कक्षा ८ सामाजिक विज्ञान अध्याय 3 मराठा साम्राज्य का उदय के लिए एनसीईआरटी समाधान
अद्यतन 2026-09-19
इस अध्याय के बारे में
मराठा दक्कन पठार, विशेष रूप से वर्तमान महाराष्ट्र के निवासियों का एक समूह हैं। वे मराठी बोलते हैं, जिसका 12वीं शताब्दी से सतत और समृद्ध साहित्यिक इतिहास रहा है। उनके राजनैतिक उदय की भूमि भक्ति संतों — ज्ञानेश्वर, नामदेव, तुकाराम, रामदास — ने तैयार की, जिन्होंने उपनिषदों और भगवद्गीता को मराठी में लाकर समाज को एक सुदृढ़ सांस्कृतिक आधार दिया। छत्रपति शिवाजी (जन्म 1630, भोंसले कुल, शाहजी और जीजाबाई के पुत्र) ने 16 वर्ष की आयु में दुर्ग जीतने आरंभ किए, 1646 से शासन किया, 1657 में मराठा नौसेना की स्थापना की, 1674 में रायगढ़ में राज्याभिषेक कराकर ‘श्री राजा शिव छत्रपति’ उपाधि धारण की और 1677 में दक्षिण-दिग्विजय किया। 1680 में पचास वर्ष की आयु में उनका निधन हुआ। उनकी रणनीति थी — दुर्ग और गुरिल्ला युद्ध , अर्थात छोटे-छोटे दल, तीव्र गति, आकस्मिकता और भूभाग का गहन ज्ञान। रामचंद्रपंत अमात्य ने आज्ञापत
त्वरित पुनरावृत्ति
| शब्द | अर्थ | अध्याय में कहाँ | महत्व क्यों |
|---|---|---|---|
| स्वराज्य | अपना संप्रभु राज्य — किसी सुल्तान के अधीन कोई पद नहीं | पृष्ठ 64, 80 | 16 वर्ष की आयु से शिवाजी की प्रेरणा; आगे चलकर इसी ने ‘भारत के स्वतंत्रता आंदोलन का बीजारोपण’ किया |
| जागीर | राजा द्वारा सेवा के पुरस्कारस्वरूप दिया गया भूभाग, जिससे प्राप्तकर्ता कर वसूल सकता था | पृष्ठ 64 | शाहजी की जागीर पुणे में थी, जहाँ शिवाजी पले-बढ़े; बाद में उन्होंने अपने राज्य में ऐसे भूमि आवंटन समाप्त कर दिए |
| गुरिल्ला युद्ध | छोटे दल, तीव्र गति, आकस्मिक आक्रमण और भूभाग का गहन ज्ञान — इससे विशाल सेना को परास्त करना | पृष्ठ 65 | इसी से एक दक्कनी सरदार ने बीजापुर और मुगल सेनाओं को हराया; यह सह्याद्रि के भूगोल के कारण ही संभव था |
| अष्टप्रधान मंडल | आठ मंत्रियों की परिषद् — प्रधान, अमात्य, सचिव, मंत्री, सुमंत, सेनापति, न्यायाधीश, पंडितराव | पृष्ठ 72, चित्र 3.13 | शासन व्यक्तिगत कृपापात्रों से नहीं, नामित विभागों से चलता था — केंद्र में संप्रभु छत्रपति |
| चौथ और सरदेशमुखी | अप्रत्यक्ष अधीन प्रांतों से लिया जाने वाला 25 प्रतिशत कर, और उस पर अतिरिक्त 10 प्रतिशत | पृष्ठ 73 | रक्षा के बदले राजस्व, आंतरिक प्रशासन में हस्तक्षेप नहीं — समय के साथ ऐसे कई प्रांत साम्राज्य का भाग बने |
| बारगीर और शिलेदार | वे घुड़सवार जिनके घोड़े-उपकरण राज्य देता था (बारगीर) या जो स्वयं देते थे (शिलेदार) | पृष्ठ 73 | घुड़सवार सेना बढ़ाने के दो तरीके — राज्य-पोषित निष्ठा और स्वयं-पोषित संख्या |
| कार्ताज | पुर्तगाली नौसैनिक व्यापार-पत्र; बिना पत्र वाला जहाज जब्त कर लिया जाता था | पृष्ठ 74 | मराठों ने इसे उलट दिया — वे स्वयं यूरोपियों से पत्र माँगने लगे, जिस पर यूरोपियों ने कान्होजी आंग्रे को ‘समुद्री डाकू’ कहा |
| आज्ञापत्र | ‘राजकीय आदेश’ — 1715 में शिवाजी के वित्तमंत्री रामचंद्रपंत अमात्य की कृति | पृष्ठ 61, 74 | अध्याय का मुख्य लिखित स्रोत — यूरोपीय ‘टोपीधारियों’ की चेतावनी और दुर्गों का महत्व, दोनों इसी में हैं |
| पेशवा | ‘प्रधानमंत्री’ के लिए फारसी शब्द; 18वीं शताब्दी में सत्ता का वास्तविक केंद्र | पृष्ठ 70 | बाजीराव प्रथम और नानासाहेब ने अखिल भारतीय विस्तार किया — किंतु छत्रपति नाममात्र रह गए और सरदार स्वायत्त हो गए |
| पंचायत और कोतवाल | न्याय देने वाला स्थानीय अधिकारियों और प्रतिष्ठित व्यक्तियों का समूह; कोतवाल नगर की पुलिस | पृष्ठ 75–76 | न्याय स्थानीय था और सरदार के समक्ष अपील योग्य; मृत्युदंड का प्रयोग उल्लेखनीय रूप से संयमित था |
| मोडी लिपि | देवनागरी का एक तिर्यक (घसीट) रूप | पृष्ठ 78 | मराठा पत्राचार की मुख्य लिपि — चित्र 3.20 में छत्रपति शाहू महाराज की अपनी लिखावट है |
| राज्य-व्यवहार-कोष | शिवाजी द्वारा लिखवाया गया ग्रंथ, जिसमें राजनयिक फारसी शब्दों के संस्कृत पर्याय दिए गए | पृष्ठ 76 | भाषा-नीति का मापने योग्य परिणाम — मराठा कूटनीति में विदेशी शब्दों का प्रयोग बहुत कम हो गया |
अभ्यास
- महत्वपूर्ण प्रश्न
- आइए पता लगाएँ
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- आइए पता लगाएँ
- आइए पता लगाएँ
- आइए विचार करें
- आइए पता लगाएँ
- प्रश्न और क्रियाकलाप