दो बातें तुरंत ध्यान खींचती हैं: भारत के बारे में उसकी राय कितनी दुहरी है, और स्वयं वह व्यक्ति कितना दुहरा है।
1. वह एक ही साँस में देश को नापसंद करता है और उसकी समृद्धि की प्रशंसा करता है। वह मध्य एशिया से अतिशय जुड़ाव रखता था और भारत को ‘अल्प आकर्षणों का देश’ मानता था। फिर भी उसने लिखा — “हिंदुस्तान विशाल देश है एवं इसमें सोना-चाँदी बहुतायत में है… वर्षा ऋतु के समय यहाँ की हवा अत्यंत शुद्ध एवं स्वास्थ्यप्रद है… हिंदुस्तान में हर प्रकार के शिल्पकार तथा कारीगर अनगिनत संख्या में उपलब्ध हैं।” अध्याय स्पष्ट निष्कर्ष निकालता है — “शायद भारत की समृद्धि तथा संसाधनों को देखकर उसने मध्य एशिया वापस जाने के स्थान पर यहीं अपनी सत्ता बनाए रखने का निर्णय लिया।” वह इसलिए रुका कि भारत के पास क्या था, इसलिए नहीं कि उसे भारत कैसा लगा।
2. वह किन बातों पर ध्यान देता है, इससे उसके मन का पता चलता है। केवल दुर्ग और राजस्व नहीं, बल्कि पक्षी — जिनमें से कई को उसने विवरण सहित सूचीबद्ध किया — फलदार वृक्ष, वास्तुकला और कविता। यह एक जिज्ञासु, सूक्ष्म दृष्टि वाले लेखक का मन है। बाबरनामा इतिहासकारों के लिए इसीलिए मूल्यवान है कि उसने वही लिखा जो उसे रोचक लगा, केवल वह नहीं जो उसे बड़ा दिखाता।
3. और वही पुस्तक भयानक बातें बिना किसी खेद के दर्ज करती है। वह “एक निर्दयी विजेता भी था” — कई नगरों के निवासियों की हत्या, महिलाओं तथा बच्चों को दास बनाना, और मारे गए लोगों के शरीरों से ‘खोपड़ियों की मीनारें’ बनवाना, “इसमें उसे गर्व का अनुभव होता था।” ध्यान देने योग्य शब्द है गर्व। वह स्वीकारोक्ति नहीं कर रहा, उपलब्धि दर्ज कर रहा है।