अन्वेषण अध्याय 3 महत्वपूर्ण प्रश्न

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
मराठा कौन थे? वे ब्रिटिश शासन स्थापित होने से पूर्व भारतवर्ष की सबसे बड़ी अखिल भारतीय शक्ति कैसे बने?
उत्तर

मराठा दक्कन पठार के, विशेष रूप से वर्तमान महाराष्ट्र के निवासियों का एक समूह थे, जिनकी पहचान उनकी भाषा मराठी से है — इस भाषा का 12वीं शताब्दी से सतत और समृद्ध साहित्यिक इतिहास रहा है। वे सबसे बड़ी अखिल भारतीय शक्ति इसलिए बन सके क्योंकि तीन अलग-अलग बातें एक साथ उनके पक्ष में थीं — उनसे पहले तैयार हुआ सांस्कृतिक आधार, उनके अपने भूभाग के अनुकूल युद्धपद्धति, और ऐसा प्रशासन जिसमें शक्ति व्यक्ति के पास नहीं, राज्य के पास रहती थी

सांस्कृतिक आधार (7वीं–17वीं शताब्दी) → शिवाजी का स्वराज्य (1646–1680)
→ औरंगजेब के आक्रमण में टिके रहना (1682–1707)
→ अखिल भारतीय विस्तार (18वीं शताब्दी)
अंग्रेजों से पूर्व का सबसे बड़ा भारतीय साम्राज्य

1. आधार पहले सांस्कृतिक बना, फिर राजनैतिक। 7वीं से 17वीं शताब्दी के मध्य संतों ने आध्यात्मिक उत्थान के लिए बाह्य अनुष्ठानों की अपेक्षा भक्ति-मार्ग को महत्व दिया और लोकभाषाओं में रचना की। महाराष्ट्र में ज्ञानेश्वर, नामदेव, तुकाराम और रामदास ने उपनिषदों और भगवद्गीता जैसे ग्रंथों का मराठी में अनुवाद किया; कुछ संतों ने सिख गुरुओं की भाँति सामाजिक संगठन और राजनैतिक चेतना पर भी बल दिया। अध्याय इसका परिणाम स्पष्ट बताता है — समाज को ‘एक सुदृढ़ सांस्कृतिक आधार प्राप्त हुआ जिसने आगे चलकर मराठों को एक राजनैतिक शक्ति के रूप में संगठित होने में सहायता की’। 17वीं शताब्दी तक कुछ मराठा सरदारों ने स्वराज्य के प्रयत्न किए थे, पर वे असफल रहे — उनमें साहस की नहीं, एकता की कमी थी।

2. छत्रपति शिवाजी ने इस आधार को राज्य में बदला। 1630 में भोंसले कुल में शाहजी और जीजाबाई के यहाँ जन्मे शिवाजी ने केवल 16 वर्ष की आयु में सैन्य अभियान आरंभ किए — पहले पुणे के आसपास के उपेक्षित और निर्जन दुर्ग लेकर उनकी सुरक्षा सुदृढ़ की। बीजापुर और फिर मुगलों के विरुद्ध उन्होंने गुरिल्ला युद्ध अपनाया — छोटे दल, तीव्र गति, आकस्मिकता और भूभाग का गहन ज्ञान। 1657 में उन्होंने नौसेना बनाई, जो न बीजापुर के पास थी न मुगलों के पास; 1674 में रायगढ़ में राज्याभिषेक हुआ; और 1677 में दक्षिण-दिग्विजय से उत्तरी तमिलनाडु तथा कर्नाटक के कुछ भाग राज्य में जुड़े।

3. राज्य ने सबसे कठिन परीक्षा पार की। औरंगजेब ने बीजापुर और गोलकुंडा जीत लिए, संभाजी को यातनाएँ देकर मार डाला और राजधानी रायगढ़ भी ले ली — फिर भी मराठों को समाप्त नहीं कर सका। राजाराम युद्ध को जिंजी ले गए; मराठों ने अपने दुर्गों की दृढ़ता से रक्षा की और प्रायः मुगलों पर भारी पड़े; औरंगजेब दक्कन से निकल ही नहीं सका और मराठों को परास्त किए बिना ही मर गया (1682–1707)। पचीस वर्षों के इसी प्रतिरोध ने एक क्षेत्रीय राज्य को युद्ध-कठोर शक्ति बना दिया।

