प्र1.
चित्र 2.6 को ध्यानपूर्वक देखें। आप क्या सोचते हैं, अलाउद्दीन खिलजी ने स्वयं को ‘द्वितीय सिकंदर’ क्यों कहा?
उत्तर
क्योंकि वह स्वयं को विश्वविजेता घोषित कर रहा था — और यह घोषणा उसने उस वस्तु पर की जो हर व्यक्ति तक पहुँचती है: मुद्रा।
पहले ध्यान से देखिए कि चित्र 2.6 वास्तव में क्या दिखाता है। यह चाँदी का लगभग 10.7 ग्राम का एक टका है, जिसके दोनों पहलू दिखाए गए हैं। दोनों ओर एक सादी रेखा के भीतर किनारे से किनारे तक केवल फारसी लिपि में लेखन है। न कोई चेहरा, न मुकुट, न युद्ध का चित्र — केवल शब्द। उन्हीं शब्दों में एक है ‘सिकंदर सानी’, अर्थात ‘द्वितीय सिकंदर’।
इससे तीन बातें निकलती हैं —
- उसके लिए सिकंदर कौन था। सिकंदर पश्चिम से आया, फारसी साम्राज्य जीता और सिंधु तक पहुँचा। दिल्ली के जिस दरबार की भाषा फारसी थी, वहाँ सिकंदर विजय का मानक था। स्वयं को द्वितीय सिकंदर कहना उसके समान होने का दावा नहीं, विश्वविजय में उसका उत्तराधिकारी होने का दावा है।
- उसने अभी-अभी क्या किया था। यह उपाधि उसके कार्यों से मेल खाती है। 14वीं शताब्दी के आरंभ में उसने उत्तर एवं मध्य भारत के विस्तृत क्षेत्रों में अभियान चलाकर अनेक नगर लूटे, और साथ ही मंगोल सेनाओं के कई आक्रमण विफल किए — जो भारत को अपने विशाल साम्राज्य का अंग बनाना चाहते थे। उधर उसके गुलाम सेनानायक मलिक काफूर ने सल्तनत का विस्तार दक्षिण तक किया।
- सिक्के पर ही क्यों। मध्यकालीन शासक के पास सबसे सस्ता और सबसे व्यापक प्रचार-साधन सिक्का ही था। वह हर बाजार में हाथ-दर-हाथ चलता है, संचित किया जाता है, सीमाओं के पार जाता है, और शासक से अधिक जीवित रहता है। चाँदी पर अंकित उपाधि बिना किसी घोषणाकर्ता के दिन में हजारों बार अपनी घोषणा कर देती है।
ऐसा क्यों हुआ: जो शासक बल से सत्ता लेता है, उसे यह बताना पड़ता है कि उसकी आज्ञा क्यों मानी जाए। अलाउद्दीन खिलजी किसी प्राचीन राजवंश का दावा नहीं कर सकता था — खिलजी स्वयं ममलुकों को हटाकर आए थे। इसलिए उसने वह दावा किया जो वंश नहीं दे सकता: फारसी जगत में सबसे बड़े विजेता की प्रतिष्ठा। ऐसी उपाधियाँ वर्णन नहीं, वैधता के तर्क होती थीं।
ऐसे स्रोत को कैसे पढ़ें: यह सिक्का इस बात का प्रबल प्रमाण है कि अलाउद्दीन लोगों से क्या मनवाना चाहता था, और इस बात का दुर्बल प्रमाण कि उसने वास्तव में क्या प्राप्त किया। इसकी तुलना पृष्ठ 32 की उपाधियों — गजपति, नरपति, अश्वपति — से कीजिए। इस काल का हर राजवंश अपने नाम से ही अपना विज्ञापन करता था।