़गांव पर अधिकार तो किया — किंतु केवल थोड़े समय के लिए। उस देश में राजधानी ले लेने से युद्ध समाप्त नहीं होता था, क्योंकि रक्षकों ने सब कुछ उसी को बचाने पर नहीं लगाया था। वे अपने जाने-पहचाने क्षेत्र में पीछे हट गए और तब तक लड़ते रहे जब तक आक्रमणकारी की स्थिति असंभव न हो गई; फिर उन्होंने उसे नदी पर सरायघाट में घेरा — लचित बरफुकन के 10,000 सैनिक बनाम 30,000 की मुगल सेना। अंततः अहोम अपनी स्वतंत्रता बनाए रखने में सफल रहे।
केवल भूगोल पर्याप्त क्यों नहीं होता: भूभाग उसी की सहायता करता है जो उसे जानता हो और जो वहीं से शीघ्र सैनिक जुटा सके। यहाँ दोनों शर्तें पूरी थीं। पाइक प्रणाली के कारण हर सक्षम व्यक्ति पर पहले से सेवा का दायित्व था, इसलिए राज्य अल्प सूचना पर बड़ा बल खड़ा कर सकता था; और चूँकि पाइक स्थानीय किसान थे, उनके साधारण कौशल — नाव चलाना, खाई खोदना, तीरंदाजी — ठीक वही थे जो नदी-जंगल के युद्ध को चाहिए थे। भूगोल केवल उसी सेना के लिए लाभ है जो उसी भूगोल के लोगों से बनी हो।
इसे जोड़कर देखिए: यही सिद्धांत इस अध्याय में दो बार और आता है। महाराणा प्रताप ने “अरावली की पहाड़ियों से मुगलों के विरुद्ध वर्षों तक गुरिल्ला युद्ध जारी रखा”, और उन्हें भीलों का प्रबल समर्थन प्राप्त था, जो धनुर्धर के रूप में आए और “उस क्षेत्र के अपने ज्ञान से भी योगदान” दिया। और कुंभलगढ़ अरावली में “घने जंगलों और खड़ी पहाड़ियों से घिरा” बना। इस काल में पहाड़, जंगल और स्थानीय ज्ञान बार-बार संख्या पर भारी पड़े — इसीलिए जो शक्तियाँ जीती नहीं जा सकीं, वे मानचित्र के किनारों पर मिलती हैं, मैदान में नहीं।