4. फिर विस्तार पूरे भारत में हुआ। राजाराम की रानी ताराबाई ने समझा कि मुगल सेना दक्कन में उलझी है और उत्तर भारत असुरक्षित है; उन्होंने विशाल सेनाएँ उत्तर भेजीं — अध्याय उन्हें उत्तर में मराठा विस्तार की सूत्रधार कहता है। पेशवा बाजीराव प्रथम और नानासाहेब ने अखिल भारतीय विस्तार किया; 1754 में दिल्ली पर मराठा नियंत्रण आरंभ हुआ; महादजी शिंदे ने 1771 में दिल्ली पुनः जीती और वह तीन दशकों तक मराठों के पास रही। विस्तार की चरम सीमा पर लाहौर, अटक और पेशावर तक मराठा नियंत्रण पहुँचा।

ऐसा क्यों हुआ: केवल बड़ी सेना से साम्राज्य नहीं बनता — मुगलों की सेना तो और बड़ी थी। मराठे इसलिए जीते क्योंकि उनकी युद्धपद्धति उनके भूगोल से मेल खाती थी (दुर्ग और पहाड़), उनका धन केवल जीती हुई भूमि पर निर्भर नहीं था (जिन प्रांतों की वे केवल रक्षा करते थे, उनसे चौथ और सरदेशमुखी मिलती थी), और उनके अधिकारी वेतनभोगी तथा स्थानांतरणीय थे, इसलिए कोई सेनानायक अपने पद को निजी उत्तराधिकार नहीं बना सकता था। यही कारण है कि संस्थापक के निधन और राजधानी के पतन के बाद भी राज्य चलता रहा।
क्या आप जानते हैं? अध्याय के आरंभ में दिया गया स्रोत — रामचंद्रपंत अमात्य का आज्ञापत्र (1715) — पहले ही चेतावनी देता है कि यूरोपीय ‘टोपीधारी’ अन्य व्यापारियों के समान नहीं हैं, उनका पूरा ध्यान ‘इस देश में प्रवेश करने, अपना क्षेत्र विस्तृत करने’ में है। एक मराठा मंत्री ने यह खतरा 1818 से पूरे सौ वर्ष पहले देख लिया था।
प्र2.
उनके शासन प्रणाली की प्रमुख विशेषताएँ क्या थीं?
उत्तर

मराठा शासन प्रणाली की छह प्रमुख विशेषताएँ थीं — वेतनभोगी और स्थानांतरणीय नागरिक प्रशासन, आठ मंत्रियों की परिषद्, प्रत्यक्ष अधीन क्षेत्र से बाहर ‘रक्षा के बदले कर’ की व्यवस्था, दुर्गों पर टिकी त्रि-अंगी सेना, स्थानीय एवं अपील योग्य न्यायव्यवस्था, तथा व्यापार और यातायात को राज्य का सक्रिय प्रोत्साहन।

1. नागरिक प्रशासन। छत्रपति शिवाजी ने अपेक्षाकृत केंद्रीकृत प्रशासन स्थापित किया। उन्होंने वंशानुगत पद — जो सुल्तानों और मुगलों के अधीन सामान्य थे — और भूमि आवंटन समाप्त कर दिए, तथा प्रत्येक राजकीय अधिकारी को राज्य कोष से वेतन दिया। कई अधिकारियों का समय-समय पर स्थानांतरण होता था। युद्ध में शहीद सैनिकों की विधवाओं को पेंशन दी जाती थी और उनके पुत्रों को सैन्य पद भी दिए जाते थे।

यह क्यों महत्वपूर्ण था: यदि अधिकारी को वेतन के स्थान पर भूमि दी जाए तो वह भूमि धीरे-धीरे उसकी हो जाती है; और यदि पद उसके पुत्र को मिल जाए तो एक ही पीढ़ी में राज्य उस पद पर नियंत्रण खो देता है। वेतन और स्थानांतरण से, अध्याय के शब्दों में, यह सुनिश्चित होता था कि अधिकारियों के पास ‘राजा पर अपनी शर्तें थोपने की पर्याप्त शक्ति न हो’। शक्ति व्यक्ति के पास नहीं, पद के पास रहती थी।

