प्र1.
छत्रपति शिवाजी के जीवन की किसी एक घटना का चयन कीजिए और अपने सहपाठियों के साथ मिलकर नाटक के रूप में उसका मंचन कीजिए।
उत्तर
ऐसी घटना चुनिए जिसमें कोई निर्णय हो, केवल क्रिया नहीं — रंगमंच पर वही दृश्य चलता है जिसमें पात्र को कुछ चुनना पड़े। इस अध्याय में चार ऐसी घटनाएँ हैं — प्रतापगढ़ की तलहटी में अफज़ल खाँ से भेंट (1659), शाइस्ता खाँ के शिविर पर रात्रि-आक्रमण, आगरा से मुक्ति (1666), और रायगढ़ का राज्याभिषेक (1674)।
अच्छे मंचन के लिए क्या आवश्यक है
- अध्याय द्वारा दिए गए तथ्यों में शुद्धता — तिथियाँ, नाम, स्थान। केवल संवाद आपकी कल्पना हों।
- एक स्पष्ट मोड़, जिसे दर्शक अनुभव कर सकें।
- कम सामग्री। एक टोकरी, एक शाल और दो कुर्सियाँ पर्याप्त हैं; शेष दर्शक स्वयं कल्पना कर लेंगे।
- अंतिम पंक्ति में यह बताइए कि घटना का महत्व क्या था, जिससे कक्षा को केवल कहानी नहीं, इतिहास मिले।
नमूना उत्तर : ‘आगरा की टोकरियाँ’ — चार दृश्यों का नाटक
| दृश्य | स्थान | क्या होता है | मुख्य संवाद |
|---|---|---|---|
| 1 | आगरा का मुगल दरबार | जय सिंह के आग्रह पर आए शिवाजी को औरंगजेब और उस मुगल वजीर के सामने खड़ा किया जाता है जिसे वे पहले पराजित कर चुके थे। | शिवाजी : ‘निमंत्रण राजा को मिला था। खड़ा सेवक को किया जा रहा है।’ |
| 2 | दरबार के बाहर | क्रोधित होकर वे दरबार से बाहर निकल जाते हैं। औरंगजेब उन्हें नजरबंद करने का आदेश देता है। | औरंगजेब : ‘स्वाभिमान रहने दो। स्वतंत्रता नहीं रहेगी।’ |
| 3 | नजरबंदी का भवन | शिवाजी संत-महात्माओं और मुगल सरदारों को फल-मिष्ठान्न की बड़ी टोकरियाँ भेजने लगते हैं। पहरेदार पहली टोकरियाँ खोलते हैं, फिर दसवीं, फिर जाँचना ही छोड़ देते हैं। | पहरेदार : ‘फिर फल। जाने दो।’ |
| 4 | संध्या, भवन का द्वार | दो बड़ी टोकरियाँ बाहर जाती हैं। उनमें शिवाजी और उनके पुत्र संभाजी हैं। सूत्रधार नाटक समाप्त करता है। | सूत्रधार : ‘औरंगजेब उन्हें फिर कभी पकड़ न सका। आठ वर्ष बाद रायगढ़ में उनका राज्याभिषेक हुआ।’ |
यही घटना क्यों चुनें: यह बल का नहीं, बुद्धि का प्रसंग है। शिवाजी ने दीवार नहीं तोड़ी — उन्होंने पहरेदारों की दिनचर्या का अध्ययन किया, कई दिनों तक निरर्थक जाँच दोहराकर जाँच को व्यर्थ बना दिया, और फिर उसी दिनचर्या का उपयोग किया। यह वही सोच है जो गुरिल्ला युद्ध की है — शत्रु की दीवार पर नहीं, उसकी अपेक्षा पर काम कीजिए।
संकेत: किसी एक सहपाठी को ‘तथ्य-परीक्षक’ का कार्य दीजिए। मंचन से पहले वह पृष्ठ 66–67 पढ़कर पुष्टि करे कि आपकी पटकथा का हर तथ्य सही है — कि संभाजी भी साथ थे, कि जय सिंह के प्रयासों से वे आगरा गए थे, और कि वर्ष 1666 था।