अन्वेषण अध्याय 3 आइए पता लगाएँ

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
क्या आपने ‘भरतनाट्यम’ नृत्यशैली के विषय में सुना है? क्या आप जानते हैं कि इस नृत्यशैली का मराठाओं से गहरा संबंध है? क्या आप यह ज्ञात कर सकते हैं कि यह संबंध क्या था?
उत्तर

संबंध का नाम है तंजावुर। अध्याय यह सीधे कहता है — तंजावुर के मराठा शासक सरफोजी द्वितीय के काल में ही ‘आधुनिक कर्नाटक संगीत का विकास हुआ तथा प्रसिद्ध शास्त्रीय नृत्यशैली भरतनाट्यम के प्रारंभिक चरण विकसित हुए’। अर्थात आज की नृत्यशैली ने अपना रूप एक ऐसे दरबार में पाया जो तमिल क्षेत्र में मराठों द्वारा शासित था।

यह संबंध बना कैसे

  1. छत्रपति शिवाजी के सौतेले भाई एकोजी ने 17वीं शताब्दी के अंत में तंजावुर पर विजय प्राप्त की, जिससे इस क्षेत्र में मराठा शासन आरंभ हुआ।
  2. तंजावुर के मराठे कला के महान संरक्षक थे — कई शासक स्वयं कवि और नाटककार थे, और सरफोजी द्वितीय ने देवेंद्र कुरवंजी नामक मराठी नाटक लिखा।
  3. सरफोजी द्वितीय ने अनेक प्रतिभाशाली संगीतकारों को संरक्षण दिया। इसी संरक्षण में दरबारी संगीतकारों और नृत्याचार्यों ने तमिल क्षेत्र की मंदिर-नृत्य परंपरा को एक क्रमबद्ध प्रस्तुति में ढाला।
  4. वही क्रम — जिस क्रम में आज भी भरतनाट्यम की प्रस्तुति बढ़ती है — आधुनिक भरतनाट्यम का सीधा पूर्वज है।

खोज करने पर आपको यह मिलेगा। चिन्नैया, पोन्नैया, शिवानंदम और वडिवेलु — ये चार भाई, जिन्हें तंजावुर चतुष्टय (Thanjavur Quartet) कहा जाता है, 19वीं शताब्दी के आरंभ में सरफोजी द्वितीय के दरबार में थे। नृत्य की प्रस्तुति को अलारिप्पु, जतिस्वरम्, शब्दम्, वर्णम्, पदम् और तिल्लाना के क्रम में व्यवस्थित करने का श्रेय उन्हीं को दिया जाता है — यही क्रम आज भी चलता है। उस समय इस नृत्य को सदिर जैसे अन्य नामों से जाना जाता था; ‘भरतनाट्यम’ नाम 20वीं शताब्दी में सामान्य प्रचलन में आया, जब यह मंदिर और दरबार से सार्वजनिक मंच पर आया।

मराठी दरबार ने तमिल कला को रूप कैसे दिया: इसका कारण अध्याय इसी बॉक्स के आगे बताता है — तंजावुर का सांस्कृतिक परिवेश बहुभाषी था, जहाँ ‘स्थानीय तमिल संस्कृति, पूर्व शासकों की तेलुगु संस्कृति और वर्तमान शासकों की मराठी संस्कृति का परस्पर स्वतंत्र रूप से मेल-जोल हुआ’। मराठों ने तमिल कलाओं का स्थान नहीं लिया; उन्होंने उन्हें धन, व्यवस्था और संरक्षण दिया। अध्याय की ‘समृद्ध और नवीनता से परिपूर्ण समन्वयकारी संस्कृति’ का यही अर्थ है।
क्या आप जानते हैं? सरफोजी द्वितीय की रुचि नृत्य तक सीमित नहीं थी। उन्होंने धन्वंतरि महल स्थापित किया, जहाँ भारतीय और पाश्चात्य दोनों पद्धतियों से निःशुल्क उपचार होता था; उन्होंने भारत में किसी स्थानीय शासक द्वारा स्थापित पहला मुद्रणालय आरंभ किया; और बृहदेश्वर मंदिर की दीवारों पर भोंसले परिवार का इतिहास उत्कीर्ण कराया, जो भारत के सबसे बड़े एकल शिलालेखों में से एक है।
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