2. अष्टप्रधान मंडल — संप्रभु छत्रपति की सहायता करने वाले आठ मंत्री (चित्र 3.13):

पदविभागपदविभाग
प्रधानप्रधान मंत्री (पेशवा)सेनापतिप्रधान सेनापति
अमात्यवित्त मंत्रीसुमंतविदेश मंत्री
सचिवभू-राजस्व मंत्रीन्यायाधीशमुख्य न्यायाधीश
मंत्रीखुफिया मंत्रीपंडितरावधार्मिक विषयों के प्रमुख

3. सीमा के बाहर से राजस्व। जो प्रांत प्रत्यक्ष रूप से उनके अधीन नहीं थे — दक्कन और उत्तर भारत में — उनसे मराठे चौथ (25 प्रतिशत) और सरदेशमुखी (अतिरिक्त 10 प्रतिशत) वसूलते थे। बदले में वे उन प्रांतों की रक्षा करते थे और उनके आंतरिक प्रशासन में हस्तक्षेप नहीं करते थे। मुगलों ने भी विभिन्न संधियों से इस व्यवस्था को स्वीकृति दी और समय के साथ इनमें से कुछ प्रांत मराठा साम्राज्य का भाग बन गए।

4. सैन्य प्रशासन। सेना तीन अंगों में थी — पैदल, घुड़सवार और नौसेना। घुड़सवार सेना में दो प्रकार के सैनिक थे — बारगीर, जिनके घोड़े और उपकरण राज्य देता था, और शिलेदार, जो स्वयं व्यय उठाते थे। तलवार और भाले प्रिय हथियार थे, किंतु बंदूकों का प्रयोग भी बड़ी संख्या में होता था; शिवाजी के समय से ही रॉकेट प्रयुक्त होते थे और 1770 तक धातु-नलिकाओं वाले रॉकेट भी। 18वीं शताब्दी में मराठों ने यूरोपीय शैली के अनुशासित सैनिकों और तोपखाने की श्रेष्ठता देखकर वैसी सेना तैयार करने का प्रयास किया — महादजी शिंदे के पास एक विशाल यूरोपीय शैली की सेना थी। इन सबके नीचे आधार थे दुर्ग, जो महत्वपूर्ण मार्गों पर नियंत्रण रखते और छापामार युद्ध के समय सेना को आश्रय देते थे।

5. न्याय व्यवस्था। यह कुशल थी और मृत्युदंड के संयमित प्रयोग के लिए उल्लेखनीय थी। पंचायत — स्थानीय अधिकारियों और प्रतिष्ठित व्यक्तियों का समूह, जो आज के सरकारी पंचायती निकाय से भिन्न था — न्याय का मुख्य अंग थी, और असंतोषजनक निर्णय पर मराठा सरदार के समक्ष अपील की जा सकती थी। पुणे, इंदौर आदि प्रमुख नगरों में कोतवाल कानून-व्यवस्था संभालता था।

6. व्यापार और लोक-निर्माण। शिवाजी ने व्यापार को प्रोत्साहित किया और स्वयं समुद्री विदेशी व्यापार में भाग लिया — उनके और उनके अधिकारियों के पोत यमन के मोचा, ओमान के मस्कट और मलेशिया के मलक्का तक जाते थे और सोना, वस्त्र आदि ले जाते थे। सड़कें बनीं और उनका रख-रखाव हुआ, नदियों और छोटी जलधाराओं पर पुल बने, और 18वीं शताब्दी में ओडिशा जैसे स्थानों पर नदी परिवहन के लिए नौकाओं का तंत्र चलाया गया।

स्वयं जाँचिए: विशेषता 1 और 4 की तुलना बाद के काल से कीजिए। जब 18वीं शताब्दी में सरदारों को ‘अधिक शक्ति और स्वायत्तता’ मिली तो, अध्याय के अनुसार, ‘कभी-कभी अनुशासनहीनता और दुर्व्यवहार भी हुए जो छत्रपति शिवाजी के मूल्यों से बिल्कुल विपरीत थे’। व्यवस्था ठीक थी; उसे ढीला छोड़ना महँगा पड़ा।
प्र3.
भारतीय इतिहास पर मराठा साम्राज्य का क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर

