यह ठीक वही स्थान है जहाँ 1675 में औरंगजेब के आदेश पर नौवें सिख गुरु, गुरु तेग बहादुर का सार्वजनिक रूप से सिर कलम कर दिया गया था। (सिख पंथ में गुरुद्वारा एक पूजा स्थल है।)
वहाँ क्या हुआ था — अध्याय के अपने विवरण में। 1675 में कश्मीरी पंडितों का एक समूह इस्लामी उत्पीड़न से सुरक्षा की माँग करते हुए गुरु तेगबहादुर के पास पहुँचा। गुरु ने उनके साथ खड़े होने एवं शहादत स्वीकार करने का निर्णय लिया। औरंगजेब ने उन्हें बंदी बना लिया तथा इस्लाम स्वीकारने का आदेश दिया। यातनाएँ झेलने तथा अपने तीन शिष्यों की यातनाओं के कारण मृत्यु हो जाने के बाद भी गुरु ने इनकार कर दिया। औरंगजेब के आदेश पर चाँदनी चौक में सार्वजनिक रूप से उनका सिर कलम कर दिया गया।
इसके बाद क्या हुआ। उनके पुत्र गुरु गोबिंद सिंह — 10वें एवं अंतिम गुरु — ने 1699 में खालसा पंथ की स्थापना की, जो “न्याय, समानता तथा आस्था की रक्षा हेतु प्रतिबद्ध एक सैन्य भाईचारा था”।
इसे आज कैसे स्मरण किया जाता है। इस ऐतिहासिक गुरुद्वारे को “सिख रेजिमेंट द्वारा विशिष्ट सम्मान दिया जाता है, जो 1979 से प्रत्येक वर्ष गणतंत्र दिवस परेड में राष्ट्रपति से पूर्व इसे सलामी देती है।” अध्याय इसे “भारतीय इतिहास में आस्था एवं बलिदान का एक शक्तिशाली प्रतीक” कहता है।