समाज ने एक साथ तीन प्रकार से सामना किया — शस्त्र से, समझौते से, और अपनी परंपराओं को बचाए रखकर। और अर्थव्यवस्था ने सामंजस्य इस प्रकार बैठाया कि वह शासक कौन है, इस पर निर्भर ही न रह गई।
1. सशस्त्र प्रतिरोध। अध्याय हर क्षेत्र से उदाहरण देता है —
- कलिंग के पूर्वी गंग राज्य ने सल्तनत के कई आक्रमणों को विफल किया; नरसिंहदेव प्रथम ने बंगाल में सल्तनत द्वारा नियुक्त प्रशासक को भी पराजित किया और विजयों की स्मृति में कोणार्क का सूर्य मंदिर बनवाया।
- होयसलों ने कई आक्रमणों का सामना किया और दक्षिण के एकमात्र स्वतंत्र राज्य बने रहे — जब तक बार-बार के आक्रमणों और आंतरिक संघर्षों ने उन्हें क्षीण नहीं कर दिया।
- मुसुनुरी नायकों ने 75 से अधिक मुखियाओं को संगठित किया और 1330–1336 के आस-पास वारंगल से मुहम्मद बिन तुगलक की सेना को खदेड़ दिया।
- राणा कुंभा ने मेवाड़ को दिल्ली तथा बाद की सल्तनतों से बचाए रखा; महाराणा प्रताप ने मुगल आधिपत्य अस्वीकार कर अरावली से वर्षों गुरिल्ला युद्ध चलाया, जिसमें भीलों का प्रबल समर्थन प्राप्त था — वे धनुर्धर के रूप में सेना में सम्मिलित हुए और क्षेत्र के अपने ज्ञान से भी योगदान दिया।
- गढ़ राज्य की रानी दुर्गावती ने 1564 में संख्याबल में कम होते हुए भी स्वयं सेना का नेतृत्व किया; जाट किसानों के 20,000 लोगों ने मुगल सेना का सामना किया; भील, गोंड, संथाल एवं कोच अपने क्षेत्र और करों के प्रश्न पर लड़े।
- अहोमों ने 1671 में सरायघाट में 10,000 सैनिकों से 30,000 की मुगल सेना को हराया; सिखों ने 1699 में खालसा पंथ की स्थापना की।
2. गठबंधन एवं सामंजस्य। हर उत्तर युद्ध नहीं था। कई राजपूत राज्यों ने कूटनीति एवं वैवाहिक गठबंधनों से मुगलों के साथ संबंध बनाए; राजपूत एवं क्षेत्रीय नेता दरबार में आए और हिंदू अधिकारी उच्च पदों पर नियुक्त हुए। अध्याय इसे एक वास्तविक रणनीति मानता है, आत्मसमर्पण नहीं — फिर भी “मुगल सत्ता राजस्थान में सीमित रही”।
3. सांस्कृतिक निरंतरता। “समुदायों ने भी अपनी परंपराओं को बनाए रखने या पुनर्जीवित करने का प्रयास किया” — और इन परंपराओं की परस्पर क्रिया से एक साझा विरासत बनी।
अर्थव्यवस्था ने विकेंद्रीकरण से सामंजस्य बैठाया। उसकी शक्ति उन संस्थाओं में थी जो शासक पर निर्भर नहीं थीं —
ऐसा क्यों हुआ: इस काल का राज्य अर्थव्यवस्था पर कर लगाता था, उसे चलाता नहीं था। भू-राजस्व साधारणत: उपज का पाँचवाँ भाग था (कुछ सुल्तानों ने इसे आधे तक बढ़ाया), और सड़कों, सेतुओं, नहरों तथा नए नगरों का निर्माण भी हुआ। किंतु ऋण, कौशल, श्रेणियाँ और विश्वास के जाल समुदायों ने बनाए और सँभाले। यही कारण है कि जिन शताब्दियों में राजनैतिक मानचित्र बार-बार फाड़कर नया बनाया जा रहा था, उनमें भी उपमहाद्वीप “विश्व के सबसे धनी क्षेत्रों में से एक बना रहा”।
ध्यान रखें: अध्याय इसे सुखद अंत नहीं बनने देता। लूटपाट ने “व्यापारिक नेटवर्क एवं कृषि उत्पादन को प्रभावित किया”; किसानों को कई भीषण अकालों का सामना करना पड़ा और राहत किसी विशिष्ट शासक की उदारता पर निर्भर करती थी; और 1600 के दशक के उत्तरार्ध में कई किसानों को अपनी भूमि गँवानी पड़ी और वे बंधुआ मजदूर बन गए।