मराठा प्रभाव राजनैतिक, प्रशासनिक, सांस्कृतिक और अंततः प्रेरणात्मक था — और अध्याय अंत में कहता है कि सबसे बड़ा प्रभाव अंतिम ही था।

प्रभावमराठों ने क्या कियाअध्याय से प्रमाण
राजनैतिकमुगल प्रभुत्व को तोड़ा और अंग्रेजों से पूर्व का सबसे बड़ा भारतीय साम्राज्य बनायाऔरंगजेब मराठों को परास्त किए बिना दक्कन में ही मर गया; मराठों ने पूर्वी, उत्तरी और मध्य भारत के अधिकांश भाग तथा 1754/1771 से दिल्ली पर नियंत्रण रखा
प्रशासनिक‘एक कुशल प्रशासन के साथ शासन करने की एक नई विधि’ स्थापित कीवेतनभोगी, स्थानांतरणीय अधिकारी; अष्टप्रधान मंडल; चौथ और सरदेशमुखी; मृत्युदंड के संयमित प्रयोग वाली पंचायत-न्यायव्यवस्था
सामुद्रिकनवीनतम तकनीक के बिना भी लंबे समय तक यूरोपीय नौसैनिक वर्चस्व का प्रतिकार कियाकान्होजी आंग्रे ने भूगोल-ज्ञान और युद्धनीति से अनेक विजय पाईं; मराठे स्वयं यूरोपियों से व्यापार-पत्र माँगने लगे, जिस पर उन्हें ‘समुद्री डाकू’ कहा गया
सांस्कृतिकविभिन्न क्षेत्रों के भारतीयों में नया सांस्कृतिक आत्मविश्वास जगायाफारसी के स्थान पर संस्कृत मुहर; राज्य-व्यवहार-कोष; मोडी लिपि; नागपुर के भोंसले द्वारा पुरी में जगन्नाथ पूजा का पुनर्जीवन; अहिल्याबाई होलकर के मंदिर, घाट, कुएँ और मार्ग (केदारनाथ से रामेश्वरम तक); सरफोजी द्वितीय का समन्वयकारी तंजावुर
प्रेरणात्मकयह दिखाया कि शक्तिशाली साम्राज्य पराजित किए जा सकते हैं और भारतीय स्वयं साम्राज्य चला सकते हैंछत्रसाल ने शिवाजी से प्रेरित होकर स्वतंत्र बुंदेलखंड बनाया; आगे चलकर स्वराज्य के आदर्श ने ‘भारतीयों को प्रेरित किया कि वे स्वयं शासन कर सकते हैं’ और स्वतंत्रता आंदोलन का बीजारोपण किया
अंतिम पंक्ति सबसे प्रबल क्यों है: साम्राज्य समाप्त होते हैं — मराठा साम्राज्य भी 1818 में समाप्त हुआ। जो साम्राज्य के बाद भी बचा रहा, वह एक प्रमाण था। शिवाजी से पहले दक्कन में संप्रभुता का अर्थ किसी सुल्तान की सेवा था; उनके बाद लोगों के सामने यह जीवंत उदाहरण था कि भारतीय स्वयं साम्राज्य का निर्माण, विस्तार और प्रशासन कर सकते हैं। इसीलिए अध्याय कहता है कि उन्होंने सबसे अधिक योगदान ‘लोगों को यह दिखाकर’ दिया कि शक्तिशाली साम्राज्यों को पराजित किया जा सकता है।
संकेत: मराठा प्रभाव इससे भी दिखता है कि अंग्रेजों को क्या करना पड़ा। मराठा शक्ति समाप्त करने में तैंतालीस वर्षों (1775–1818) में तीन आंग्ल-मराठा युद्ध लगे — और उससे पहले नाना फड़णवीस पहला अखिल भारतीय ब्रिटिश-विरोधी गठबंधन बना चुके थे, जिसमें मैसूर के हैदर अली और हैदराबाद के निजाम जैसे पुराने विरोधी भी सम्मिलित थे।
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