अन्वेषण अध्याय 3 आइए पता लगाएँ

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
क्या आपने कभी ‘भक्ति’ शब्द सुना है? आपके लिए इसका क्या अर्थ है? भारत के किसी भी भक्ति संत का चयन कर उनके जीवन, उपदेशों और संदेशों का अध्ययन कीजिए। आप उनकी कोई कविता या भजन ढूँढ़कर उसे अपने सहपाठियों के साथ साझा कीजिए।
उत्तर

अध्याय के अनुसार भक्ति का अर्थ है — ईश्वर या किसी विशिष्ट देवता के प्रति समर्पण। 7वीं से 17वीं शताब्दी के मध्य भारत के संतों और साधकों ने आध्यात्मिक उत्थान के लिए बाह्य अनुष्ठानों की अपेक्षा भक्ति-मार्ग को अधिक महत्व दिया — और सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि उन्होंने संस्कृत के स्थान पर लोकभाषाओं में रचना की, इसीलिए उनके विचार दूर-दूर तक पहुँचे।

भक्ति इतनी दूर तक क्यों पहुँची: इसने एक साथ दो बाधाएँ हटा दीं। पहली — यह कहा कि महत्व अनुष्ठान की शुद्धता का नहीं, समर्पण का है। दूसरी — यह मराठी, हिंदी, कन्नड़, तमिल, पंजाबी या बांग्ला में बोली, इसलिए एक साधारण किसान या बुनकर भी इसे समझ और गा सकता था। संत ‘समाज के विविध वर्गों से’ आते थे, इसलिए उनके श्रोता भी विविध वर्गों से थे।

यह क्रियाकलाप कैसे कीजिए

  1. किसी एक संत का चयन कीजिए — महाराष्ट्र से अध्याय स्वयं ज्ञानेश्वर, नामदेव, तुकाराम और रामदास के नाम देता है; अन्य क्षेत्रों से आप कबीर, मीराबाई, सूरदास, गुरु नानक, बसवण्णा, आंडाल, चैतन्य महाप्रभु या असम के शंकरदेव को ले सकते हैं।
  2. तीन बातें खोजिए — वे कब और कहाँ रहे, उन्होंने क्या सिखाया, और वे किनसे बात कर रहे थे
  3. एक छोटी कविता या भजन चुनिए। पहले उसे मूल भाषा में पढ़िए, फिर अपने शब्दों में उसका अर्थ बताइए।
  4. अंत में एक वाक्य लिखिए कि उसमें आपको क्या सबसे अच्छा लगा।

नमूना उत्तर : संत तुकाराम (17वीं शताब्दी)

  • जीवन: तुकाराम 17वीं शताब्दी में पुणे के पास देहू में रहे — अर्थात उसी शताब्दी में जिसमें छत्रपति शिवाजी का उदय हुआ। वे अनाज के व्यापारी थे; अकाल में परिवार और व्यापार खोने के बाद वे पंढरपुर के विट्ठल की भक्ति में लीन हो गए। वे वारकरी परंपरा के संत हैं, जिसके वारकरी आज भी प्रतिवर्ष पैदल पंढरपुर जाते हैं। अध्याय में चित्र 3.4 में उन्हीं पर आधारित डाक टिकट दिया गया है।
  • उपदेश: उन्होंने साधारण मराठी में अभंग रचे — छोटे भक्ति-पद। उनका कहना था कि ईश्वर प्रेम और सच्चे आचरण से मिलता है, दिखावे से नहीं; धर्म के नाम पर होने वाले पाखंड की उन्होंने कठोर आलोचना की।
  • संदेश: संतत्व की कसौटी करुणा है। उनका एक प्रसिद्ध अभंग है — ‘जे का रंजले गांजले, त्यांसी म्हणे जो आपुले, तोचि साधु ओळखावा, देव तेथेचि जाणावा’ — अर्थात ‘जो दुखी और पीड़ितों को अपना कहे, उसी को साधु जानो; ईश्वर वहीं है।’
  • यहाँ इसका महत्व: यही वह ‘सुदृढ़ सांस्कृतिक आधार’ है जिसकी बात अध्याय करता है। जो समाज चार शताब्दियों से अपनी ही भाषा में ऐसे पद गा रहा था, वह स्वयं को एक इकाई मानने का अभ्यस्त हो चुका था — और इसी से आगे चलकर राजनैतिक एकता संभव हुई।
यह कीजिए: यदि आप अपने ही क्षेत्र के किसी संत को चुनें, तो घर के किसी बुजुर्ग से पूछिए कि उन्हें उस संत का कोई भजन कंठस्थ है या नहीं। जो गीत कभी लिखे नहीं गए, वे प्रायः केवल स्मृति में बचे हैं — ऐसा एक गीत इकट्ठा करना वास्तविक ऐतिहासिक कार्य है।
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