मराठा दक्कन पठार के, विशेष रूप से वर्तमान महाराष्ट्र के निवासियों का एक समूह थे, जिनकी पहचान उनकी भाषा मराठी से है — इस भाषा का 12वीं शताब्दी से सतत और समृद्ध साहित्यिक इतिहास रहा है। वे सबसे बड़ी अखिल भारतीय शक्ति इसलिए बन सके क्योंकि तीन अलग-अलग बातें एक साथ उनके पक्ष में थीं — उनसे पहले तैयार हुआ सांस्कृतिक आधार, उनके अपने भूभाग के अनुकूल युद्धपद्धति, और ऐसा प्रशासन जिसमें शक्ति व्यक्ति के पास नहीं, राज्य के पास रहती थी।
→ औरंगजेब के आक्रमण में टिके रहना (1682–1707)
→ अखिल भारतीय विस्तार (18वीं शताब्दी)
→ अंग्रेजों से पूर्व का सबसे बड़ा भारतीय साम्राज्य
1. आधार पहले सांस्कृतिक बना, फिर राजनैतिक। 7वीं से 17वीं शताब्दी के मध्य संतों ने आध्यात्मिक उत्थान के लिए बाह्य अनुष्ठानों की अपेक्षा भक्ति-मार्ग को महत्व दिया और लोकभाषाओं में रचना की। महाराष्ट्र में ज्ञानेश्वर, नामदेव, तुकाराम और रामदास ने उपनिषदों और भगवद्गीता जैसे ग्रंथों का मराठी में अनुवाद किया; कुछ संतों ने सिख गुरुओं की भाँति सामाजिक संगठन और राजनैतिक चेतना पर भी बल दिया। अध्याय इसका परिणाम स्पष्ट बताता है — समाज को ‘एक सुदृढ़ सांस्कृतिक आधार प्राप्त हुआ जिसने आगे चलकर मराठों को एक राजनैतिक शक्ति के रूप में संगठित होने में सहायता की’। 17वीं शताब्दी तक कुछ मराठा सरदारों ने स्वराज्य के प्रयत्न किए थे, पर वे असफल रहे — उनमें साहस की नहीं, एकता की कमी थी।
2. छत्रपति शिवाजी ने इस आधार को राज्य में बदला। 1630 में भोंसले कुल में शाहजी और जीजाबाई के यहाँ जन्मे शिवाजी ने केवल 16 वर्ष की आयु में सैन्य अभियान आरंभ किए — पहले पुणे के आसपास के उपेक्षित और निर्जन दुर्ग लेकर उनकी सुरक्षा सुदृढ़ की। बीजापुर और फिर मुगलों के विरुद्ध उन्होंने गुरिल्ला युद्ध अपनाया — छोटे दल, तीव्र गति, आकस्मिकता और भूभाग का गहन ज्ञान। 1657 में उन्होंने नौसेना बनाई, जो न बीजापुर के पास थी न मुगलों के पास; 1674 में रायगढ़ में राज्याभिषेक हुआ; और 1677 में दक्षिण-दिग्विजय से उत्तरी तमिलनाडु तथा कर्नाटक के कुछ भाग राज्य में जुड़े।
3. राज्य ने सबसे कठिन परीक्षा पार की। औरंगजेब ने बीजापुर और गोलकुंडा जीत लिए, संभाजी को यातनाएँ देकर मार डाला और राजधानी रायगढ़ भी ले ली — फिर भी मराठों को समाप्त नहीं कर सका। राजाराम युद्ध को जिंजी ले गए; मराठों ने अपने दुर्गों की दृढ़ता से रक्षा की और प्रायः मुगलों पर भारी पड़े; औरंगजेब दक्कन से निकल ही नहीं सका और मराठों को परास्त किए बिना ही मर गया (1682–1707)। पचीस वर्षों के इसी प्रतिरोध ने एक क्षेत्रीय राज्य को युद्ध-कठोर शक्ति बना दिया।
4. फिर विस्तार पूरे भारत में हुआ। राजाराम की रानी ताराबाई ने समझा कि मुगल सेना दक्कन में उलझी है और उत्तर भारत असुरक्षित है; उन्होंने विशाल सेनाएँ उत्तर भेजीं — अध्याय उन्हें उत्तर में मराठा विस्तार की सूत्रधार कहता है। पेशवा बाजीराव प्रथम और नानासाहेब ने अखिल भारतीय विस्तार किया; 1754 में दिल्ली पर मराठा नियंत्रण आरंभ हुआ; महादजी शिंदे ने 1771 में दिल्ली पुनः जीती और वह तीन दशकों तक मराठों के पास रही। विस्तार की चरम सीमा पर लाहौर, अटक और पेशावर तक मराठा नियंत्रण पहुँचा।