अन्वेषण अध्याय 3 आइए विचार करें

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
छत्रपति शिवाजी के पत्र के आधार पर आप एक शासक के रूप में उनके मूल्यों के बारे में क्या कह सकते हैं?
उत्तर

यह पत्र ऐसे शासक को दिखाता है जो मानता था कि राज्य की आवश्यकता साधारण जनता पर बल प्रयोग का अधिकार नहीं देती। नौसेना — उनकी अपनी सबसे प्रिय परियोजना — के लिए भी लकड़ी अनुमति लेकर ही ली जानी थी, और कुछ वृक्षों को तो छूना ही मना था।

पत्र की पंक्तिउसके पीछे का मूल्य
‘आवश्यकता हो तो जंगल से पेड़ काटने की अनुमति ले लो और आगे बढ़ो।’शक्ति से नहीं, विधि से शासन। राज्य की उचित आवश्यकता को भी सहमति से होकर जाना है — अधिकारी का पद अपने आप उस लेने को न्यायसंगत नहीं बनाता।
‘आम और कटहल जैसे अन्य वृक्ष भी उपयोगी हैं, किंतु उन्हें मत छुओ।’संयम। ‘उपयोगी’ और ‘उपलब्ध’ एक बात नहीं है। वे एक ऐसी रेखा खींचते हैं जिसे सुविधा के लिए भी पार नहीं किया जा सकता।
‘ऐसे पेड़ों को बढ़ने में कई वर्ष लगते हैं और लोग उनकी देखभाल अपने बच्चों की तरह करते हैं। यदि तुम उन्हें काट दोगे, तो क्या उनका दुःख कभी समाप्त होगा?’संवेदनशीलता और अपूरणीय के प्रति समझ। आम का पेड़ लकड़ी का टुकड़ा नहीं, एक परिवार के दशकों का श्रम है। इसकी क्षतिपूर्ति संभव नहीं।
‘अगर तुम दूसरों पर अत्याचार करके कुछ प्राप्त करते हो, तो वह अत्याचारी के साथ-साथ शीघ्र ही नष्ट हो जाता है।’यह केवल नैतिक नहीं, राजनैतिक सिद्धांत है। वे तर्क देते हैं कि अत्याचार पर टिकी उपलब्धि अस्थिर होती है — अर्थात न्याय अच्छी राजनीति भी है।
‘ऐसे वृक्षों के अभाव में हानि भी होती है।’संसाधनों के प्रति दूरदृष्टि। फलदार वृक्षों से रहित देश स्वयं दरिद्र हो जाता है — जिसे आज हम पर्यावरणीय क्षति कहते हैं।
‘इसलिए किसी भी परिस्थिति में बल का प्रयोग मत करो।’कोई अपवाद नहीं। आदेश निरपेक्ष है, और इसीलिए लागू करने योग्य है — कोई अधिकारी यह नहीं कह सकता कि उसका प्रसंग विशेष था।
यह केवल एक भला भाव क्यों नहीं है: ध्यान दीजिए कि शिवाजी केवल आदेश नहीं देते, कारण भी बताते हैं — वृक्ष को लगने वाले वर्ष, परिवार का लगाव, अत्याचार से मिली वस्तु की अस्थिरता। जो शासक अपने आदेश का कारण समझाता है, वह अपने अधिकारियों में विवेक तैयार कर रहा होता है, ताकि वे उन परिस्थितियों में भी ठीक व्यवहार करें जिनकी कल्पना पत्र में नहीं थी। यह वही प्रवृत्ति है जो कोष से वेतन देने और अधिकारियों का स्थानांतरण करने में दिखती है — ऐसी व्यवस्था बनाइए जो राजा के न देखने पर भी ठीक चले।

यही मूल्य अध्याय में अन्यत्र भी दिखते हैं, इसीलिए हम जानते हैं कि यह पत्र कोई अकेला सुंदर वाक्य नहीं था:

  • सूरत में उन्होंने लगभग एक करोड़ रुपये का खजाना लिया, किंतु धार्मिक स्थलों पर आक्रमण न करने का ध्यान रखा और दानवीर मोहनदास पारेख के घर को सुरक्षित रखा।
  • उन्होंने युद्ध में शहीद सैनिकों की विधवाओं को पेंशन दी और उनके पुत्रों को सैन्य पद दिए।
  • दक्षिण में उन्होंने डच व्यापारियों के दास व्यापार को निषेध किया, जबकि उस समय कोई भी भारतीय शक्ति इसका विरोध नहीं कर रही थी।
  • उन्होंने वंशानुगत पद और भूमि आवंटन समाप्त कर दिए, ताकि अधिकारी अपनी प्रजा पर निजी सत्ता न बना सकें।
क्या आप जानते हैं? ‘घास का एक तिनका भी बलपूर्वक न छीनें’ केवल अलंकार नहीं है — घास ही चारा थी, और सेना के घोड़ों को प्रतिदिन चाहिए थी। घुड़सवार सेना पर टिके राज्य में अधिकारियों को चारा छीनने से रोकना एक वास्तविक और महँगा प्रतिबंध था।
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